कामिनी की कामुक गाथा (भाग 19)

प्रिय पाठकों,

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे सुहागरात में मेरे पांचों पतियों, मां और चाची के सामने हमारी शादी कराने वाले पंडित जी और मेरे बीच वासना का नंगा नाच चला। सबसे किस्मत वाले थे पंडित जी। वहां उपस्थित तीनों स्त्रियों के साथ संभोग का स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। पहले मेरी मां और चाची के मदमस्त जिस्म का जी भर कर भोग लगाने का सुअवसर प्राप्त हुआ और फिर कल्पनातीत स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ मेरे कमनीय गदराए तन से खेलने का। बदशक्ल और विकृत शरीर वाले कामुक पंडित कुशल चुदक्कड़ की तरह चटखारे ले ले कर हम तीनों स्त्रियों के शरीरों को अमानुषिक संभोग क्षमता का प्रदर्शन करते हुए रौंद ही डाला। चाची और मां के बारे में तो मुझे पता नहीं, किंतु मैं तो निहाल हो गई। अब तक संभोग का इतना आनंद नहीं मिला था। संभोग सुख का वह चरमोत्कर्ष था, उफ्फ, कभी न भूलने वाला स्त्रीत्व की संपूर्णता का वह अद्भुत अहसास। पंडित जी पर बेहद प्यार आ रहा था किन्तु अपने पतियों के सम्मुख उसका प्रर्दशन नहीं कर सकती थी।

पंडित जी के कानों में फुसफुसाते हुए मैंने अपनी भावनाओं का इजहार किया, “आई लव यू राजा, आपकी चुदाई की दीवानी हो गई मैं, मुझ पर ऐसी ही कृपा करते रहिएगा जी।”

पंडित जी मुस्कुरा उठे और फुसफुसा कर बोले, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह बहुरानी, तुझे चोद कर मुझे स्वर्ग मिल गया, कैसे भूल जाऊं। जब बोलो तब चोदूंगा रानी, जब भी मुझे चोदने का मन होगा, मैं बुला लूंगा, जरूर आना।”

“हां राजा हां, मैं आपकी दासी हो गई।” मैं निछावर होकर उनके कानों में फुसफुसाते हुए बोली।

सभी की वासना की भूख उस समय के लिए मिट चुकी थी। उस दीर्घ कामक्रीड़ा के पश्चात थककर चूर सभी लोग उसी कमरे में यहां वहां नंग धडंग पसर गये थे। उस वक्त रात का दो बज रहा था। प्रात: जब मेरी निद्रा खुली, मैं ने देखा नौ बज रहे थे। अब तक सभी जानवरों की तरह नंग धड़ंग बेतरतीब, पूरी बेशर्मी से दीन दुनिया से बेखबर खर्राटे भर रहे थे। मैं ने देखा कि सभी अब तक घोड़े बेच कर सो रहे हैं तो मैं अपने बगल में लेटे भैंस जैसे पंडित जी को देखने लगी। बड़े ही वीभत्स रूप रंग, आधे गंजे और बेडौल जिस्म के स्वामी। बड़ा सा तोंद फूल पिचक रहा था। मुह खुला हुआ और ऊपर के बड़े बड़े चार दांत बाहर की ओर निकले हुए उनकेे कुरूप चेहरे को और भी वीभत्स रूप प्रदान कर रहे थे। बड़े बड़े कानों में लंबे लंबे बाल। एक बार तो मैं वितृष्णा से भर गई, छि:, इसी जानवर ने कल रात को मेरे जिस्म को भोगा। फिर मेरी दृष्टि उनके लिंग पर पड़ी जिससे चुद कर मैंने अब तक के संभोग का सर्वश्रेष्ठ और स्वर्गिक आनंद की प्राप्ति की। मेरे अंदर से उनकी शारीरिक कुरूपता से उपजी पल भर की वितृष्णा गायब हो गई और उसके स्थान पर मेरे दिल में पंडित जी के लिए बेइंतहा प्यार उमड़ पड़ा और मैं उनके नग्न जिस्म से चिपक कर उनके मोटे मोटे होंठों को चूम उठी। पंडित जी ने आंखें खोली तो मुझे अपने ऊपर देख कर अपनी मजबूत बांहों में कस लिया और मेरे चुम्बन का प्रत्युत्तर प्रगाढ़ चुम्बन से दिया। उनके मुख से निकलते बदबूदार भभके से भी मुझे कोई घृणा नहीं हुई। फिर मैं उनकी बांहों से आजाद हो कर मीठी मुस्कान के साथ बाथरूम की ओर बढ़ी। पंडित जी भी मेरे पीछे पीछे बाथरूम में घुस गये और मुझे पीछे से पकड़ लिया। उनका मूसलाकार लिंग पूरी तरह सख्त हो कर मेरी गुदा में दस्तक दे रहा था। मैं घबरा कर अहिस्ते से बोली, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा, अभी नहीं बाबा, कोई उठ जाएगा तो? बाद में कर लीजिएगा ना। मैं कहीं भागी थोड़ी ना जा रही हूं।”

“ठीक है बहुरानी ठीक है। बाद में ही सही।” मायूसी से पंडित जी बोले और टनटनाए खड़े लिंग के साथ बाथरूम से बाहर निकल गये। मैं बाथरूम में फ्रेश होकर कपड़े पहन कर उन सबको उठाने लगी, “अरे उठ जाओ भई, नौ बज गए हैं।”

सब उठ गये और एक दूसरे को देखने लगे। सब के सब नंगे। मर्द तो बेशरम थे, इसलिए आराम से कपड़े पहनने लगे, किंतु मम्मी और चाची का तो शर्म से बुरा हाल था। झट से अपने कपड़े उठा कर बाथरूम की ओर भागी। रात की बात और थी। कामुकता का माहौल था और उस माहौल में कामुकता के मारे उन्होंने लाज शरम को ताक पर रख दिया था, किंतु अभी सवेरे सवेरे जब उन्होंने सामान्य माहौल में अपने नग्न देह को इतने नंगे मर्दों के बीच नुची चुदी पड़ी देखा तो लाज के मारे दोहरी हो गयीं। मैं उनकी हालत देख कर मुस्कुरा रही थी।

हरिया तुरंत फ्रेश हो कर किचन में चले गए और मैं भी पीछे पीछे किचन में कदम रखी। अब मैं उस घर की मालकिन थी। मैं ने पीछे से हरिया को बांहों से जकड़ कर बड़े प्यार से पूछा, “पतिदेव जी, अब तो मैं किचन में आ सकती हूं ना?”

“ओह रानी, बिल्कुल बिल्कुल।” कहते हुए पीछे पलटकर मुझे बांहों में भर कर चूम लिया और बोले, “अब तो तू इस घर की मालकिन है मेरी जान, जहां मर्जी जाओ” उनकी इस अदा पर मैं कुर्बान हो गई। हरिया और मैं ने सबका नाश्ता तैयार किया और करीब दस बजे हम सब नाश्ते के लिए इकट्ठा हुए। मां और चाची के चेहरे रात की बातों को सोच सोच कर लाल भभूका हो रहे थे। पंडित जी नाश्ता करने के उपरांत चले गए किंतु जाते जाते आशा और याचना भरी नजरों से मुझे देख रहे थे जिसके प्रत्युत्तर में मैं ने आंखों ही आंखों में जता दिया कि उनकी याचना को मैंने पढ़ लिया है और उनकी याचना व्यर्थ नहीं जाएगी। मैं उनसे मिलती रहूंगी।आश्वस्त हो कर पंडित जी प्रफुल्लित मन से चले गए।

नाश्ते की मेज पर ही नाश्ते के पश्चात दादाजी ने चाची, मम्मी और बड़े दादाजी की ओर मुखातिब हो कर बोले, “हां, तो अब बताओ तुम लोग अपने अपने किस्से जो रात को बोल रहे थे। कामिनी के बाप के बारे में और रमा तू बता अपने बारे में, कि तेरे साथ ऐसा क्या हुआ कि तू इतनी बड़ी चुदक्कड़ बन गई है? वैसे तुझे देख कर तो ऐसा नहीं लगता है कि तुझे कई मर्दों से चुदने का कोई दुःख है।”

“हां मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मैं एक शरीफ घरेलू औरत से चुदक्कड़ औरत बन गई हूं। मैं अपने चुदक्कड़ पन से खुश हूं क्योंकि मुझे इसमें आनंद मिलता है और मैं जीने का पूरा मज़ा ले रही हूं। लेकिन आपलोग जब हमें छिनाल कहते हैं तो मुझे गुस्सा आता है। आप लोग किसी भी औरत को मना कर या जबरदस्ती चोद लेते हैं तो आप लोगों के लिए सब ठीक है, आप लोग शरीफों की गिनती में फिर भी रहेंगे, और हम औरतें अगर यही काम स्वेच्छा से या मजबूरी में करें तो हमें आपलोग छिनाल कहने लगते हैं, ऐसा क्यों?” चाची अपने मन की भंड़ास निकालने लगी थी।

“अरे नहीं रे पगली, तू तो ख्वामख्वाह नाराज हो रही है। चुदाई के वक़्त जब हम तुम औरतों को छिनाल कहते हैं तो वह सिर्फ वक्ती तौर पर दिल का उद्गार है, उत्तेजना के आवेग में निकलता हुआ महज उद्गार। उसे गंभीरता से मत ले। सिर्फ मजा ले। अब बता तेरी कहानी।” दादाजी बोले।

“ठीक है तो सुनिए। मैं शुरू में एक शरीफ घरेलू औरत थी। शादी के दस साल तक मैं एक वफादार पत्नि और एक बच्चे की अच्छी मां थी। मैं पास के सरकारी हाई स्कूल में टीचर हूं। आप लोगों को तो पता ही है कि एक दुर्घटना में मेरे पति, आपके भतीजे राकेश, की मौत आठ साल पहले हुई थी। उस समय मेरी उम्र तीस साल थी। आपके ममेरे भाई अर्थात राजेन्द्र सिंह जी, मेरे ससुर, गांव में रहते हैं। मैं अकेली, पति की मौत के बाद से विधवा मां की भूमिका निभा रही थी। लेकिन एक विधवा का जीवन कितना कठिन होता है यह तो आप सबको पता है खास कर के तब जब एक स्त्री की उम्र तीस साल की हो। मेरी जवानी मेरे लिए हर कदम में मुश्किलें पैदा करता रहता था। सारे मर्द मुझे ऐसी नज़रों से देखते थे मानों मौका मिले तो कच्चा ही चबा जाएं। स्कूल के आवारा लड़के भी कम नहीं थे। 16 – 17 साल के हमारे स्कूल के कई आवारा लड़कों का ध्यान क्लास लेते वक्त पढ़ाई में कम और मेरे तन पर ही ज्यादा रहता था। उनकी नजरों से ऐसा लगता था मानो वे मेरे कपड़े के अंदर भी मेरे नंगे जिस्म को देख रहे हों। ऐसा लगता था मानो उनका वश चलता तो क्लास रूम में ही मेरी चुदाई कर डालते। मैं हवश के भूखे ऐसे किसी भी मर्द को अपने पास फटकने नहीं देती थी। एक सीमा रेखा के बाद न कोई लड़का और न कोई व्यस्क मर्द मुझसे घनिष्ठता कर सकता था। लेकिन एक अकेली जवान औरत कब तक अपने आप को इस समाज की बुरी नजरों से बचा कर रख सकती थी।”

चाची ने आगे बताना शुरू किया, “यह पांच साल पहले की बात है। हमारे स्कूल के सालाना फंक्शन के लिए तैयारी के दौरान अभ्यास और रिहर्सल के कारण घर लौटने में सात आठ बज जाते थे। फाइनल रिहर्सल के दिन रात का नौ बज गया था। उस दिन बड़ी मुश्किल से एक ऑटो मिला। जैसे ही मैं ऑटो में बैठी, मुझे शराब की गंध आई। मैं समझ गई कि ऑटो वाला शराब पिए हुए है। मैं थोड़ी घबराई, किंतु मेरे पास लौटने के लिए उस ऑटो के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं था। मन ही मन भगवान का नाम लेती रही, मगर शायद भगवान की मर्जी कुछ और ही थी। ऑटो वाला करीब चालीस साल का अधेड़ आदमी था। नामकुम चौक और हमारे घर के बीच करीब डेढ़ किलो मीटर का फासला है और हाईवे से करीब दो सौ गज अंदर है। यह रास्ता घनी झाड़ियों के बीच से होकर गुजरता था। शाम होते होते यह रास्ता सुनसान हो जाता था। हाईवे से करीब सौ गज की दूरी पर अचानक ऑटो बाईं ओर घूमा और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, घनी झाड़ियों को पार कर एक खेत के पास रुक गया।

मैं घबराकर बोली, “अरे इधर कहां ले आए तुम?”

“मैं ठीक जगह ले आया हूं मैडम। चिंता मत कीजिए, मैं आपको सही सलामत घर तक छोड़ दूंगा लेकिन आधा घंटा बाद। तब तक थोड़ा मेरा साथ दीजिए।” नशे से लाल लाल आंखों से मुझे खा जाने वाली वहशी नजरों से देखते हुए बोला। मैं उसकी गंदी नीयत को समझ गई थी। उस सुनसान जगह इतनी रात को उस ऑटो वाले से मुझे बचाने कोई आने वाला भी नहीं था।

फिर भी हिम्मत जुटा कर मैं बोली, “तुम करना क्या चाहते हो?”

“कुछ खास नहीं मैडम जी, बस आपके साथ थोड़ा मजा करना चाहता हूं। आपको भी मजा आएगा, आप ऑटो से बाहर तो निकलिए” कहते हुए मेरी बांह पकड़ कर ऑटो से जबरदस्ती बाहर खींच लिया।

“छोड़ो मुझे, यह क्या कर रहे हो? मैं चिल्लाऊंगी।” मैं विरोध करती हुई खोखली धमकी दी।

“चिल्लाने से इतनी रात को कोई यहां नहीं आएगा मेरी जान। आपको पता है मैं क्या करने वाला हूं। चुपचाप मैं जो कर रहा हूं करने दीजिए। बहुत दिन से कोई औरत नहीं मिली है चोदने के लिए। आज किस्मत से आप मिल गई हैं। बिना चोदे कैसे छोड़ दूं।” वह बोल उठा।

फिर भी मैं चिल्लाई, “बचाओ बचाओ”

उस छः फुटे हट्ठे कट्ठे मर्द के सामने मेरे विरोध का कोई असर नहीं हुआ। उल्टे मेरे चिल्लाने से वह गुस्से के मारे पागल हो गया और खींच कर दो झापड़ मेरे गालों पर जड़ दिया और खूंखार आवाज में बोल उठा, “साली कुतिया चिल्लाती है। अब तक मैं इज्जत से पेश आ रहा था, हल्ला करेगी तो गला दबा दूंगा हरामजादी।”

अब मैं गिड़गिड़ाने लगी, रोने लगी, “छोड़ दो मुझे प्लीज।”

“छोड़ दूंगा, घर तक पहुंचा भी दूंगा, पहले मुझे चोदने तो दीजिए।” कहते हुए मुझे घास से भरे हुए जमीन पर पटक दिया और मेरे ऊपर चढ़ गया, ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगा। मेरे रोने सिसकने का उस दरिंदे पर कोई असर नहीं हुआ। फिर मेरे ब्लाऊज और ब्रा को जल्दी जल्दी खोल कर खींच खांच कर अलग कर दिया। उस चांदनी रात में मेरी चमकती हुई नंगी चूचियों को देख कर तो मानो पागल ही हो गया। पान खा-खा कर काले दांत और लाल होंठों के कारण वह और भयानक दिख रहा था, ऊपर से देसी दारू की दुर्गन्ध के कारण मैं घृणा से भर उठी थी। उसने अपने मजबूत पंजों से मेरी चूचियों को बेरहमी दबोच लिया। मैं दर्द से बिलबिला कर कराह उठी। आंखों से आंसू बह निकले। मैं फिर भी उस दरिंदे के चंगुल से आजाद होने के लिए फड़फड़ाती रही छटपटाती रही, लेकिन उस पर तो चुदाई का भूत सवार था। एक हाथ से मेरी चूचियां मसलता रहा और दूसरे हाथ से मेरी साड़ी कमर तक उठा दिया और एक झटके में मेरी पैंटी को नीचे खींच लिया। अब मैं करीब करीब नंगी हो गई थी। मैं जबरदस्ती जांघों को सटाने की कोशिश करती रही मगर उसकी अमानुषि ताकत के सामने असफल रही। उसने जबरदस्ती अपनी उंगली सीधे मेरी सूखी और कसी हुई चूत में पेल दिया। पति के गुजरने के बाद पिछले पांच सालों से मैं किसी मर्द से नहीं चुदी थी, इस कारण मेरी चूत काफी कसी हुई थी। “आह” मैं पीड़ा के मारे कराह कर रह गई। मेरी कराहों को नजरंदाज करके उसने अपनी उंगली को मेरी चूत में अंदर बाहर करना शुरू किया। शुरू शुरू में मुझे काफी दर्द का अहसास होता रहा किन्तु कुछ ही देर में मेरी चूत पनियाने लगी और उसकी उंगली आराम से अन्दर बाहर होने लगी। अब दर्द के स्थान पर मुझे आनंद आने लगा और मेरी कराहट सिसकारियों में बदल गयीं। अब उसने मौका ताड़ कर फटाफट पैंट खोला और चड्डी समेत नीचे खिसका दिया। हां, इतना किया कि लंड निकाल कर मुझे उसका दर्शन कराया, “यह देख मेरा लौड़ा, कैसा है? अच्छा है ना? अब मैं इसी लौड़े से तुझे चोदुंगा।”

पांच साल बाद मैं किसी मर्द का लौड़ा इतने करीब से देख रही थी। चांदनी रात में सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा था। काले घने झांटों से भरा, सात इंच लंबा और कम से कम तीन इंच मोटा, काला काला सांप के जैसा। मैं घबरा कर बोली, “नहीं, प्लीज, मत चोदो मुझे प्लीज, मैं मर जाऊंगी।”

“चुप रह साली कुतिया, तू मरेगी नहीं, तू खुद बोलेगी चोद राजा चोद, और चोद।” वह बेहद घटिया तरीके से बोल उठा। फिर धीरे धीरे मेरे पैरों को फैला कर मेरी चूत के मुंह पर लौड़ा टिकाया और बिना किसी पूर्वाभास के एक ही झटके में पूरा का पूरा लंड मेरी चूत में उतार दिया। “आह्ह्ह् ओह्ह्ह मर गई, आह मा्म्म्म्मा्आ्आ” मेरी दर्दनाक चीख निकल पड़ी। मैं दर्द के मारे छटपटाने लगी, किंतु उस जालिम दरिंदे को तो खून का स्वाद मिल गया था, मेरी चीख पुकार की परवाह किए बगैर दनादन लंड अंदर बाहर करने लगा और बड़ी बेरहमी से मेरी चूचियों को मसलते हुए चोदने में मशगूल हो गया। अब सोचिए, पांच साल से किसी का लंड मेरी चूत में नहीं गया था, इतना मोटे और लम्बे लंड से एकदम टाइट मेरी छोटी हो चुकी चूत की चुदाई से मेरा क्या हाल हुआ होगा। मैं दर्द से बिलबिला उठी थी। वैसे भी मेरे पति का लंड सिर्फ करीब पांच इंच लम्बा और दो इंच मोटा रहा होगा। एक तो इतने लंबे अरसे के बाद और दूसरे मेरे पति से करीब डेढ़ गुना बड़ा लंड, तकलीफ तो होनी ही थी। लेकिन कुछ ही देर की दर्दनाक चुदाई के पश्चात धीरे धीरे मेरी चूत ढीली होने लगी और दर्द भी धीरे-धीरे गायब होने लगा और कुछ ही मिनटों के बाद मैं आराम से चुदने लगी। वह अब अपने गंदे मुंह से मुझे चूमने लगा और मेरी गांड़ के नीचे हाथ लगा कर कस कस के ठाप पर ठाप लगाने लगा। अब मुझे भी मज़ा आने लगा था और मैं भी उत्तेजित हो कर नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवाने लगी।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां, आह आह अम्मा ऊऊऊऊऊऊऊऊफ्फ्फ्फ आ्आ्आ्आ रज्ज्जा्आ्आ्आ ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह,” आंखें बंद कर के आनंद के मारे मेरे मुंह से भी उद्गार निकले लगा।

“हां रानी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह अब आ रहा है ना मज़ा, मैं बोला था ना, मजा आएगा, ओह मस्त चूत है तेरी मैडम, उफ्फ” वह मस्त हो कर बोले जा रहा था और चोदे जा रहा था। करीब आधे घंटे तक चोदने के बाद मुझे कस के दबोच लिया और फचफचा के अपने लंड का पानी मेरी चूत में डालने लगा। आनंद में मग्न खुद के और उसके झड़ने के सुख में डूब गयी और उसके गठीले शरीर से चिपक गई। जैसे ही हम दोनों खलास हुए, तुरंत ही अपने कपड़े पहन कर चुपचाप चलने को तैयार हो गये। मैं किसी तरह अपने फटे चिटे ब्रा और ब्लाउज से अपने तन के ऊपरी हिस्से को ढंक कर साड़ी वगैरह ठीक की। अंदर ही अंदर खुश हो रही थी, इतने सालों बाद लंड नसीब हुआ और चुदाई का मज़ा मिला, मगर उसके सामने प्रकट नहीं होने दी।

“आखिर बर्बाद कर ही दिया मुझे” प्रकट तौर पर बोली।

“झूठ मत बोलिए मैडम, आपको चोदने में मुझे तो बहुत मजा आया, लेकिन आपने भी कम मज़ा थोड़ी लिया है, कैसे आप बोल रही थीं आह राजा ओह राजा और कैसे मुझसे चिपक रही थीं आप।” वह बोल पड़ा।

मैं शर्मिंदा हो कर सर झुका कर रह गई। शुरू मेरे बलात्कार से हुआ मगर अंत सुखद अहसास के साथ हुआ। मेरे अंदर दबी हुई इतने सालों की चुदास फिर से जाग उठी थी।

उस ऑटो वाले ने मुझे घर तक छोड़ा और जाते जाते बोला, “मैडम, हम गरीब लोगों पर इसी तरह मेहरबानी करते रहिएगा।” मैं कुछ नहीं बोली, सिर झुका कर चुपचाप घर के अंदर चली गई। हमारे घर की नौकरानी ने बेटे को खाना खिला दिया था। मैं भी खाना खा कर बेटे को सुला कर सोते सोते सोचती रही कि वैसे भी मैं अकेली औरत कब तक अपने आप को बचाती रहती। कभी न कभी यह तो होना ही था। ऐसे भी एक अकेली विधवा औरत को किसी पराए मर्द से चुद कर अगर सुख हासिल होता है तो इसमें हर्ज क्या है। सिर्फ हमारी बस्ती के लोग ही नहीं, बाहर भी ऐसे मर्दों की कमी नहीं है जो मुझ जैसी औरतों को मौका मिलते ही चोद डालने की फिराक में रहते हैं। बस इस तथाकथित शरीफ लोगों से भरे सभ्य समाज में बदनामी न हो, इसी बात से हम डरते हैं ना? तो बदनामी का डर किसे नहीं है? इस तरह का जो भी काम होता है गुपचुप ढंग से ही तो होता है। मैं ने उसी समय ठान लिया कि अब मैं भी अपने अंदर की आग को और दबा कर नहीं जिऊंगी। शराफत का चोला ओढ़कर चुदाई का मजा लेने के लिए ऐसे बहुत तथाकथित शरीफ मर्द आसानी से मिल जाएंगे। फिर मैं ने अपने अंदर से परपुरुष के संसर्ग की ग्लानि को झटक कर दूर फेंक दिया और निश्चिंत हो कर नींद की गोद में चली गई। दूसरे दिन सवेरे जब मैं उठी, मैं दूसरी औरत बन चुकी थी। मेरे सामने नया सवेरा, नया दिन, नयी दुनिया थी। मुझमें नये आत्मविश्वास का संचार हो चुका था। जब मैं अपने विद्यालय के लिए घर से निकली तो मैं सर झुका कर नहीं, सर उठा कर चल रही थी। अपनी ओर देखते वासना की भूखी नजरों से नजरें मिला कर देखने में मुझे कोई झिझक नहीं महसूस हो रही थी। विद्यालय में भी मेरा आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व मेरे सहयोगी शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के लिए बिल्कुल नया था।

इसके आगे की घटना अगली कड़ी में।

आपकी रजनी।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।