कामिनी की कामुक गाथा (भाग 25)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि मेरी सुहागरात में मेरे पांचों पतियों और पंडित जी ने मेरी मां और चाची के साथ वासना का नंगा नाच खेला और मनमाने ढंग से उनको भोगा। मैं ने भी बड़ी चालाकी से कुरूप, गन्दे, बेढब, मगर दमदार लिंग वाले पंडित जी से अपनी वासना की आग शांत कर ली। पंडित जी की अदम्य संभोग क्षमता की मैं कायल हो गई। इसी रात में मेरे पिताजी की नामर्दी और समलैंगिकता के बारे में हमें पता चला। सवेरे सभी लोग नहा धो कर फ्रेश होकर बैठक में बैठे गप मार रहे थे, इधर नाश्ता बनाने के लिए मैं और हरिया किचन में व्यस्त थे। अचानक हरिया ने मुझे पीछे से अपनी बाहों में दबोच लिया। मैं हड़बड़ा गई और छूटने की कोशिश का नाटक करने लगी।

“छोड़ो मुझे, रात में मां और मुझे चोद कर मन नहीं भरा क्या?” मैं बनावटी गुस्से से बोली।

“तेरे जैसी बीवी पाकर तो हम धन्य हो गये रानी। इतनी मस्त लौंडिया हमारी बीवी होगी इसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। तुझे एक बार चोदने के बाद मन ही नहीं भरता है, ऐसा लगता है तुझे चिपका कर रखूं। देखो अभी भी मेरा लौड़ा कैसा फनफना रहा है।” वह बोल रहा था और मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया। मेरी नाईटी कमर से ऊपर तक उठा दिया और पैंटी को नीचे खिसका दिया।

मुझे भी मज़ा आ रहा था लेकिन बनावटी गुस्से में बोली, “छोड़िए ना, कैसे आदमी हैं, अभी कोई आ जायेगा तो?”

“कोई आ भी गया तो क्या? सभी तो तेरे पति हैं।” बेशर्मी से बोला।

“मां या चाची आ गई तो?” मैं बोली।

“आने दो, तेरी मां भी तो मुझ से चुद चुकी है। हां तेरी चाची को चोदने की तमन्ना मन में रह गई। मुझे और करीम को तो घास ही नहीं डालती है। मौका मिला तो साली को ऐसा चोदूंगा कि वह भी क्या याद रखेगी।” बोलते बोलते उसने मुझे किचन के स्लैब पर ही झुका दिया और बिना किसी पूर्वाभास के अपना तना हुआ लिंग एक ही करारे ठाप से मेरी योनि में पैबस्त कर दिया।

“उफ्फ” मेरे मुख से आनंद की सिसकारी निकल पड़ी। एक पल रुक कर फिर जो उसने चोदना शुरू किया तो मानो भूचाल आ गया। “आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह उफ्फ” में मस्ती में डूबती चली गई।

“आह रानी कितनी मस्त चूत है ओह मेरी जान।” धकाधक, फचाफच कुत्ते की तरह चोदने लगा और करीब दस मिनट में ही मुझे स्वर्ग की सैर करा दिया। अपने वीर्य को मेरी योनि में उंडेल कर मुझसे अलग हुआ और हम दोनों अपने कपड़े दुरुस्त कर पुनः नाश्ता बनाने में जुट गए।

नाश्ता बनाते बनाते मैं ने हरिया से कहा, “अभी आप कह रहे थे कि चाची ने कभी आप लोगों को घास नहीं डाला। अगर चाची मान जाए तो?”

“क्या? ऐसा हो जाए तो मजा ही आ जाएगा। मैं और करीम तो कई दिनों से इस ताक में हैं। ऐसा चोदेंगे कि वह भी क्या याद रखेगी।” तपाक से हरिया ने कहा।

“ठीक है फिर आज रात को तैयार रहिए।” मैं मुस्कुरा कर बोली।

“ओह मेरी जान, अगर ऐसा हुआ तो मैं तेरा गुलाम हो जाऊंगा।” मुझे बांहों में भर कर चूम लिया।

“अब ज्यादा मस्का मारने की जरूरत नहीं है। रात का इंतज़ार कीजिए।” मैं छिटक कर अलग होते हुए बोली।

इतने में चाची और मां भी किचन में आ गयीं।

“क्या हो रहा है कामिनी?” चाची बोली।

“कुछ नहीं बस नाश्ता तैयार कर रहे हैं।” मैं बोली, लेकिन मेरा चेहरा चुगली कर चुका था।

“तुम लोगों को देख कर तो लगता है नाश्ता कर चुके हो।” चाची मुस्कुरा कर बोली। हम दोनों को तो मानो सांप सूंघ गया।

“जैसा आप सोच रही हैं वैसा कुछ नहीं है चाची।” मैं ने किसी तरह से बात को संभालने की कोशिश की किन्तु असफल रही।

“सब समझती हूं री। नयी नयी शादी है। नया नया स्वाद मिल चुका है। रात को तो बड़ी बेशर्मी से सबके सामने चुद रही थी और अब काहे की शर्म।” चाची बोली।

“छोड़ो ये सब बातें और नाश्ता जल्दी तैयार करो। इन कमीनों के मुंह लग के कोई फायदा नहीं। इसने तो अपनी जिंदगी बर्बाद कर ही ली है। पांच पांच मर्द, छि:, द्रौपदी बनने चली है। भगवान जाने इसका क्या होने वाला है। इनको इनके हाल पर छोड़ दो। नाश्ता करने के बाद शॉपिंग के लिए जाऊंगी। अगर तुझे चलना है तो तू भी मेरे साथ चल।” मेरी मां के कहने के लहजे में तल्खी मैं महसूस कर सकती थी।

“मम्मी तुम मेरी चिंता तो छोड़ ही दो। मैं अपने इस हाल में बेहद खुश हूं। मैं अपनी जिंदगी अपने तौर पर जी कर अपना कैरियर भी बना कर दिखा दूंगी। तुम अपने बेटे को संभालने की चिंता करो।” मैं भी उसी लहजे में बोली।

“तुम लोग शुरू हो गये। अब बस करो। ” कहते हुए चाची ने बात खत्म कर दिया और हम फटाफट नाश्ता तैयार कर खाने की मेज पर आ गए। सबने मिलकर नाश्ता किया और मां चाची को लेकर शॉपिंग के लिए चली गई। इधर रात के लिए मेरे दिमाग में शैतानी कीड़ा चलने लगा। दोपहर खाना खाने से पहले मां और चाची शॉपिंग करके आ गयीं। खाना खाते वक्त हमारे बीच चुहलबाज़ी होती रही लेकिन तब भी मम्मी निरपेक्ष थीं। खैर मुझे क्या। मेरे दिमाग में तो आज रात का प्रोग्राम घूम रहा था।

खाना खाने के बाद आराम करने के लिए मम्मी और चाची अपने अपने कमरों में चले गए लेकिन मेरे पांचों पांडव मेरे साथ मस्ती के मूड में थे। मेरे पीछे पीछे सभी मेरे कमरे में आ गए और आनन फानन में सबने मुझे नंगी कर दिया। मैं झूठ मूठ की ना नुकुर करती रही लेकिन शनै: शनै: अपने आपको उनकी कामुकता के हवाले कर दिया। कौन क्या कर रहा था इससे मुझे कोई लेना देना नहीं था। मेरे होंठों को चूमा जा रहा था, चूसा जा रहा था, मेरे उरोजों को मसला जा रहा था चूसा जा रहा था, मेरी योनि और गुदा द्वार चाटी जा रही थी और मैं आंखें बंद कर मस्ती के आलम में सिसकारियां भर रही थी। इसी क्रम में कब सभी मादरजात नंगे हो गए मुझे पता ही नहीं चला।

मेरी उत्तेजना के चरमोत्कर्ष को भांप कर दादाजी ने मेरी पनियायी योनि में अपने लिंग को सट्टाक से ठोंक दिया “ले मेरा लौड़ा मेरी रानी” और करवट ले कर बड़े दादाजी के लिए मेरी गुदा का द्वार उपलब्ध कर दिया।

बड़े दादाजी ने मौके पर चौका जड़ दिया और “अब मेरा लंड खा” कहते हुए एक ही करारे प्रहार से अपने लिंग को मेरी गुदा में पैबस्त कर दिया। फिर दोनों ओर से मुझे लगे झकझोरने और मैथुन में रम गए। हरिया अपने मूसल सरीखे लिंग को मेरे मुंह में डाल कर मुखमैथुन में लीन हो गया। मेरे दोनों उरोजों पर नानाजी और करीम टूट पड़े और चूस चूस कर लाल कर दिया। करीब पंद्रह बीस मिनट बाद ज्यों ही दादाजी और बड़े दादाजी मुझ पर अपनी पहलवानी दिखा कर फारिग हुए, नानाजी और करीम ने उनका स्थान ले लिया और शुरू हो गये अपनी जोर अजमाइश में।

“अब मेरे लंड का स्वाद चख बुरचोदी साली कुतिया,” कहते हुए करीम ने अपने मेरी योनि में हमला बोला वहीं नानाजी ने “मेरा लौड़ा भी ले मेरी गांड़ मरानी रानी” कहते हुए मेरी गुदा पर। हालांकि मैं दादाजी के लिंग से अपनी योनि कुटवा चुकी थी किंतु करीम के विशाल लिंग ने मुझे चीख निकालने पर विवश कर दिया, आखिर उन लोगों के बीच सबसे लंबा और मोटा लिंग उन्हीं का तो था। मेरे मुंह में हरिया का लिंग अब फूल कर झड़ने के कागार पर था, अतः मेरी चीख हलक से बाहर नहीं निकल सकी, घुट कर रह गई।

“ले पी मेरे लंड का रस आ्मैंआ्आ्आह्ह्ह्” कहते हुए हरिया मेरे मुंह में ही झड़ने लगा और मैं उसी अवस्था में हरिया के वीर्य का एक एक कतरे को हलक से उतारती चली गई। हरिया के फारिग होते ही नानाजी और करीम पूरी स्वतंत्रता के साथ मेरे तन पर पिल पड़े थे ऐसा लग रहा था मानो दोनों के बीच घमासान संग्राम छिड़ गया हो, जिनके बीच मैं पिसती जा रही थी। करीब पच्चीस मिनट बाद करीम ने मुझे छोड़ा और निढाल हो गया। इधर नानाजी मुझे कुतिया बना कर अपने लिंग गांठ को मेरी गुदा के अंदर फंसा कर पलट गये और कहने लगे, “आह मेरी कुतिया, ओह मेरी लंड रानी,” उसी स्थिति में हम एक दूसरे से करीब दस मिनट और लटके रहे। आहिस्ता आहिस्ता नानाजी का लिंग गांठ संकुचित हो हुआ और फच्चाक की जोरदार आवाज के साथ बाहर निकल आया।

“ओह अम्म्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” मैं पसीने से पूरी तरह तर बतर हो चुकी थी। इस दौरान मैं कम से कम चार बार खल्लास हुई। उतेजना के आलम में कितनी बेहिसाब गन्दी गन्दी गालियों का प्रयोग हुआ पता नहीं। इन पांचों ने तो मिलकर मुझे पूरी तरह निचोड़ डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। मैं तो जैसे दूसरी दुनिया में ही पहुंच चुकी थी। नुच चुद कर निढाल आंखें बंद किए मैं लंबी लंबी सांसें ले रही थी। यह सब कुछ मेरे लिए बेहद सुखद था, स्वर्गीय, अवर्णनीय।

“ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे स्वामियों, कितना आनन्द, उफ़, धन्य कर दिया आप लोगों ने मुझे।” मैं बड़ बड़ कर रही थी। मेरे चारों ओर मेरे पति तृप्त हो कर पसरे हुए थे। मेरी कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। शाम को करीब पांच बजे मेरी नींद खुली तो देखा हम सब अभी तक उसी तरह नंग धड़ंग अवस्था में बेतरतीब ढंग से पसरे हुए थे। मैं हड़बड़ा कर उठी और टूटते शरीर के बावजूद बाथरूम में जाकर फ्रेश हो गई और रात के कार्यक्रम के लिए तैयारी करने लग गयी।

इसके बाद क्या हुआ?

अगली कड़ी में।

तबतक के लिए अपनी कामुक रजनी को आज्ञा दीजिए।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।