कामिनी की कामुक गाथा (भाग 2)

प्रिय पाठको,

अबतक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह एक अजनबी बूढ़े नें मेरे दूर के रिश्ते के बूढ़े मेरा कौमार्य भंग कर मुझे रति क्रिया के आनंद से परिचित कराया।

पौ फटने से पहले ही वह कामपिपाशु बूढ़ा बड़े ही अश्लील और उत्तेजक अंदाज में मेरे नग्न शरीर पर अपनी जादुई उंगलियां फिराते हुए मुझे जगा रहा था,

” अब जाग भी जा हमार प्यारी बुरचोदी बिटिया रानी, सवेरा होवे का है। जल्दी से आपन कपड़े पहिन के नीचे चल और फटाफट तैयार हो जा नहीं तो कौनो के पता चला तो सब गड़बड़ हो जाई।”

मैं ने अनिच्छा से अलसाए अंदाज में अपनी आंखें खोली और यथास्थिति का अवलोकन किया। हाय राम! हम दोनों मादरजात नंग धड़ंग, बूढ़े के बुरी तरह अस्त व्यस्त सिलवटों से भरी और मेरी योनि से निकले रक्त के धब्बों वाली धोती पर पड़े थे और हमारे चारों तरफ ब्रा, पैंटी, सलवार, कमीज छितराए पड़े थे। मैं लाज से पानी पानी हो उठी। वह बूढ़ा निहायत ही कामुक अंदाज में तृप्त और अपनी विजयी मुस्कान लिए मेरे नंगे बदन को वासना से ओत प्रोत नजरों से निहार रहा था। रात की घटनाएं मेरी आंखें के सामने चलचित्र की भांति सजीव हो उठीं। सारा घटनाक्रम इतनी बेशरमी से भरा था जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। वह बूढ़ा तो कामलोलुप खेला खाया अनुभवी शिकारी था ही, उसके साथ बिताया वह एक ही रात, जिसमें मैं काम वासना के समुद्र में गोता खा कर खुद भी खासी बेशरम हो चुकी थी। मुझे रतिक्रिया द्वारा अपने अंगों का इस तरह नये और नायाब तरीके से इस्तेमाल करना सिखाने वाले तथा चरम आनंद से रूबरू कराने वाले उस कुरूप, बेढब, कामपिपाशु बूढ़े बनमानुष पर अनायास ही अत्यधिक प्यार उमड़ पड़ा और मैं बेसाख्ता बड़ी ही बेशरमी से उसी नग्नावस्था में उस बूढ़े के नंगे जिस्म से लिपट पड़ी और उसके झुर्रीदार चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा बैठी।

किसी पगली दीवानी की तरह मेरे मुंह से, ” ओह मेरे बलमा, ओह मेरे प्यारे चोदू बाबा, आई लव यू सो मच” जैसे अल्फाज निकल रहे थे। मैं अबतक इस अद्वितीय आनंद के खजाने से अपरिचित थी। सच में मैं उस अजनबी बूढ़े के इस बहुमूल्य उपहार से निहाल हो चुकी थी।

फिर इससे पहले कि कोई और छत पर आता, हम दोनों अपने कपड़े पहिन फटाफट नीचे उतर आए और नहा धो कर तरोताजा हो गए लेकिन थकान और अनिद्रा के कारण बोझिल मेरी आंखें रात के तूफान की चुगली कर रही थी जिसे मैं ने अपने प्रयासों से किसी पर जाहिर नहीं होने दिया।

अपने यौनांगों से चरम आनंद प्राप्त करने का मार्गदर्शन कराने वाला वह कुरूप व खड़ूस बूढ़ा मेरे लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं था। उस रात उसनें मानो मेरे लिए स्वर्ग का द्वार ही खोल दिया। मेरे अर्धविकसित सीने के उभारों (जिन्हें बूढ़े बाबा चूची कह रहे थे) के बेरहमी से मर्दन के कारण मीठा मीठा दर्द का अहसास हो रहा था और थोड़ा सूजा सूजा लग रहा था जिस कारण ब्रा पहनने पर पहले से थोड़ा ज्यादा कसाव का अनुभव कर रही थी। मेरी कमसिन कुवांरी चिकनी नाजुक योनी का आकार (जिसे बाबा चूत और बूर कह रहे थे) बूढ़े केे दानवी विकराल लिंग (लंड या लौड़ा) द्वारा रात भर के रतिक्रिया (चुदाई) में क्रूर प्रहारों के कारण सूज कर थोड़ी बड़ी हो गई थी। मुझे चलने फिरने में थोड़ी तकलीफ हो रही थी। मेरी चूत में मीठा मीठा दर्द हो रहा था। मेरे पूरे शरीर का इस तरह बेरहमी से मर्दन हुआ था कि पूरे शरीर का कस बल निकल गया था और पूरा शरीर टूट रहा था। अपने अंदर मैं जो कुछ भी अनुभव कर रही थी उसे मैं ने किसी पर जाहिर नहीं होने दिया।

एक एक कर सब घरवाले घर आ चुके थे लेकिन सिर्फ औपचारिकता निभाते हुए मेरे माता पिता नें इतना ही पूछा कि मैं रात में ठीक से सोई या नहीं। अब मैं उन्हें क्या बताती कि रात भर में मेरी पूरी दुनिया ही बदल गई है। मैं एक कमसिन कली से पूरी औरत बन चुकी हूं। मैं ने सिर्फ छोटा सा उत्तर दिया, ” मैं ठीक हुं।” फिर घर के अन्य कार्यों में व्यस्त हो गई, जैसा कि आम तौर पर मैं करती थी।

दोपहर खा पी कर जब सभी अपने अपने कमरे में आराम कर रहे थे, करीब १ बजे के करीब मेरे कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। मैं थकी मांदी अलसाई, आराम करना चाहती थी किंतु अनिच्छा से दरवाजा खोलना पड़ा। दरवाजे पर वही बूढ़ा खड़ा था और उसके पीछे मेरे दादाजी प्रकट हुए।

“अरे कम्मो बिटिया तू?” दादाजी अवाक् मुझे अविशवसनीय नजरों से देख रहे थे। मैं ने भी दादाजी के इस तरह अकस्मात इस अजीबोगरीब हालात में मिलने की कल्पना भी न की थी। एकदम से घबरा गई थी। दादाजी करीब ६० – ६५ की उम्र के करीब ५’ १०” ऊंचे कद के बुजुर्ग व्यक्ति थे। पहलवानी छोड़े हुए करीब १० साल हो चुका था किंतु पहलवानों वाला शरीर अब भी वैसा ही था, फर्क सिर्फ इतना हुआ कि कसरत छोड़ने के कारण तोंद निकल आया था। रंग सांवला, चेहरे पर बेतरतीब सफेद दाढ़ी मूंछ, गोल चेहरा, भिंची भिंची आंखें, सर पर सन जैसे सफेद ५०℅ बाल, फिर भी देखने में बूढ़े बाबाजी की तुलना में थोड़े बेहतर थे।

” बबुनी का हमको अंदर आने को ना कहोगी?” वह बूढ़ा उसी कामुक अंदाज में मुस्कुराते हुए पूछ रहा था।

” आईए ना आईए ना” घबराहट में जल्दी से मेरे मुंह से निकला। दादाजी भी बूढ़े के पीछे पीछे कमरे में दाखिल हुए। दादाजी के पैर छूकर उठते वक्त अनायास ही मेरी नजर उनकी धोती की तरफ गई और मैं हतप्रभ रह गई। दोनों जंघाओं के मध्य धोती के अग्रभाग में विशाल तंबू खड़ा था। मैं झट से खड़ी हुई और नजरों दूसरी ओर फेर कर उनसे बैठने को कहा। वो दोनों बूढ़े मेरे बिस्तर पर ही बोहिचक बैठ गए और मुझे भी बिस्तर पर अपने बीच में बिठा लिया।

बूढ़ा बोलने लगा,

” हां तो हम कह रहे हैं कि ई तोहरा दादाजी के सब पता चल गया है ई जो हमरे बीच में कल रात हुआ और ई कहता है कि इत्ता नया माल तू कैसे अकेले अकेले खा लिया। असल में हम दोनों दोस्त आज तक हर माल को मिल बांट के खात बानी। एहे ले हम से रहा नहीं गया अऊर हम इसको सब बात बताए दीए अऊर जईसे ही इसको पता चला, ई हमको बोला साला हरामी अकेले अकेले इत्ता नया माल चोद लिया अऊर हमको बताया तक नहीं। एहीसे ई हमरे साथ तोहरा पास आया है।”

मैं यह सुन कर सन्न रह गई। एक तो थकान से मेरा बदन टूट रहा था और ऊपर से यह मुसीबत। मैं घबरा कर बोल उठी, ” नहीं नहीं दादाजी, प्लीज इस बुढ़ऊ के साथ नहीं। आप दोनों कृपा करके जाईए और मुझे आराम करने दीजीए। कल रात इसने मेरा जो हाल किया है कि पूछिए ही मत। रात भर में थका कर पूरा शरीर निचोड़ डाला, अभी तक मेरा पूरा शरीर दुख रहा है।”

दर असल मैं डर भी रही थी कि हमारा यह वार्तालाप किसी के कानों में पड़ गया तो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ेगा।

अबतक चुपचाप दादाजी के मुख से खरखराहट भरी आवाज निकली, “अर्रे तुमको कुच्छो ना होगा बिटिया, तनि सा हमको भी चोदने दे ना। कसम से तुमको बहुते मजा मिलेगा।” दादाजी के मुख से ये बातें सुन कर मैं लाज से दोहरी हुई जा रही थी।

दादाजी बोल उठे, ” सुन बिटिया, पहले हम तोहरा देह के मालिश कर के सारा थकान उतार देब, फिर तू खुद बोलेगी कि आओ बाबा लोग अब चोद:!”

मैं उनकी यह बात सुन कर घबरा गई। ” आप दोनों के सामने? नहीं बाबा नहीं। अकेले अकेले तो फिर भी ठीक है, आप दोनों के सामने? ना बाबा ना, लाज से तो मर ही जाऊंगी। अभी दिन ही दिन में यह सब ठीक है क्या? घर में किसी को पता चल गया तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे।”

“चुप कर बुरचोदी, किसी को पता नहीं चलेगा। सब रात भर के जागल, अभी घोड़ा बेच के सोवत हैं। चल हम दरवाजा बंद करके आवत हैं।” दादाजी अब बेसब्र हो रहे थे। मैं अबतक धीरे धीरे उत्तेजित हो रही थी मगर दोनों कामपिपाशु बूढ़े वहशी जानवरों के बीच परकटी पंछी की तरह फड़फड़ाने का ढोंग कर रही थी। एक नया रोमांच मेरा इंतजार कर रहा था। दो दो बूढ़ों से चुदने की कल्पना मात्र से ही मेरी चूत गीली होने लगी। फिर भी मैं ना ना करती रही।

” प्लीज दादाजी मेरे साथ ऐसा मत कीजिए ना, मैं तो मर ही जाऊंगी।”

मगर वहां मेरी सुनने वाला कौन था। दोनों ने मिल कर आनन फानन में मेरे शरीर को कपड़ों से मुक्त कर दिया। दादाजी की तो आंखें फटी की फटी रह गईं। इतनी दपदपाती नंगी कमसिन यौवना को देख कर एक पल के लिए तो उसके होश ही उड़ गए। वह कुछ पल तो अपलक देखते ही रह गए।

“हम कह रहे थे ना, मस्त माल है। अब देखत का है, शुरू हो जा” बूढ़े के लार टपकते मुख से बोल फूटे।

तब जैसे उसे होश आया और किसी वर्षों से भूखे भेड़िए की तरह मुझ पर टूट पड़े। मेरे होंठों को दनादन चूमने लगे, होंठों को चूसने लगे, मेरे मुंह में अपनी मोटी लंबी जिह्वा डाल कर मेरे मुंह के अंदर चुभलाने लगे। उनके दाढ़ी मूंछ मेरे चेहरे पर गड़ रहे थे लेकिन मैं सहन करने को मजबूर थी क्योंकि अब धीरे धीरे मैं भी उत्तेजित हो रही थी और मदहोशी के आलम में डूबी जा रही थी और मेरे अंदर फिर वही काम वासना की आग सुलगने लगी थी। अपने पहलवानी पंजों से मेरी चूचियों को बेदर्दी से मर्दन करने लगे, मसलने लगे। उनके इस बेसब्रेपन और कामोत्तेजक हरकतों नें मेरे अंदर की अर्द्धजागृत वासना को पूर्णरुपेण भड़का दिया। मैं उनके चंगुल में फंसी चिड़िया की भांति छटपटाने का ढोंग करती रही। लेकिन कब तक।

ज्योंही उसनें मेरे होंठों को अपने होठों से आजाद करके मेरी चूचियों को चूसना चाटना शुरू किया, मेरे मुह से मस्ती भरी आहें फूट पड़ीं।

“आााााह, ओोोोोोोह, उफ्फ्फ्फ, अम्म्मााााा,”

“देखा हम कहते थे ना एकदम मस्त हो जाएगी, देख अब अऊर कित्ता मजा आवेगा।” बाबाजी कह रहे थे और कहते हुए पूर्ण नंगे हो गए। काले कलूटे दानवाकार शरीर और अपने फनफनाते विकराल लंड के साथ बिल्कुल किसी बनमानुष से कम नहीं लग रहे थे। वे बिल्कुल नंग धड़ंग अपने चेहरे पर बेशरमी भरी बेहद अश्लील मुस्कान के साथ खींसे निपोरते हुए मेरे करीब पहुंचे और दादाजी मुझे छोड़ कर फटाफट अपने कपड़े उतारने लगे, इस दौरान बूढ़े नें मोर्चा संभाल लिया और मुझे चूमने लगे, चूची मर्दन करने लगे, फिर मेरी चिकनी बुर की तरफ मुंह करके सीधे बुर को चूसना चाटना शुरू कर दिया। मेरी उत्तेजना अब चरम पर थी और बेसाख्ता मेरे मुंह से “आह उह उफआााा” की आवाजें उबल रही थीं। बूढ़े का विकराल लंड ठीक मेरे होंठों के ऊपर झूल रहा था। इतने सामने से उनके दानवाकार शानदार लंड का दीदार करने का पहला मौका था।

” चल हमार लंडरानी बिटिया, हमार लौड़ा के चूस” बेहद गंदे वहशियाना आवाज में कहते कहते मेरे आह ओह करते खुले होंठों के बीच अपना लंड ठूंस दिया। “उम्म्म्मआााग्घ” आधा लंड एक झटके में भक्क से घुसा कर मेरे मुंह में ही चोदने लगे। मैं पूरी कोशिश कर के भी पूरा लंड मुंह में समा लेने में असमर्थ थी, मगर वह जालिम उधर मेरी चूत चाट चाट कर इतना पागल कर चुका था कि मैं भी उनके लंड को पूरी शक्ति से चप चप कर बदहवास चूसे जा रही थी। बाबाजी मेरी बुर चूसते चाटते गोल गोल नितंबों को बेदर्दी से मसल रहे थे और उस समय मैं चिहुंक उठी जब बाबाजी नें मेरी चूत रस से सने अपनी एक उंगली मेरे संकीर्ण गुदा मार्ग में डाल दिया और अंदर बाहर करने लगे। मैं उनके इस कमीनी गंदी हरकत को रोकना चाहती थी मगर मेरा मुंह उनके लंड से बंद था, मैं कुछ बोलना चाहती थी मगर मेरे मुंह से सिर्फ गों गों की आवाजें ही निकल पा रही थीं। मुझे गुदा मार्ग में उनके उंगली के घर्षण से गुदगुदी हो रही थी। फिर उन्होंने दो उंगली घुसा दी, अब मुझे थोड़ी तकलीफ का अहसास होने लगा किंतु कुछ पलों में वह अहसास तकलीफ की जगह अद्भुत आनंद प्रदान करने लगा। गजब का अहसास था वह। इधर दादाजी हमारी इन हरकतों के मूकदर्शक बुत बने खड़े थे। अचानक बूढ़े नें भक्क से एक करारा ठाप लगाया और पूरा लंड मेरे हलक में उतार दिया और लंड का रस फचफचा कर पिचकारी की तरह छोड़ने लगे और एन वक्त मेरी चूत भी चरमोत्कर्ष की मंजिल पर पहुंच कर छरछरा कर पानी छोड़ने लगी। इसी पल बूढ़े नें अपनी तीन उंगलियां मेरे गुदा मार्ग में प्रवेश करा दिया, मेरा कसा हुआ गुदा मार्ग फैल चुका था और बूढ़ा अपनी तीनों उंगलियों से सटासट मेरी गुदा मैथुन कर रहा था। इधर मैं उनके नमकीन मदनरस हलक में उतारने को मजबूर थी और उधर मेरी चूत से निकलने वाले रस का कतरा कतरा चाट कर बाबा साफ किए दे रहा था।

स्खलित हो कर बाबाजी तो फारिग हो लिए और एक तरफ लुढ़क गये मगर अब तक दादाजी के सब्र का पैमाना भर चुका था। ज्यों ही बूढ़े नें जगह छोड़ी दादाजी किसी भूखे भेड़िए की तरह मुझ पर टूट पड़े। पहली बार मैं ने दादाजी का नंगा पहलवानी शरीर देख कर हत्प्रभ रह गई। उनका लंड बूढ़े के लंड से भी १” लंबा करीब ८” का और उतना ही मोटा करीब ४” का। किसी स्त्री के होश उड़ाने के लिए काफी था और मैं तो एक १७ साल की कमसिन नयी नकोर लड़की, अभी रात को ही तो बूढ़े बाबा के लंड से पहली बार चुद कर चूत की सील तुड़वाई थी। इतना विशाल लंड देख कर मेरी तो रूह फना हो गई।

“ले पकड़ हमर लौड़ा” कहकर सीधे मेरे हाथ में धर दिया।

मैं ने घबरा कर उनका डरावना विकराल लंड छोड़ दिया। “हरामजादी अभी अभी बुढ़ऊ का लौड़ा बड़े आराम से लॉलीपॉप नीयर चूस रही थी और अब हमार बारी आई तो नखरा करे लगली।”

कहते कहते सीधे मेरे ऊपर आया। मेरे पैरों को फैला कर मेरी दोनों जंघाओं के बीच आकर मेरी रस से गीली फिसलन भरी चूत के प्रवेश द्वार में अपने मूसल जैसे लंड के गुलाबी गोलाकार अग्रभाग को टिकाया। मैं दोनों बूढ़ों के बीच फंसी डर और उत्तेजना मिस्रित अवस्था में अपनी चूत की दुर्दशा होते देखने को मजबूर थी। अपना दिल कड़ा करके जबड़ों को कस कर भींच लिया और दादाजी के दानवी लंड का प्रहार झेलने को तत्पर हो गई। अचानक दादाजी नें बगैर किसी पूर्वाभास दिए एक करारा धक्का मारा और एक ही धक्के में मेरे बुर को चीरता हुआ अपना खौफनाक लंड आधा ठोंक दिया। मैं दर्द से बिलबिला उठी मगर उस वहशी दरिंदे नें एक हाथ से मेरा मुंह दबा रखा था ताकि मेरी चीख न निकल पाए। एक पल बाद ही उसनें दूसरा करारा प्रहार किया और अपना पूरा लंड मेरी चूत में पैबस्त कर दिया। मेरी चीख, मेरी आह मेरे हलक में ही घुट कर रह गई। मेरी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई, आंखें फटी की फटी रह गई। मैं छटपटा भी नहीं पा रही थी, उस बूढ़े पहलवान की ऐसी मजबूत गिरफ्त में थी कि हिल भी नहीं पा रही थी, उसपर उस वहशी जानवर के विशाल लंड से फंसी कसमसा रही थी। कुछ पलों तक स्थिर रहकर मेरे होंठों को चूसता रहा, जब मुझे कुछ राहत का अहसास हुआ तो हौले से उसनें लंड बाहर निकाला और फिर एक करारा धक्का दे कर जड़ तक लंड ठोक दिया। इस बार मुझे अपेक्षाकृत कम दर्द का अनुभव हुआ, मेरी चूत को दादा जी अपने लंड के अनुकूल बनाने में कामयाब हो चुके थे और उस चुदक्कड़ बूढ़े के होठों पर विजयी मुस्कान नाच रही थी। फिर जैसे जैसे ठाप पर ठाप पड़ते गये, मेरी चूत फैलती चला गई और दर्द कहां छूमंतर हो गया पता ही नहीं चला, अब दर्द का स्थान अवर्णनीय आनंद ने ले लिया, कामोत्तेजक सिसकारियां मेरे हलक से निकलने लगीं। ” आह अम्मा, आह दादा जी, ओह मेरे चोदू राजा, आााााह, ओंोोोोोोह, हां हां हां,” और न जाने क्या क्या। दादा जी भी कम हरामी नहीं थे, वे भी बड़बड़ा रहे थे,” ले मेरी बुरचोदी, मेरा लौड़ा ले हरामजादी बिटिया चूतमरानी, लंडडरानी प्यारी बबुनी, आज तोहरा बूर के भोंसड़ा बना देब…..” और न जाने क्या क्या अनाप शनाप बके जा रहे थे और कस कस के पहलवानी ठाप पर ठाप लगाए जा रहे थे और मैं अानंदातिरेक से पागल हुई जा रही थी, बेशरम छिनाल की तरह, ” हां राजा, हां दादू, हां चोदू, हां बलमा, हां मेरे चूत के स्वामी, हां मेरे बुुरचोद सैंया, हां मेरे सरताज, हां मेरे लंडराजा, चोद अपनी बेटी को चोद बेटीचोद” और न जाने क्या क्या बके जा रही थी। अब दादा जी भी पूरे रफ्तार से भकाभक छपाछप मेरी चूत की कुटाई किए जा रहे थे। अचानक मुझे लिए दिए वो पलट गए और मुझे ऊपर कर लिया और खुद नीचे से दनादन चोदे जा रहे थे। फिर अनायास ही पीछे से दो और हाथों में मुझे जकड़ लिया। ये मेरे वही बूढ़े बाबाजी थे। मैं तो उन्हें भूल ही गई थी। मुझे महसूस हुआ कि मेरे गुदा द्वार में उनका लंड दस्तक दे रहा है। मैं चिहुंक उठी मगर दो वहशी जानवरों के बीच सैंडविच बनी असहाय अवस्था में विरोध करने की ताकत भी नहीं थी न ही विरोध करने की इच्छा। जो हो रहा था बेहद रोमांचक और उत्तेजक था। मैं ने उनको अपना पूरा शरीर समर्पित कर दिया और उनके रहमोकरम पर छोड़ दिया। एक ताकतवर धक्के के साथ पहले से ढीली मेरे गुदा मार्ग में बाबा नें अपना विकराल लौड़ा घुसेड़ दिया, “आाााााााााााााह ओोोोोोोोोोह,” दर्द और आनंद का वह मिला जुला अहसास। अब मैं समझी कि बूढ़ा क्यों अपनी उंगलियां मेरी गुदा मार्ग में डाल कर संकीर्ण गुदा द्वार को ढीला कर रहा था।

“ले हमार लौड़ा आपन गांड़ में। आाााहहहहह हूंम।” कहते हुए दूसरा ठाप मारा और सरसरा के अपना मूसल मेरे मलद्वार से अंदर अंतड़ियों तक घुसेड़ डाला।

“आााााह मााााा मार डाला रे जालिम जंगली चोदू बुड्ढे।” मेरी चीख मेरे दादाजी के मुंह के अंदर घुट कर रह गई।

“अहा इत्ता मस्त गांड़ जिन्दगी में नहीं चोदल रघु भाई। कईसन चीकन गोल गोल गांड़ है रे तोहार बिटिया। पहले काहे नाहीं तोहरा गांड़ चोदली रे बुरचोदी बबुनी।”

रघु अर्थात राघव सिंह मेरे दादाजी का नाम था, वह बूढ़ा केशव चौधरी, दादाजी उनको केशु कहते थे।

“अरे केशु तू तो गांड़ के रसिया हो, पहले गांड़ काहे नहीं चोदा। पहले ही बुर का उद्घाटन कर दिया।”

” अब का करें, एकर सुन्दर बुर के देख के बर्दाश्ते ना हुआ, सीधे बुरे में लौड़ा पेल दिया। खैर कौनो बात नहीं अब तो एकरा गांड़ मिल गया, अब चोद रहल बानी।”

ये दोनों चुदक्कड़ बूढ़े इसी तरह अश्लील बातें करते हुए मेरे कमसिन नंगे जिस्म के साथ मनमाने ढंग से वासना का नंगा खेल खेल रहे थे और मैं उन वहशी भैंसों के बीच पिसती हुई अपनी इस दुर्दशा में भी अद्भुत आनंद का अनुभव कर रही थी। मेरा बिस्तर मानो कुश्ती का अखाड़ा बन गया हो।

बाबाजी लंड बाहर किए तो पहली बार लगा कि मेरी अंतड़ी भी बाहर आ रही है मगर दादाजी नें अनुभवी शिकारी की तरह अपने थूक से लसेड़ कर लंड डाला था अत: जिस तरह सरसरा कर लंड अंदर गया था उसी तरह सर्र से बाहर भी आया।

फिर क्या था, धकाधक भकाभक मेरी बुर और गांड़ की बेरहमी से कुटाई होने लगी। नीचे से दादाजी ऊपर से वो वहशी बूढ़ा, दोनों नें वह तूफान बरपाया कि मेरे बिस्तर पर धमाधम धमाचौकड़ी, पूरे कमरे में फचफच की आवाजें,, मेरी ” आहहहहह ओहहहहहह उफ्फ्फ्फ हम हंू हाय चोदू नाना हाय रे चोदू दादू ओह बेटी चोदों।” बदमाश बूढ़ा और दादाजी के,” हूं हां हूं हां हूं हां बूर चोदी बिटिया रानी, चूतमरानी बबुनी, हमार प्यारी रंडी, ले हमार लौड़ा खा, ले हमार लंड, तोहरा बुर अब से हमार, तोहरा गांड़ में अब ले हमार लांड़ हें हें अह आह हं हं हं” और हम सब का हांफना, सें फों सें फों की अजीब अजीब गंदी अश्लील उत्तेजक आवाजों से पूरा कमरा भर गया। हम तीनों में मानो पागलपन सवार हो गया, हम में मानो अधिकतम आनंद प्राप्त करने की होड़ मची थी, दीन दुनिया से बेखबर जन्नत की सैर में मशगूल थे। मुझे चरम सुख के साथ साथ इस बात की अत्यधिक खुशी भी मिल रही थी कि अंतत: इतने खड़ूस बूढ़ों के विकराल लंडों को एक साथ चूत और गांड़ में आराम से पूरा का पूरा ले कर चुदने में सक्षम हो गई थी और भरपूर मस्ती के सागर में डूब गई थी। इस दौरान मैं एक बार झड़ चुकी थी। मगर उनकी चुदाई जारी थी, फिर दादाजी नें अपने ताकतवर बांहों में भींच कर फचफचा के अपना मदनरस मेरी चूत में भरना शुरू किया। ऐसा लग रह था मानो गरमा गरम लावा पिचकारी की तरह छरछरा के सीधे मेरे अविकसित गर्भाशय में करीब एक मिनट तक भरता रहा और अचानक उनकी पकड़ ढीली हुई और वे पूर्णतय: स्खलित हो कर किसी भैंस की तरह डकार कर निढाल हो गए। मै दादाजी के बंधन से मुक्त हुई मगर बूढ़ा अभी भी मेरी गांड़ कुटाई में व्यस्त मुझसे गुथा हुआ धमाचौकड़ी मचाए हुए था। मैं परमआनंद के चरम पर थी और मेरा दुबारा स्खलन होने लगा और तभी बूढ़े नें पीछे से मेरी चूचियों को कस कर भींच लिया और मेरी गांड़ से चिपक कर मेरी गांड़ के अंदर फचर फचर पिचकारी की तरह अपने मदनरस से सराबोर कर दिया। हम दोनों एक साथ ही स्खलित हुए। बूढ़ा भी दादाजी की तरह भैंसे की तरह डकारते हुए एक तरफ लुढ़क गया। एक तरफ दादाजी का नंग धड़ंग बनमानुष सा शरीर दूसरी तरफ बूढ़े का नंगा बेढब काला दानवी शरीर और बीच में मैं नंगी चुद चुद कर बेहाल मगर चरम सुख प्राप्त पूर्ण संतुष्ट निढाल पड़ी थी। मैं कमसिन कली से औरत और अब इन दोनों कामपिपाशु बूढ़े वहशी जानवरों द्वारा उनकी वहशियाना अंदाज में नुच चुद कर पूरी बेशरम छिनाल बन चुकी थी। दोनों बूढ़े मुझ चोद कर अब आंखें मूंदे निढाल पड़े थे मगर उनके चेहरे पर पूर्ण संतुष्टी की मुस्कान थी। उन दोनों को उनकी मुहमांगी मुराद जो मिल गई थी। उनके लंड जो कुछ मिनट पहले तक शेर बने दहाड़ मार मार कर मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाला रहे थे, अभी मासूम चूहे की तरह दुबक गए थे।

मैं सचमुच इन बूढ़ों की दीवानी हो गई। मुझे उनपर बेहद प्यार आ रहा था। चोदते समय यही लोग कितने गंदे, बेशरम, बेदर्द थे, जो कि मैं समझती हूं उन पलों की मांग थी, इस वक्त कितने मासूम लग रहे थे। मैं ने प्यार से दोनों के सिरों को सहलाया, अपनी बांहों से अपनी ओर खींच कर चूम लिया और सीने से लगा लिया, वे दोनों भी मासूम बच्चों की तरह मेरे शरीर से चिपक गए। उन्होंने मेरी ओर करवट बदली, दादाजी का बांया हाथ और बूढ़े का दांया हाथ मेरे पीठ के नीचे थे, दादाजी का दांया हाथ और बूढ़े का बांया हाथ मेरे पेट के ऊपर से मेरी कमर को लपेटे हुए आंखें मूंदे मंद मंद संतोष की मुस्कान लिए लेटे हुए थे। मेरी दांयी चूची दादा जी के मुख के पास और बांयी चूची बूढ़े के मुख के पास और मैं चित्त दोनों मादरजात लंगटे बूढ़ों से चिपकी पूरी बेहयाई से लेटी थकान के मारे निढाल पूर्ण तृप्ती के साथ आंखें मूंदे लेटी थी।करीब १५ – २० मिनट बाद मैं ने महसूस किया कि दोनों बूढ़े मेरी चूचियों को धीरे धीरे चूसने लगे, बिल्कुल मासूम बच्चों की तरह जैसे अपनी मां का दूध पी रहे हों। बीच बीच में कहते भी जा रहे थे, “हमार प्यारी माई, हमार मैया,”

मैं बड़े प्यार से उन्हें अपने सीने से लगा कर एक मां की तरह अपनी चूचियां चुसवाने लगी और आनंदित होती रही मगर कुछ ही देर में मेरी चूचियां तन गईं वासना की प्यास फिर जागने लगी, फिर मेरी बूर फकफकाने लगी और दोनों बूढ़े यही तो चाहते थे।

उनके सोए लौड़े फिर फनफना कर चोदने को तैयार हो गये। इस बार उन्होंने आपस में मेरी चूत और गांड़ की अदला बदली करने का फैसला किया था। मैं कहां उनपर ममता बरसा रही थी और कहां ये चुदक्कड़ भेड़िए की तरह मुझे दोबारा भंभोड़ने को बेताब, आव देखा ना ताव, बूढ़ा अपना मूसल लंड लिए मेरी चूत पर टूट पड़ा और अपना लंड पूरा ठेल कर मुझे लिए दिए पलट गया, दादाजी नें जैसे ही मेरी गांड़ को ऊपर उठा पाया, मौके पर चौका जड़ दिया। अपना पूरा ८” का मूसल एक ही झटके में मेरी गांड़ में जड़ तक पेल दिया।”आााााह ओोोोोोोोोोह मांाााााााा,” मेरी कराह निकल गई क्योंकि दादाजी का लंड बूढ़े के लंड से काफी लंबा और मोटा था। लेकिन दो तीन ठाप के बाद मेरी गांड़ ऩें उनके लंड को भी स्वीकार कर लिया। ” आह मेरी गांड़मरानी बिटिया मां, ओह तोहार गांड़ हमार लौड़ा के चूस रहल बा, हाय रंडी बबुनी, हु हु हु ,” दादाजी बड़बड़ा रहे थे। अब फिर वही धमा चौकड़ी, उत्तेजक बड़बड़ाहट, हांफना कांपना, धींगामुश्ती, धकमपेल, ठेलमठेल, गुत्थम गुत्थी के तूफानी दौर की पुरावृत्ति। इतने गंदे ढंग से खुल कर बेहद बेशर्मी भरे कामुक अंदाज में हमलोग काम क्रीड़ा में तल्लीन करीब २० मिनट तक आपस में जोर आजमाईश करते रहे, गुत्थमगुत्था होते रहे, चरम सुख के लिए मानों हम लोगों में होड़ मची थी। लग रहा था मानो एक दूसरे में समा ही जाएंगे । अंतत: हम तीनों मानो एक शरीर बन गए हों एेसे गुंथ कर चिपक गए और मेरे आगे पीछे की गुफा में उन बूढ़े कामुक बनमानुषों का लौड़ा रस भरता चला गया।” फिर एक साथ निढाल हो कर आपस में चिपक कर सो गए।

मैं नादान तो उनसे चुद चुद कर निहाल होती गई। मेरे हर उपलब्ध छेद से उन कमीने बूढ़ों नें अपनी काम पिपाशा शांत की और मुझे एक रंडी की तरह चोद चोद कर इतना आनंद प्रदान किया जिसके वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं उनके हवस की गुलाम बन गई, दासी बन गई, रंडी बन गई, चुदाई का खिलौना बन गई और इस बात का मुझे जरा भी मलाल नहीं था क्योंकि यह सब मेरे लिए बहुत ही अनंददायक और चरम सुख प्रदायक था।

करीब ५:३० बजे हमारी नींद खुली। मेरी चूत फूल कर पावरोटी की तरह बाहर उभर आई थी। गांड़ को भी चोद चोद कर कमीनों नें सुजा दिया था। गांड़ का मलद्वार बड़ा हो गया था, मेरी बुर और गुदा में बूढ़ों का मदन रस भरा हुआ था। मुझे बड़े जोर का पोशाब और पैखाना दोनों आ रहा था, झट से उठ कर बाथरूम भागी और मेरी बुर से छरछरा कर पेशाब निकलने लगा और मेरे कमोड पर बैठते न बैठते भरभरा कर भर्र से उनके मदन रस से लिथड़ा मल निकलने लगा। ऐसा लग रहा था मानो मेरे मूत्राशय से पूरा पानी पेशाब के रूप में और पेट का सारा मल खल्लास होकर साफ हो गया। जब मैं टायलेट से बाहर आई तो मेरा पूरा शरीर हल्का हो चुका था। फिर हम तीनों नहा धो कर तरोताजा हो गए। बाकी घरवालों में से किसी को इस बात का आभास तक नहीं हुआ कि हमारे बीच क्या हुआ, आखिर हमारा रिश्ता और हमारी उम्र भी तो इस तरह की थी कि हमारे बीच इस तरह की घृणित अनैतिक यौनक्रीड़ा की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। हमारे घर वालों नें तो सपने में भी नहीं सोचा होगा कि अपने ही घर में अपने ही बुजुर्गों के हाथों उन्हीं के नाक के नीचे उनकी बेटी सिर्फ पिछले २४ घंटों के अंदर एक मासूम लड़की से पूरी बेशरम छिनाल औरत बन गई है।

आगे की कथा अगली कड़ी में।

आपकी कामुक लेखिका

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।