कामिनी की कामुक गाथा (भाग 27)

प्रिय पाठकों,

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि मैं किस तरह अपने पांचों बुजुर्ग कामुक पतियों के संग सामुहिक संभोग का लुत्फ उठाते हुए किसी व्यस्क कामुक स्त्री की तरह काम क्रीड़ा में निपुणता प्राप्त कर रही थी। इसी दौरान मेरी मां की जिंदगी के बीते हुए कल में घटी कामुकता भरी घटनाओं से रूबरू हुए। उसी दौरान पापा के समलैंगिकता के बारे में भी पता चला, जिसका विस्तार से वर्णन बड़े दादाजी ने किया। इसके आगे की घटना लेकर मैं पुनः प्रस्तुत हूं।

मेरी शादी को लेकर मेरी मां की असहमति और नाराजगी मुझसे छुपी नहीं थी, किंतु मुझे उसकी परवाह कतई नहीं थी। मैं अपने निर्णय से बेहद खुश थी और मैंने जो अद्भुत सुख का स्वाद चखा, उससे मैं पूणतय: संतुष्ट थी। मेरी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। अब आगे पढ़िए:

उसी शाम जब आठ बजा तो मैंने सबको बैठक में इकट्ठा किया और एक नये खेल का आरंभ किया। इस खेल को शुरू करने के पहले मैंने दादाजी के साथ मश्वरा किया था और इसको रोचक बनाने के लिए उनसे सलाह भी ली थी। मेरे खुराफाती दिमाग की दाद देते हुए उन्होंने मेरा साथ देने और सभी को इस खेल में शरीक करने के लिए सहमत करने का जिम्मा भी लिया। मैं ने खेल के बारे में तो बताया था किन्तु उसमें मैं ने धूर्तता पूर्वक अपने ढंग से तैयारी की थी ताकि खेल से सभी उपस्थित मर्दों की इच्छा पूर्ति के साथ ही साथ मेरी खास ख्वाहिश की पूर्ति भी हो। मैं पूरी तैयारी कर चुकी थी खेल को रोमांचक, रोचक और कामुकता पूर्ण बनाने की। मम्मी और चाची के लिए तो चौंकाने वाला खेल होने वाला था। खेल मजेदार था और माहौल के हिसाब से काफी उत्तेजक भी। ठीक उसी समय दरवाजे की घंटी बजी और जब दरवाजा खुला तो दरवाजे पर झक्क सफेद कुर्ते और धोती में पंडित जी को खड़ा पाया। पंडित जी को देख कर मैं ने चकित होने का नाटक किया और दादाजी की ओर असमंजस भरी निगाहों से देखा। दरअसल मैं ने पंडित जी को फोन करके पहले ही इस कार्यक्रम के बारे में बता दिया था और यह भी कह दिया था कि इस बात की किसी को भनक भी न लगने पाए कि उन्हें इस कार्यक्रम के बारे में कुछ भी पता है।

दादाजी पंडित जी को कबाब में हड्डी की तरह देख कर चौंक उठे और बोले, “अरे पंडित जी आप अचानक यहां?”

“मैं इधर से गुजर रहा था तो सोचा क्यों न आप लोगों से मिलता चलूं, सो आ गया।” पंडित जी मुझे लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोले।

मैं सवालिया नज़रों से दादाजी को देखने लगी, “अब?”

पल भर मौन रहकर बड़े दादाजी बोले, “अरे पंडित जी आईए, आप भी इस खेल में शामिल हो जाईए, ठीक मौके पर आप आए हैं” अनजाने में बड़े दादाजी ने उन्हें निमंत्रण दे डाला। दादाजी कुछ बोल नहीं पाए। दरअसल दादाजी को और मुझे ही पता था कि इस खेल में क्या गुल खिलने वाला है। इधर दादाजी की अनभिज्ञता में मैं ने पंडित जी को राजदार बना कर खुद अपनी वासना पूर्ति के लिए पहले ही योजना बना चुकी थी।

दादाजी ने लाचारी में बड़े दादाजी की इच्छा का सम्मान करते हुए पंडित जी को भी इस खेल में शामिल करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। पंडित जी के दिल में तो लड्डू फ़ूटने लगे। मैं भी अंदर ही अंदर अत्यंत खुश थी कि आज फिर से पंडित जी जैसे बदशक्ल, बेढब ही सही मगर दानवी लिंगधारी, कामक्रीड़ा में निपुण तथा अद्भुत अदम्य स्तंभन क्षमता वाले व्यक्ति के हवस की शिकार बन कर पिछली रात वाले अभूतपूर्व अनिर्वचनीय सुख का भोग लगाने का अनमोल सुअवसर प्राप्त होने वाला है।

प्रकटतया अनिच्छा से मैं बोली, “ठीक है पंडित जी आप भी हमारे इस खेल में शामिल हो जाईए। आईए और सामने सोफे पर बैठ जाईए।” उनके बैठते ही पंडित जी का नाम भी लिख कर नाम वाले डिब्बे में डाल दिया। बैठने की व्यवस्था वृत्ताकार थी। मध्य में 8’x10′ का कालीन बिछा हुआ था। मैंने दो डिब्बे निकाले और खेल का नियम बताने लगी। “अभी जो खेल होगा वह पिछली रात की तरह ही होगा लेकिन पार्टनर पर्चियों के द्वारा निर्धारित होगा। चूंकि यहां तीन ही नारियां हैं और छः नर, अतः हो सकता है कि मजबूरी में एक नारी को एक से अधिक मर्दों की प्यास बुझानी पड़े, जैसा कि कल रात मेरे और मम्मी के साथ हुआ था। इन दो डिब्बों में से एक में हम सब के नामों की पर्ची है जिसमें से नाम निकलेंगे और उसी के अनुसार पार्टनर बनेंगे। दूसरे डिब्बे में क्रिया। जिसका नाम निकलेगा, उसके लिए दूसरे डिब्बे से उसके लिए कुछ कुछ छोटे मोटे कार्य निकाले जाएंगे और उस व्यक्ति को वही कार्य सब के सामने पूरा करना होगा। मंजूर है?”

सारे पुरुष एक स्वर में बोल उठे, “मंजूर है, मंजूर है” मर्दों के लिए क्या है, तीनों स्त्रियों में कोई भी चलेगी, तीनों अपने आप में कम नहीं थीं। किंतु मम्मी और चाची असमंजस में थीं। सशंकित होते हुए भी अंततः उन्होंने भी अपनी मंजूरी दे दी। मैं ने डिब्बों से पुर्जी निकालने के लिए पंडित जी को आमंत्रित किया। पहली ही पर्ची में चाची जी का नाम “रमा” निकला। सभी तालियां बजाने लगे। चाची झिझकते हुए सबके सामने आई। दूसरे डिब्बे से पर्ची निकाली। लिखा था “कपड़े उतारो”।

चाची विरोध करते हुए बोली, “यह चीटिंग है।”

“चीटिंग कैसा? हां, पर्ची में लिखा मैंने है, किन्तु पर्ची निकालने वाला तो पर्चियों को पहचानता नहीं है। वैसे भी पंडित जी तो इस खेल में संयोग से ही शामिल हुए हैं, इनको पर्चियों के बारे में क्या पता है।” मैं बोली और सभी ने एक स्वर से मेरा समर्थन किया, क्योंकि अब सभी को आभास हो चुका था कि खेल बड़ा ही मनोरंजक होने वाला है। हां चीटिंग तो मैं कर रही थी, क्योंकि पंडित जी को मैं ने पहले ही फोन पर पर्चियों की पहचान (अलग अलग रंगों के मार्कर के मार्क) के बारे में सब कुछ बता दिया था।

चाची मजबूर थी। पहले उन्होंने साड़ी उतारी। “पूरे कपड़े, पूरे कपड़े।” सभी बोल उठे। सभी पुरुषों के लिंग सिर उठाने लगे थे। फिर ब्लाऊज खुला। उफ्फ क्या नजारा था, ब्रा से बमुश्किल कसे हुए विशाल उरोज बाहर छलक पड़ने को आतुर। मर्दों के मुख से लार टपकने लगे थे। खास कर हरिया का लिंग तो तन कर पैजामा फाड़ कर बाहर निकल आने को बेताब हो रहा था। फिर नंबर आया पेटीकोट का। झिझकते हुए चाची ने पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया और लो, एक झटके में पेटीकोट कालीन को चूमने लगा। ओह गजब का दृश्य था। कसी हुई पैंटी में भी चाची की फूली हुई योनि का उभार और योनि के मध्य का दरार स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। कमरे की दूधिया रोशनी में मझोले कद से तनिक कम, करीब पांच फुट की चाची की उत्तेजक काया दमक रही थी। केले के थंभ की मानिंद जंघाएं और गोल गोल अनुपात से बड़े-बड़े नितंबों की छटा देखते ही बन रही थी। पिछली रात सबके सामने पंडित जी के कामुकता की भीषणता झेल चुकने के बावजूद इस वक्त लाज से दोहरी हुई जा रही थी। अब बारी थी ब्रा और पैंटी की। सभी सांस रोके इंतजार कर रहे थे।

“बस बस और नहीं प्लीज।” चाची ना नुकुर करने लगी। “चुप साली रंडी, कल रात को सब के सामने बेशरम कुतिया की तरह पंडित जी का लौड़ा खा रही थी तब कुछ नहीं हुआ और अब नखरे कर रही है। चल उतार जल्दी।” नानाजी अब बेहद उत्तेजित हो चुके थे। चाची मजबूर थी, खेल के नियम के अनुसार उसे कार्य को पूरा करना ही था। उसने धीरे से अपनी ब्रा का हुक खोल दिया और अपनी बड़ी बड़ी कबूतरियों को बंधन से मुक्त कर दिया। चाची के बड़े बड़े उरोज बेपर्दा हो कर कमरे की रोशनी में दमक उठे। सबके मुंह खुले के खुले रह गए। कल रात को वासना की आंधी में किसी ने इतनी अच्छी तरह चाची के इन विशाल गोल गोल दर्शनीय उरोजों का दीदार नहीं किया था। वहां उपस्थित मर्दों का वश चलता तो चाची पर टूट ही पड़ते, किंतु खेल के नियम से बंधे, अपने अपने स्थान पर बैठे कसमसा कर रह गए। अब बारी थी बहुप्रतीक्षित योनि के बेपर्दा होने की। इतनी देर में शनै: शनै: चाची भी भीतर ही भीतर उत्तेजित होती जा रही थी, जिसकी चुगली उनके खड़े हो चुके चूचक और पैंटी के अग्रभाग में आ चुकी नमी कर रहे थे। चाची ने अब तक अपने को पूर्ण रूप से परिस्थिति के हवाले कर दिया था और एक ही झटके में पैंटी से मुक्त हो गई। इस्स, क्या ही रसीली योनि थी चाची की। फूली फूली योनि, योनि के ऊपर काले काले रोयें और योनि की दरार के निकट चिकना तरल स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पूर्णतय: नग्न चाची की दपदपाती कामोत्तेजक काया मानो माहौल में आग लगा डालने को बेताब थी। माहौल में अब एक चिंगारी दिखाने की देर थी, फिर तो क़यामत ही आ जाना था।

“लो हो गया ना। अब?” चाची ने फौरन पूछा।

“अभी आप वहीं उसी तरह खड़ी रहिए। अभी हम खेल आगे बढ़ाते हैं।” मैं फौरन बोली और चाची के सारे कपड़े समेट कर और कमरे के एक कोने में रख दी।

अब मैं ने पंडित जी को पहले डिब्बे से पर्ची निकालने का निर्देश दिया जिसका पालन उन्होंने तत्काल ही किया। नाम निकला “हरिया”। हरिया के शरीर में तो मानो बिजली दौड़ गई। पल भर में उछल कर सीधे बीच में आ गया। उसकी स्थिति देख कर सभी ठठा कर हंस पड़े। हालांकि उत्तेजना के मारे सभी मर्दों की हालत ऐसी ही थी। हरिया के लिए कार्य निकला, “बुत बन कर खड़े रहो।” हरिया खिसिया गया लेकिन खेल के नियम के अनुसार उसे बुत बन जाना पड़ा। “ये हैं चाची के पहले पार्टनर” मैं बोली। चाची विरोध करने की स्थिति में नहीं थी, चुपचाप खड़ी रही। फिर नाम निकला, “रमा”।

चाची तुरंत बोली, “यह क्या? मेरा नाम दुबारा कैसे निकला?”

“जितनी बार आपका नाम निकलेगा उतनी बार आपके लिए काम भी मिलेगा और आप के लिए पार्टनर का नाम भी निकाला जाएगा। पार्टनर एक से ज्यादा कितने होंगे यह लॉटरी से पता चलेगा।” मैं बोली।

चाची निरुत्तर हो गई। अब उनके लिए काम निकला, “अपने पार्टनर के कपड़े उतारो।”

“नहीं नहीं। मैं हरिया के कपड़े नहीं उतारूंगी।” चाची ने फिर विरोध किया।

“कैसे नहीं उतारेगी, चल शुरू हो जा,” दादाजी डांटे।

अनिच्छा से चाची हरिया के कपड़े उतारने लगी। जैसे ही हरिया का अंतिम वस्त्र कच्छा खुला, चाची तो एक कदम पीछे हो गयी और विस्फारित नेत्रों से देखती रह गई, कुलांचे भरता हुआ टनटनाया आठ इंच लम्बा काला मोटा लिंग नामुदार हुआ ऊपर नीचे होते हुए सलामी देने लगा। ऐसा लग रहा था मानो सिग्नल मिलते ही चाची की फूली दपदपाती योनि का तिया पांचा कर डालने को बेताब हो। छ: फुटा गठा शरीर और आठ इंच का झूमता हुआ लिंग। चाची की हालत देख कर सभी मुस्कुरा उठे। दर असल कल रात को किसी ने एक दूसरे के शरीर को इतने ध्यान से नहीं देखा था, आज सभी कमरे की दूधिया रोशनी में बड़ी फुर्सत से और इत्मिनान से एक दूसरे को बखूबी देख पा रहे थे। अब नाम निकला “लक्ष्मी”, उसे भी उठ कर सबके सामने आना पड़ा। कार्य वही, ” अपने कपड़े उतारो”। मम्मी ने बेझिझक अपने कपड़े उतार दिए। असल में माहौल धीरे धीरे गरम हो रहा था और काम वासना का नशा धीरे धीरे सभी पर चढ़ता जा रहा था, अतः सभी बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। मम्मी ने बिना एक पल गंवाए अपने वस्त्रों से मुक्ति पा ली और लो, उनका पूर्ण व्यस्क, विकसित और कामोत्तेजक नग्न शरीर न सिर्फ आकर्षित कर रहा था बल्कि बाकी बचे मर्दों को आमंत्रण देता प्रतीत हो रहा था। उनके भाग्य में जो पहला नाम निकला वह था नानाजी, अर्थात उनके पिता जी का। नानाजी भी बिना समय गंवाए मम्मी के पास पहुंचे और फिर वही हुआ जो हरिया के साथ हुआ था। मम्मी ने स्टैचू बने हुए नानाजी के शरीर के सारे वस्त्र उतार फेंके और उनका नाटा गैंडे की तरह मोटा तोंदियल शरीर अपने अकड़े हुए फनफनाते विशाल लिंग के साथ गजब का दृश्य प्रस्तुत कर रहे था। फिर नाम निकला रमा चाची का। चाची घबराई अब यह दूसरी बार नाम निकला, पता नहीं इस बार उसका दूसरा पार्टनर कौन होगा। इस बार पूर्वनियोजित नाम करीम चाचा का नाम था। करीम चाचा उछल कर चाची के पास जा खड़े हुए। उनके साथ भी वही हुआ। उनका गठा हुआ लंबे कद का आकर्षक शरीर और उस पर उनका आठ इंच का लंबा और वैसा ही गधे सरीखे मोटा लिंग, चर्मरहित गुलाबी सुपाड़े के साथ अद्भुत नजारा प्रस्तुत कर रहा था। इसी तरह बारी बारी से सबका नाम निकलता गया और अन्ततः चाची के भाग्य में हरिया और करीम, मम्मी के भाग्य में दादाजी, नानाजी और बड़े दादाजी, मेरे भाग्य में काला भुजंग तोंदियल भालू सरीखा पंडित मिला। कहां मेरी दपदपाती सुगठित कमनीय काया और कहां पंडित जी जैसा बनमानुष, निहायत ही बेमेल जोड़ी। मेरे भाग्य पर पंडित जी को छोड़ कर सभी मर्द हंस रहे थे किन्तु मेरी मम्मी और चाची को ही पता था कि मैं ने क्या हासिल कर लिया था, वे ईर्ष्या भरी नजरों से मुझे देखे जा रहे थे। उनकी नजरें मानो कह रही थी, “साली कमीनी कुतिया की तो लॉटरी लग गई।” पंडित जी भी अपनी किस्मत पर अंदर ही अंदर बेहद खुश हो रहे थे, “नयी नकोर, इतनी कमसिन और कमनीय लौंडिया को दूसरी बार भोगने का सौभाग्य जो मिल गया था”। सभी मादरजात नंगे हो चुके थे। सभी कामातुर, बेताबी अपनी चरम पर थी। मैं अपने भाग्य पर मायूसी का नाटक कर रही थी किंतु अंदर ही अंदर बेहद खुश थी कि मेरी योजना कारगर रही। सभी मर्द बेकरारी से सिग्नल का इंतजार कर रहे थे कि कब हरी झंडी मिले और अपने शिकार पर टूट पड़ें। इस वक्त मैं बड़े गौर से स्टैचू बने पंडित जी के पूरे शरीर का मुआयना कर रही थी। उफ्फ कितना वीभत्स रूप था उनका। शारीरिक रूप से तो पूरा बनमानुष ही था। उनके विशाल लपलपाते काले मोटे लिंग के करीब आधे हिस्से पर भी काले काले घुंघराले घने बाल उगे हुए थे इसलिए उनके लिंग की निश्चित लंबाई स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी। तो इसका मतलब यह हुआ कि उनके घुंघराले घने बालों से भरे लिंग का पिछला आधा भाग भी कल मेरी योनि में प्रविष्ट हुआ था जिसके घर्षण से मेरी योनि के भीतरी नाजुक संवेदनशील मार्ग में अद्भुत हलचल मच रही थी। उनके भयावह लिंग के नीचे थैले की शक्ल में वृहद अंडकोष झूल रहा था जिसमें उनका अथाह वीर्य संचित था। कल रात को इतनी अच्छी तरह से मैं पंडित जी के अंग प्रत्यंग का दर्शन नहीं कर पाई थी। मैं बेहद रोमांचित हो उठी थी। मेरी खुुुुद की योनि पनिया रही थी।इस पूरे खेल की सूत्रधार मैं ही थी और मैं अपनी मर्जी से सबको नचा रही थी।

मैंने एक मिनट बाद का अलार्म सेट किया और घोषणा की, “अलार्म बजते ही सभी मर्द अपने शिकार पर टूट पड़ेंगे, पूरी स्वतंत्रता के साथ जैसी मर्जी, पूरी छूट है।” अब तक उत्तेजना के चरम पर पहुंच चुके थे। जैसे ही अलार्म बजा, मानो कमरे में भूचाल आ गया।

मेरी मम्मी पर तीन बूढ़े मर्द पिल पड़े, “ओह बाबा, धीरे, हाय, आराम से कीजिए ना प्लीज़।” मम्मी लगभग चीख पड़ी।

“चुप साली हरामजादी, बुरचोदी कुतिया, चीख मत। कल रात मैंने पहली बार तेरी रंडीपनई देखी है। सारी दुनिया में अपनी चूत बांटती फिरती रही और मैं, जिसके लंड से तू पैदा हुई, वही इतने समय से तेरी चूत की भूख से अनजान रहा। चुपचाप चोदने दे। चल रघु केशू, आज हम तीनों मिलकर इस छिनाल को बताते हैं कि हम किस मर्ज की दवा हैं।” नानाजी अपनी वहशी अंदाज में बोले और तीनों बूढ़े मेरी मम्मी की नग्न देह पर शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मर गई” सिर्फ इतना ही कह पाई मेरी मां। दादाजी ने अपना लिंग मेरी मम्मी के मुंह में जबरदस्ती ठूंस दिया और मम्मी की आवाज़ घुट कर रह गई। नानाजी ने मेरी मम्मी की बड़ी बड़ी दूधिया उरोजों को अपने बनमानुषी पंजों से पकड़ कर बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। बड़े दादाजी ने अपनी एक हाथ की उंगली मेरी मम्मी की योनि में और दूसरे हाथ की उंगली उनकी गुदा में भच्च से घुसा कर मशीनी अंदाज में अंदर बाहर करने लगे। बेबस मम्मी तड़प उठी लेकिन तीनों बूढ़े पूरे वहशियाना तरीके से अपनी मनमानी करते रहे। यह तो क़यामत की शुरुआत थी।

कुछ ही मिनट बाद बड़े दादाजी मेरी मम्मी की पनियायी योनि में अपने लिंग से हमला बोला और एक ही करारे धक्के से पूरा का पूरा लिंग उतार दिया, “ले रानी मेरा लौड़ा अपनी बुर में, ओह साली रंडी, तेरी चूत चोदने का मजा ही कुछ और है, हुम,हुम,हुम,” और मम्मी को लिए दिए पलट गये।

नानाजी ने मौका ताड़ा और सीधे मेरी मां की गुदा में अपने लिंग का प्रहार कर दिया, “ले अब मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में कुतिया, न जाने कितने मर्दों से कुतिया की तरह चुदवाती रही बुरचोदी,” और किसी कुत्ते की तरह पीछे से गुदा मैथुन में ऐसे लिप्त हो गये मानो कई दिनों से संभोग सुख से वंचित होंगे, जबकि कल रात ही उन्होंने मेरी मम्मी के साथ प्रथम बार संभोग का लुत्फ उठाया था। उनकी वहशियाना नोच खसोट वास्तव में उनकी खीझ की अभिव्यक्ति थी, उनकी अपनी पुत्री होने के बावजूद इतने वर्षों से उसके इतने अनगिनत पुरुषों के शारीरिक संबंधों से अनभिज्ञ रहने की खीझ। ऐसा लग रहा था मानो वे कल रात की कसर पूरी करने को पूर्ण रूप से कृत-संकल्प हों।

इधर दादाजी लगे हुए थे मेरी मम्मी के मुह में लिंग अंदर बाहर करने में, “चूस हरामजादी, मेरा लौड़ा चूस साली मां की लौड़ी,” और मेरी मां के मुंह से सिर्फ गों गों की आवाज ही सुनाई पड़ रही थी। मैं अभी मम्मी की दुर्गति देख ही रही थी कि मेरी चाची की हौलनाक चीख ने मेरा ध्यान चाची की ओर आकृष्ट किया। हरिया और करीम, दो हट्ठे कट्ठे मर्द, एक साथ चाची की नग्न देह पर किसी शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े थे और उतावलेपन में चाची की भरी पूरी मांसल देह की तिक्का बोटी करने पर उतारू थे। इतने सालों बाद इस सुनहरे मौके को पा कर लग रहा था कि आज ही पूरी कसर निकाल लेने को आमादा थे।

“ओह हरामियों, हाय हाय, मार ही डालोगे क्या मुझे?” चाची चिचिया रही थी। हरिया जहां चाची की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से मसलते हुए उनके रसीले होंठों, गालों और गले को पागलों की तरह चूम रहा था वहीं करीम चाचा उनकी पावरोटी की तरह फूली हुई योनि में मुंह लगा कर कुत्ते की तरह चाट रहा था और उनकी उंगली मशीनी अंदाज में चाची की गुदाज गुदा के अंदर बाहर हो रही थी। दो पहलवानों के बीच चाची परकटी पक्षी की तरह छटपटा रही थी।

“आज मौका मिला है साली रंडी को चोदने का। हाय हाय मत कर बुरचोदी। बहुत तड़पे हैं हम। करीम, चल इस हरामजादी को अपने लौड़े का कमाल दिखाते हैं।” हरिया के मुख से किसी वहशी दरिंदे की तरह उद्गार निकले।

“ठीक कहा हरिया। आज ऐसा चोदना है कि इस कुतिया को जिंदगी भर याद रहे। आज तक इस रंडी को किसी ने ऐसा नहीं चोदा होगा।” करीम चाचा भी कामोत्तेजना के आवेश में पूरे जानवर बन चुके थे। चाची बेचारी के पास उन दरिंदों की धींगामुश्ती को झेलने के अलावा और कोई चारा नहीं था। फंस चुकी थी हमारे बिछाए जाल में, हरिया और करीम को तो हमारी पूर्वनियोजित षड़यंत्र के तहत मुंहमांगी मुराद मिल चुकी थी, अब वे जी भर के मेरी चाची के शरीर से मनमाने ढंग खिलवाड़ करने को स्वतंत्र थे, जो वे कर भी रहे थे। उनके कामुक हरकतों के फलस्वरूप चाची अपने ऊपर हुए आकस्मिक आक्रमण के आरंभिक खौफ से उबर चुकी थी और उत्तेजना के मारे उनका शरीर अकड़ने लगा, थरथराने लगी वह।

“अब चोद भी डालो हरामजादों” उत्तेजना के आवेग में अंततः चाची सके मुंह से बेसाख्ता निकल ही पड़ा।

“हां री कुतिया, आज तो पूरी कसर निकालनी है, देख हमारे लौड़े कैसे फनफना रहे हैं” कहते कहते हरिया ने आव देखा न ताव, सीधे चाची की टांगों को फैला कर उनकी पनियायी फूली हूई योनिद्वार में अपने आठ इंच लंबे बेलन सरीखे लिंग का सुपाड़ा टिकाया और एक ही भीषण प्रहार से पूरा का पूरा लिंग चाची की योनि में पैबस्त कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्” एक दर्दनाक चीत्कार चाची के मुंह से उबल पड़ी।

“ऐसे चीख मत बुरचोदी। अभी कह रही थी चोद भी डालो, अभिए से चिचिया रही है, यह तो शुरुआत है, अभी तो लौड़ा सिर्फ घुसा है, चोदना तो अब शुरू होगा साली चूतमरानी।” कहते कहते चाची की हालत को नजरंदाज करते हुए लगातार पंद्रह बीस धुआंधार ठापों की झड़ी लगा बैठा “हुं हुं हुं हुं हुं हुं, अब ठीक है, करीम अब तू भी आ जा भाई,” कहते हुए चाची को लिए दिए पलट गया और चाची की गुदा ऊपर हो गई।

इससे पहले कि चाची को सांस लेने का मौका मिलता, करीम पल भर में ही चाची के ऊपर सवार हो गया और अपने तनतनाए लिंग को एक ही झटके में चाची की गुदा द्वार में प्रविष्ट करा दिया, “ले साली कुतिया मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, ओह ओ्ओ्ओ्ओह कितना टाईट गांड़ है ओह ओ्ओ्ओ्ओह मजा आ गया,” कहते हुए उसने भी दनादन कई झटके मार डाला।”

“आह्ह्ह्ह्ह मार डाला रे हरामी ओह्ह्ह्ह फाड़ दिया मादरचोद हाय मेरी गांड़ फट गई हाय हाय हाय।” चाची की करुण चीत्कार से पूरा कमरा गूंज उठा, किंतु यह चीखें कुछ ही पलों में आनंद भरी सीत्कारों में परिवर्तित हो गईंं, “आह ओह चोदो हरामियों, आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह खा जाओ मुझे, रगड़ डालो मुझे, मसल डालो मुझे, आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स” और फिर क्या था, वासना का तूफान ही उठ खड़ा हो गया। धकमपेल, धींगामुश्ती, एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद और साथ ही साथ बेहद गंदी गंदी वासना से ओत प्रोत अल्फाज उबलने लगे उनके मुंह से।

मैं वहां के माहौल को मंत्रमुग्ध निहार रही थी, उत्तेजना के मारे मेरा भी बुरा हाल हो गया था, पूरे शरीर पर चींटियां दौड़ रही थीं और तभी गजब हो गया, मेरे खुद का चुना हुआ बनमानुष नुमा मर्द, बिना एक पल गंवाए मुझ पर किसी जंगली जानवर की तरह टूट पड़ा था और मेरी नंगी देह को किसी गुड़िया की तरह अपने दैत्याकार बाजुओं में दबोच कर अपने सूअर जैसे थूथन से मेरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा रहा था। मैं उनके इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं थी, हकबका उठी। उफ्फफ, ऐसा लग रहा था मानो मेरी पसलियां चरमरा उठी हों। मेरी सांस ऊपर की ऊपर ही रह गई किंतु अब मैं पूरी तरह पंडित जी के चंगुल में थी, परकटी पंछी की तरह छटपटाने के सिवा कुछ कर भी नहीं सकती थी। सच तो यह था कि मैं कुछ करना चाहती भी नहीं थी। उस जंगली जानवर के वहशीपन का पूरा अनुभव करना चाहती थी। उनकी हर वहशियाना हरकतों को झेलने के लिए अपने मन को कड़ा करके सिर्फ दिखावे की छटपट करते हुए, “आह्ह्ह्ह्ह छोड़िए, ओह्ह्ह्ह मार ही डालिएगा क्या, उफ्फ्फ हाय राम,” कहती कहती समर्पित होती चली गयी। पंडित जी पूरे जोश में थे। पूरी बेदर्दी से मेरी चुचियों को मसलने लगे। मेरे मुंह के अंदर अपनी लंबी मोटी जीभ डाल चुभलाने लगे। उनका भीमकाय लिंग मेरी योनी के अंदर पैबस्त हो कर फाड़ डालने को बेताब, बार बार मेरी योनी द्वार पर ठोकर मार मार कर मेरे अंतरतम को आंदोलित किए जा रहा था। मेरी उत्तेजना पूरे चरम पर थी। योनी फकफका रही थी। पनिया उठी थी। पंडित जी ने अपनी एक उंगली मेरी योनी के लसलसे पानी से भिगोकर मेरी गुदा मे ठोंक दिया। मैं चिहुँक उठी और अनायास ही झटके से बेध्यानी मे और आगे बढ़ गयी, परिणाम स्वरूप मेरी पनिया उठी योनी खुद ही उनके तनतनाये हुए लिंग का एक तिहाई हिस्सा विशाल सुपाड़े समेत अपने अंदर समाने को विवश हो उठी। पंडित जी की धूर्तता काम कर गई। एक प्रकार से उन्होंने मुझे अपने लिंग से बींध दिया था। “आह्ह्ह्ह्ह” मेरी आह निकल पड़ी। एक झटका मेरी ओर से था तो दूसरा झटका उनकी ओर से था।, जिससे उनका आधा लिंग मेरे अंदर समा गया। उफ्ईफ्फ्फ, गजब का अहसास था वह। मगर यह तो आरंभ था। पंडित जी मुझे लिए दिए फर्श पर लुढ़के और साथ ही एक और करारा ठाप जड़ दिया। “आ्आ्आ्आ्आ्आह,” बेसाख्ता मेरी लंबी चीख निकल पड़ी। सभी मेरी ओर देखने लगे।

“चीख रही है साली रंडी, चोद पंडित इस कुतिया की चूत फाड़ दे। बुरचोदी बहुत स्मार्ट बन रही थी।” चाची दोनों पहलवानों के बीच सैंडविच बनी चीख पड़ी।

“हां हां, ठीक कह रही हो रमा, मेरी बेटी होकर मुझे रंडी की तरह चुदते हुए देख कर कितनी खुश हो रही थी कुतिया। अब पाला पड़ा है ठीक चुदक्कड़ से। पंडित जी, इसे आज ऐसा चोदो कि होश ठिकाने आ जाए। रगड़ रगड़ के चोदो साली को, ठीक कुतिया की तरह।” मेरी मां को अपने दिल की भंड़ास निकालने का अवसर मिल गया। मगर उसे क्या पता था कि मैं क्या अनुभव कर रही थी।

प्रारम्भ मेंं मैं असहाय भाव से इधर उधर सिर झटकने लगी। तभी एक और करारे ठाप से पंडित जी ने अपने 9″ का पूरा लिंग मेरी योनी में उतार दिया। दर्दनाक था वह हमला। ऐसा लगा मानो मेरी योनी में मूसल डाल दिया हो। उफ्फ। कुछ पलों की असह्य पीड़ा को झेल लेने के पश्चात मुझे अद्भुत आनंद की अनुभूति होने लगी। ऐसा लग रहा था कि उनका लिंग मेरे गर्भाशय में समाने को बेताब हो। अगले ही पल उन्होंने सर्र से करीब पूरा लिंग बाहर निकाल लिया और सटाक से फिर घोंप दिया। उफ्फ, मेरी योनी की दीवारों पर उनके मोटे लिंग का घर्षण मुझे पागल किए जा रहा था। पहले धीरे धीरे, फिर धक्कों की रफ्तार बढ़ाने लगा वह कमीना। हालांकि यह मेरे साथ दूसरी बार था लेकिन शायद पंडित जी अधिक जोश में थे और उनकी अदम्य जंगली कामुक नोच खसोट से मैं थोड़ी असहज हो गई थी, किंतु उनकी हर हरकतों से मुझे अलग ही आनंद की अनुभूति हो रही थी। अबतक मैं भी पूरी तरह उनके लिंग पूरी तरह आराम से ले सकने में सक्षम हो चुकी थी। मैं अपने पैरों को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार फैला कर उनके भैंस जैसे मोटे कमर के ईर्द गीर्द लपेट कर किसी छिपकिली की तरह चिपकी उनके हर ठाप का जवाब देने की भरसक कोशिश कर रही थी। आनंद के अतिरेक मेंं मेरी आंखें बन्द हो गयीं थीं। आह वह अकथनीय आनंद, अवर्णनीय सुखद अहसास। मैं सुथ बुध खो कर भैंस जैसे पंडित जी के हर वहशियाना हरकत से विभोर होती जा रही थी।

“आह पंडित जी, ओह राजा, हाय ओह्ह्ह्ह चोदिए आह उफ इस्सस,” मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल रहे थे।

“आह मेरी चूत मरानी कुतिया, ओह्ह्ह्ह क्या मस्त बुर है रे बुरचोदी, आह चोदने मेंं इतना मजा आ रहा है, आह्ह्ह्ह्ह साली रंडी की चूत,” बोलते हुए मुझे रौंदते हुए चोदे जा रहा था। इस सामुहिक चुदाई में सबके मुह से एक से एक अश्लीलता भरे अल्फाज, चुदाई की फच फच, चट चट की आवाजों सी पूरा कमरा भर गया था। बाकी लोग क्या कर रहे हैं और हमारे आस पास क्या हो रहा है इन सबसे बेखबर मैं दूसरी दुनिया में पहुंच गई थी। करीब एक घंटे की कमरतोड़ घमासान चुदाई के बाद एकाएक पंडित जी ने मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया मानो मेरी जान ही निकाल देगा और उसी के साथ उनका अंतहीन स्खलन शुरू हुआ। ऐसा लग रहा था मानो मेरी कोख में गरमागरम लावा भरता जा रहा हो। मैं भी उसी वक्त खलास होने लगी। ओह्ह्ह्ह वह अद्भुत अनुभव, बयान से बाहर। पंडित जी ने इस एक चुदाई में ही मुझे चार बार झड़ने को मजबूर कर दिया। करीब एक मिनट तक पंडित जी का वीर्य मेरी कोख में भरता गया और उनके वीर्य के एक एक कतरे को अनमोल धरोहर की तरह मेरी योनी ने अपने अंदर समाहित कर लिया। तत्पश्चात पंडित जी किसी तृप्त भैंस की तरह डकारते हुए लुढ़क गए। मैं नुच चुद कर निढाल आंखें मूंदे तृप्ति की लंबी लंबी सांसें लेने लगी। फिर सारी शक्ति बटोर कर “आह्ह्ह्ह्ह राजा खुश कर दिया” कहते हुए मैं करवट ले कर पंडित जी के काले तोंदियल भैंस सरीखे बेढब शरीर से लिपट गई और उनके कुरूप चेहरे और थूथन पर चुम्बनों की बौछार कर बैठी, आखिर इतने अकथनीय सुख से मुझे लबरेज जो कर दिया इस कमीने ने। पंडित जी के चेहरे पर तृप्ति की मुस्कान खेल रही थी। फिर मैं ने चारों ओर दृष्टि फेरी तो यह देख कर मुस्कुरा उठी कि सभी लोग नंग धड़ंग बेतरतीब छितराए हुए बेखबर आंखें बंद किए लंबी लंबी सांसें ले रहे थे। मां और चाची की बड़ी बड़ी चूचियां लाल हो चुकी थीं। उनकी योनियों के ईर्द गीर्द मर्दों के वीर्य लिथड़े हुए थे। खास कर चाची की योनी की हालत बता रही थी कि किस बुरी तरह से हरिया और करीम नें भंभोड़ा था। पावरोटी की तरह फूल गई थी और लाल भी कर दिया था कमीनों ने। मेरी खुद की हालत भी क्या कम बुरी थी। मेरी चूचियों का इतनी बुरी तरह से मर्दन हुआ था कि लाल हो कर सूज गई थी। मीठा मीठा दर्द उठ रहा था। मेरी योनी की इतनी भयानक चुदाई आज पहली बार हुई थी, फुला दिया था कमीने पंडित जी ने। पंडित जी ने मुझ पर पूरी तरह जोर आजमाईश कर ली थी और मेरा शरीर निचोड़ कर रख दिया था। मेरे शरीर का एक एक पुर्जा ढीला कर दिया था हरामी ने। मेरा पूरा शरीर टूट रहा था। पूरे शरीर में मीठा मीठा दर्द तारी हो चुका था। इतनी बुरी तरह से मुझे नोचा खसोटा था किंतु अपने अदम्य संभोग क्षमता से संभोग के अद्वितीय आनंद से रूबरू करा दिया। मैं पूर्णरूपेण संतुष्ट हो गई थी और दीवानी बना दिया था मुझे अपनी चुदाई का। थक कर चूर मैं ने अपना सिर फिर से पंडित जी के बालों से भरे चौड़े चकले सीने पर रख दिया और पंडित जी ने मुझे अपनी बनमानुषी बांह से समेट लिया। मैं अनंत सुख के अहसास के साथ पल भर में गहरी निद्रा के आगोश में चली गई।

इसके बाद की घटना अगली कड़ी में। तबतक के लिए मुझे इजाजत दीजिए। आप लोगों की कामुक लेखिका

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।