कामिनी की कामुक गाथा (भाग 30)

अबतक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह कामिनी एक प्रतिष्ठित संस्थान में उपप्रबंधक के पद तक पहुंची। उसने परित्यक्त और असहाय वृद्धों के लिए स्वर्गीय नानाजी के नाम पर “स्व.माधव सिंह वृद्धाश्रम” खोल लिया था जहां रहने वाले वृद्धों की सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता था। उन्हें बिल्कुल भी इस बात का अहसास नहीं होने दिया जाता था कि वे परित्यक्त और असहाय हैं। उनमें से तीन लोग तो विकलांग भी हैं। एक का दाहिना पैर बचपन से लकवा ग्रस्त था जिस कारण, वह पैर छोटा रह गया था और नकारा हो गया था। एक का बांये हाथ की कलाई कोढ़ के कारण गल चुकी थी। इलाज के बाद कोढ़ तो ठीक हो गया मगर बांयें हाथ में ठूंठ केवल रह गया। एक का एक आंख नहीं था। बीस साल पहले चेचक के कारण उसे एक आंख से हाथ धोना पड़ा था। एक मानसिक रोगी था, जिसे मनोरोग चिकित्सालय से चिकित्सा के उपरांत इसी आश्रम में रख लिया गया था क्योंंकि उसके रिश्तेदारों का अता पता ही नहीं था। बाकी ऐसे वृद्ध थे, या तो उनका कोई ठौर ठिकाना नहीं था, या परित्यक्त थे। एक वृद्ध को उनके घर से मार पीट कर घर से निकाल दिया गया था, जिनके बारे में मैं ने सुना था कि वे अपनी बहु पर गंदी नजर रखते थे। क्या सच था क्या गलत यह तो उस वक्त पता नहीं था किंतु उनकी दयनीय स्थिति देख कर उन्हें वृद्धाश्रम मेंं रख लिया गया था। इसी तरह सबकी अपनी अपनी कहानी थी। सभी बेसहारा थे। उनमें स्वावलंबन की भावना बनी रहे इस बात का भी पूरा ध्यान दिया जाता था। वे किसी न किसी कार्य में अपनी उपयोगिता साबित भी करते थे। बागवानी से लेकर गृह उद्योग तक में उनकी भागीदारी थी, जैसे फूलों के पौधों की देखरेख, सब्जियों की खेती, पापड़ बनाना इत्यादि। मैं जब वहां जाती तो सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगता था। उनके बीच आपसी प्रेम और सहयोग देखते ही बनती थी। उनमें हिन्दू, मुस्लिम सिख, इसाई, सभी धर्म के लोग थे, जिनके बीच सौहार्दपूर्ण मधुर संबंध स्थापित हो चुका था। उनके लिए धर्म से ज्यादा आपसी प्रेम का महत्व सबसे ज्यादा था। वृद्धाश्रम की सारी व्यवस्था की देख रेख के लिए हरिया और करीम तो थे ही, उनकी सहायता के लिए और चार लोगों को नियुक्त कर रखा था, दो ससुराल से प्रताड़ित और उपेक्षित विधवा स्त्रियां करीब पैंतीस चालीस की उम्र के और एक युवक राजेश करीब तीस साल का, जो अविवाहित था और विवाह संबंध में उसकी कोई रुचि भी नहीं थी, सारा हिसाब किताब देखता था और एक आदमी रफीक, जो मुस्लिम था, संतान विहीन विधुर, करीब पैंतालीस साल का, मार्केटिंग देखता था। साफ सफाई मेंं, खाना बनाने में और भी अन्य कार्यों में सभी एक दूसरे का हाथ बंटाते थे और वे दो स्त्रियां, पानमती और कुनीबाई इन सब कार्यों में उनकी मदद किया करती थीं। इन चारों को काम पर रखने की भी अलग अलग रोचक घटनाएं थीं, जिनके बारे में मैं आगे बताऊंगी। ये चारों यहां के माहौल में रम गये थे, घुलमिल गये थे और यहां जितने भी लोग थे उनके आपसी संबंधों के बारे में जानकर, (खुले आपसी यौन संबंधों के बारे में भी) इन्हीं में से एक हो गए थे। ये भी बुजुर्गों से यौनाचार में बराबर शरीक हुआ करते थे। इन चारों को वृद्धाश्रम में काम पर रखने के पीछे की कहानियां भी कुछ कम रोचक नहीं हैं।

उन कहानियों से पहले मैं यह बता दूं कि कामिनी को वृद्धाश्रम खोलने की बात उसके दिमाग में कहां से आई। आईए हम इसके बारे मेंं जानने के लिए कामिनी की पिछली जिंदगी के पन्ने पलटते हैं और उसी के संस्मरण के रुप में सुनते हैं।—–

…..नौकरी ज्वॉईन करने के बाद मैं कुछ अधिक व्यस्त हो गई। मैं सवेरे नौ बजे ऑफिस के लिए रवाना हो जाती थी और पांच बजे के बाद घर लौटती थी और कभी कभी काम की अधीकता के कारण नौ दस बजे भी। दरअसल यह एक विदेशी कंपनी थी जो छोटे बड़े उद्योगपतियों के सलाहकार के रुप में कार्य करती थी। इसके देश विदेश में करीब एक सौ शाखाएं थीं जिसमें से बीस शाखाएं भारत में थीं। उनमें से एक शाखा रांची में था। क्लाईंट्स को सलाह देना, योजना का प्रारूप देना ओर मार्गदर्शन करना हमारी कंपनी का मुख्य कार्य था। कंपनी के कार्य के अंतर्गत क्लाईंट्स से मीटिंग्स निश्चित करना और उन बैठकियों में आवश्यकता अनुसार शिरकत करना भी मेरी जिम्मेदारी थी। मेरी वाक्पटुता, व्यवहारकुशलता और मेरा आकर्षक व्यक्तित्व क्लाईंट्स को हाथ से निकलने नहीं देता था। कभी कभी जब क्लाईंट्स हाथ से फिसलने वाले होते थे तो यदा कदा क्लाईंट्स को हाथ में रखने के लिए मैं उन्हें “खुश” करने मेंं भी पीछे नहीं रहती थी। मैं इन मामलों में महारत हासिल कर चुकी थी। मेरी अदम्य कामुकता इन सबमें काफी सहायक सिद्ध होती थी। अलग अलग तरह के अलग अलग रुचि रखने वाले लोगों से मेरा पाला पड़ चुका था। आरंभ में मुझे तनिक असहज महसूस होता था, किंतु अब मैं इन सबकी अभ्यस्त हो चुकी हूं।

यूं तो सामान्यत: क्लाईंट्स के साथ सारे डील हमारी कुशल और प्रभावी प्रस्तुति से ही हो जाया करते थे, तथापि कुछ कुछ शौकीन मिजाज हवस के पुजारी क्लाईंट्स की कामलोलुप नजरें मेरी कमनीय देह पर चिपकी रहतीं थीं और डील को अंतिम रुप देने में बहाने बाजी करते थे। कारण स्पष्ट नहीं बता कर टाल मटोल करते थे। ऐसे किस्म के क्लाईंट्स अक्सर रस्मी तौर पर व्यवसायिक मीटिंग के पश्चात फाईनल एग्रीमेंट से पहले मुझसे व्यक्तिगत तौर से मिलने की ख्वाहिश जाहिर करते और जब मैं अकेले में उनसे बातचीत करती तो एग्रीमेंट की शर्त के तौर पर मेरे सामने हमबिस्तर होने का खुला प्रस्ताव रखते थे।

पहली बार जब एक ऐसे ही क्लाईंट से मेरा पाला पड़ा तो मुझे स्पष्ट तौर पर कुछ समझ नहीं आया, हालांकि उनकी नजरों में अपने लिए हवस की भूख अच्छी तरह देख सकती थी। शुरुआत सीधे तौर पर न हो कर मेरी अनभिज्ञता मेंं हुआ।

उनके साथ शुरूआती बातचीत कुछ इस प्रकार थी।

उन्होंने मेरे बॉस रिचर्ड साहब से कहा, “मैं इस डील पर ऊपरी तौर पर सहमत हूँ लेकिन इस पर हस्ताक्षर करने के पहले मैं इस प्रोजेक्ट का बारीकी से अध्ययन करना चाहता हूं और मैं चाहता हूं कि आप अपने असिस्टेंट के हाथों में शाम को होटल अशोका भेज दीजिए। मैं वहीं कमरा नं 10 में ठहरा हूं।”

“Do you have time in the evening Kamini? (कामिनी, क्या तुम्हारे पास समय है शाम को?)” बॉस ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए पूछा।

“Yes boss, I will manage to spare time for this. (जी हां सर, मैं इसके लिए समय निकाल लूंगी)” मैं तनिक झिझकते हुए बोली।

“OK, done Mr. Mehta, you will get the file in the evening today itself as your wish. (ठीक है मि. मेहता, आपको आज ही शाम आपकी इच्छा अनुसार फाईल मिल जाएगी।” बॉस ने कहा। सिर्फ मैं ओर मेहता जी ही

शाम को ठीक छ: बजे, जैसा कि तय हुआ था, मैं प्रोजेक्ट की फाईल लेकर होटल अशोका पहुंच गई। मैं ने गहरे नीले रंग की खूबसूरत शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी और उसी से मैच करती हुई लो कट ब्लाऊज। मैं दिल ही दिल में सशंकित भी थी। तनिक घबराहट भी थी, पहली बार मुझे किसी क्लाईंट से इस तरह अकेले कमरे में व्यवसायिक अनुबंध के लिए मिलना हो रहा था। वैसे भी मेहता जी की नजरों से और उनके हाव भाव से उनके के बारे में मेरे दिल में कोई अच्छी राय नहीं थी, किंतु मेरे लिए अनुबंध पर मेहता जी का हस्ताक्षर ज्यादा महत्वपूर्ण था, अतः मैं ने अपने मन से झिझक और घबराहट को झटक दिया और कमरा नं. 10 के दरवाजे पर दस्तक दी। कुछ ही पलों में दरवाजा खुला, मगर दरवाजा खोलने वाला मेहता जी के बदले कोई विशाल डील डौल शख्शियत वाला छ: फुटा, अर्द्धगंजा, कंजी आंखों और तोते जैसी नाक वाला, होंठों पर बड़ी ही भद्दी मुस्कुराहट लिए कोई अजनबी अधेड़ था। मैं असमंजस में थी, तभी पीछे से मेहता जी की आवाज आई, “अंदर आ जाईए कामिनी जी, ये राधेश्याम जी हैं, हमारे बिजनेस पार्टनर। इन्हें भी हमारे प्रोजेक्ट की डिटेल देखने के लिए मैंने बुलाया है।”

“ओह” मैं ने सिर्फ इतना ही कहा और अंदर आ गई। पीछे से उस व्यक्ति ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। अंदर मैं ने देखा बड़े से कमरे के एक तरफ लंबे सोफे पर मेहता जी बैठे हुए थे। उनके होठों पर भी कामुकता भरी मुस्कुराहट खेल रही थी। मैं तनिक असहज महसूस करने लगी।

मेरी झिझक को ताड़ कर मेहता जी ने कहा, “आप घबराईए मत, यहां आ कर सोफे पर रिलैक्स हो कर बैठ जाईए और अपनी फाईल सामने सेंटर टेबल पर रख कर हमें प्रोजेक्ट की बारीकियों को विस्तार से समझाईए। राधेश्याम जी आप भी आ जाईए।” कहकर उन्होंने मुझसे अपने दाहिने बगल में बैठने के लिए बुलाया। मैं झिझकते हुए उनके बगल में उसी सोफे पर थोड़ी सिमट कर बैठ गयी। इधर राधेश्याम जी भी उसी सोफे पर मेरी दाहिनी ओर आ कर बैठ गए। मैं और तनिक सिमट गई। अब मैं ने ज्यों ही फाईल खोला, राधेश्याम जी और मेहता जी मुझ से और सट कर बैठ गए, फाईल को ध्यान से देखने के बहाने। अभी मैं ने फाईल खोल कर बताना शुरू ही किया था कि राधेश्याम जी ने अपना बांया हाथ मेरी दांयी जांघ पर रख दिया।

मैं घबरा कर बोली, “राधेश्याम जी, यह आप क्या कर रहे हैं। अपना हाथ हटाइए यहां से।” मैं ने उनका हाथ हटाने की कोशिश की, किंतु उन्होंने हाथ हटाने की बजाय मेरी जांघ को सहलाना शुरू कर दिया।

“अरे उस फाईल को मारो गोली, हम तो पहले इस ‘फाईल’ को खोल कर ‘पढ़ेंगे’ फिर अपनी ‘कलम’ से ‘साईन’ करेंगे।” अपनी भोंड़ी आवाज में राधेश्याम जी ने कहा।

मैं हड़बड़ा कर उठने को हुई, तभी मेहता जी ने मेरी कमर पर हाथ डाल दिया और वासना से ओतप्रोत आवाज में बोले, “जाती कहाँ हो मेरी जान, हम दोनों पार्टनर जबतक अच्छी तरह से ‘इस खूबसूरत फाईल’ को नहीं पढ़ लेते, तब तक उस फाईल में हस्ताक्षर नहीं करेंगे। जब से तुझे देखा है, यह मेरा लंड है कि सो ही नहीं रहा है।” अब उन्होंने अपनी मंशा खुल कर जाहिर कर दी।

“देखिए मैं उस तरह की औरत नहीं हूं। प्लीज मेरे साथ ऐसा मत कीजिए।” मैं ने रुआंसी आवाज में विरोध जताया।

“तू किस तरह की औरत है उससे हमें कुछ लेना देना नहीं है। हमें तो सिर्फ इतना पता है कि तू एक खूबसूरत सेक्सी औरत है, जो खुद चल कर हमारे पास आई है और हम ठहरे खूबसूरत औरतों के रसिया, हम तुम्हें ऐसे ही कैसे जाने दें।” बोलते हुए राधेश्याम जी अपने थूूूथन से मेेेरे गालोंं पर चुुंबनों की बौछार करने लगे। इसी दौरान उन्होंने जबरदस्ती मेरी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठा दिया और मेरी योनी पर पैंटी के ऊपर से ही हाथ रख दिया। मैं चिहुंक उठी। मैं दोनों हवस के पुजारियों के बीच सैंडविच बनी कसमसाती रह गई।

“प्लीज मुझ पर रहम खाईए। मुझे छोड़ दीजिए ना।” मैं मरी सी आवाज में बोली। अब अंदर से मेरा विरोध कमजोर होता जा रहा था लेकिन बाहरी तौर पर विरोध जारी था। “मैं शरीफ घर की एक शरीफ औरत हूं, मुझे बरबाद मत कीजिए प्लीज।”

“अरे बावली, हम तुझे कहां बरबाद कर रहे हैं। खुद मजे ले और हमें भी मजे लेने दे। तेरी जैसी खूबसूरत औरत तो हम मर्दों को मजे देने और खुद मजे लेने के लिए बनी है।” कहते हुए मेहता जी नें मेरी साड़ी का पल्लू गिरा कर मेरे ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरे कसे हुए उन्नत उरोजों को बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। धीरे धीरे वे मुझ पर छाते जा रहे थे। उनकी कामुक हरकतों से अब मैं भी उत्तेजित होने लगी थी किंतु दिखावे के लिए मैं छटपटाती रही, कसमसाती रही, विरोध का नाटक करती रही।

“मैं चिल्लाऊंगी, छोड़िए मुझे प्लीज।” मैं परकटी पंछी की तरह असहाय उन वहशियों के चंगुल से निकलने की व्यर्थ कोशिश करती हुई बोली।

“चिल्लाओगी, चिल्लाओ साली हरामजादी,” कहते हुए दानव राधेश्याम जी ने मुझे सोफे पर ही पटक दिया और मेरे ऊपर सवार हो गया।

“इस साऊंड प्रूफ कमरे से बाहर तुम्हारी आवाज किसी को सुनाई भी नहीं पड़ेगी। चुपचाप हमारा साथ दे।” मेहता जी गुर्राए। मेरे शरीर से खिलवाड़ करते हुए वे भी एक एक करके अपने वस्त्रों से मुक्त होते गए। उन दोनों ने मेरे विरोध की परवाह किए बगैर मेरी साड़ी उतार दी, मेरे पेटीकोट का नाड़ा, जो कि खुल नहीं रहा था, राधेश्याम जी ने एक ही झटके में तोड़ डाला और पेटीकोट को एक तरफ उतार फेंका। उसी तरह आनन फानन में मेहता जी ने मुझे ब्लाऊज से मुक्त कर दिया। अब मैं सिर्फ पैंटी ओर ब्रा में थी। उस अवस्था में मेरी संगमरमरी काया को देख कर उनकी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

आगे की घटना अगली कड़ी में।

तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

आपलोगों की कामुक लेखिका

रजनी

Comments

Published by

Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।