कामिनी की कामुक गाथा (भाग 4)

अबतक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मैं तीन वासना के भूखे बूढ़ों की कामुकता की शिकार बन कर उनकी काम क्षुधा शांत करने की सुलभ साधन बन चुकी थी। उन्होंने अपनी कुटिल चाल से अपने जाल में फंसाकर अपनी कामुकता भरी विभिन्न वहशियाना तरीकों से मेरी देह का भोग लगा कर मुझ नादान अबोध बालिका को पुरुष संसर्ग के नितांत अनिर्वचनीय आनंद से परिचित कराया। अब आगे….

रात में दो बजे तक कामपिपाशु नानाजी ने मुझे कुत्ती की तरह चोद चोद कर मेरे तन का पुर्जा पुर्जा ढीला कर दिया था। सुबह करीब 8 बजे मेरी नींद खुली। हड़बड़ा कर उठी और सीधे बाथरूम घुसी। बड़े जोर का पेशाब लग रहा था, चुद चुद कर मेरी चूत का दरवाजा इतना बड़ा हो गया था कि पेशाब रोकने में सफल न हो सकी और टायलेट घुसते घुसते ही भरभरा कर पेशाब की धार बह निकली। नानाजी के विशाल श्वान लौड़े की बेरहम चुदाई से मेरी चूत फूल कर कचौरी की तरह हो गई थी और किसी कुतिया की तरह थोड़ी बाहर की ओर भी उभर आई थी। मेरी अर्धविकसित चूचियां जालिम नानाजी के बनमानुषि पंजों के बेदर्द मर्दन से लाल होकर सूज गई थी। मेरी चूचियों और चूत में मीठा मीठा दर्द उठ रहा था। टायलेट से फारिग हुई और नंग धड़ंग आदमकद आईने के सामने खड़ी हो कर अपने शरीर का बारीकी से मुआयना करने लगी और यह देख कर विस्मित थी कि दो ही दिन में मेरी काया कितनी परिवर्तित हो गई थी, निखरी निखरी और आकर्षक।

“इस लड़की को आखिर हुआ क्या है? इतनी देर तक तो सोती नहीं है। कामिनी उठ, इतनी देर तक कोई सोता है क्या?” मम्मी की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ और “आती हूं मां,” कहती हुई हड़बड़ा कर फ्रेश हो कर बाहर आई।

ड्राइंग हॉल में जैसे ही आई, मैंने देखा कि तीनों बूढ़े एक साथ बैठे हुए आपस में खुसर फुसर कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, चुप हो गये और बड़े ही अजीब सी नजरों से मुझे देखने लगे। उनके होंठों पर मुस्कान खेल रही थी और आंखों पर चमक।

“आओ बिटिया, लगता है रात को ठीक से नींद नहीं आई।” दादाजी रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ बोल उठे।

मैं ने नानाजी की ओर घूर कर देखा और बोली, ” नानाजी आप जरा इधर आईए,” और बोलते हुए बाहर बगीचे की ओर चली। पीछे-पीछे नानाजी किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह मेरे पास आए।

“क्या हुआ” उन्होंने पूछा।

” क्या बात कर रहे थे आपलोग?” मैं ने गुस्से से पूछा।

“अरे और क्या, ऊ लोग पूछ रहे थे कि रात को का का हुआ?” नानाजी बोले।

” और आपने उन्हें सब कुछ बता दिया, है ना?” मैं नाराजगी से बोल पड़ी।

” हां तो और का करता? पीछे ही पड़ गये थे साले। मुझे बताना ही पड़ा।” नानाजी बोले।

” हाय रे मेरे बेशरम कुत्ते राजा, आप सब बहुत हरामी हो।” मैं बोली। समझ गई कि मैं इन हवस के पुजारी बूढ़ों के चंगुल में फंसकर उनकी साझा भोग्या बन गयी हूं। मैं ने भी हालात से समझौता करने में कोई नुक्सान नहीं देखा, आखिर मैं भी तो उनकी कामुकता भरी कामकेलियों में बेशर्मी भरी भागीदारी निभा कर अभूतपूर्व आनंद से परिचित हुई और अपने अंदर के नारीत्व से रूबरू हुई। अपने स्त्रीत्व के कारण प्राप्त होने वाले संभोग सुख से परिचित हुई।

“ठीक है कोई बात नहीं मेरे कुत्ते राजा, मगर अपनी कुतिया की इज्जत परिवार वालों के सामने कभी उतरने मत देना। यह राज सिर्फ हम चारों के बीच ही रहनी चाहिए, ठीक है ना!” कहते हुए घर की ओर मुड़ी।

” ठीक है हमरी कुतिया रानी, ई बात किसी पांचवे को पता ना चलेगा।” कहते हुए मेरे पीछे पीछे आए और हम साथ नाश्ते की टेबल पर बैठे जहां दोनों बूढ़े, परिवार के बाकी लोगों के साथ बैठे थे। नाश्ते के वक्त पूरे समय तीनों बूढ़े मुस्कुराते मुझे शरारती नज़रों से देख रहे थे। मेरे मन में इन बूढ़ों के प्रति कोई गिला शिकवा नहीं रह गया था बल्कि अपने ऊपर चकित थी कि मुझे उन बूढ़े वासना के पुजारियों पर प्यार क्यों आ रहा था। मैं ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मम्मी से शिकायत भरे लहजे में कहा “देखो ना मम्मी दादाजी और नानाजी मुझ पर हंस रहे हैं।”

मम्मी हमारे बीच के गुप्त रिश्ते से अनजान इसे नाती पोती नाना दादा के बीच वाली शरारती चुहलबाजी समझ कर मुस्कुरा के सिर्फ इतना ही कहा कि ” यह तुम लोगों का आपस का मामला तुम आपस में ही सलटो। मुझे बीच में मत घसीटो।” कह कर उठी और अपने कार्यों में व्यस्त हो गयी। भाई भी उठ कर अपने दोस्तों को साथ मटरगश्ती करने रफूचक्कर हो गया।

पापा बोले, “कल तो इन्हें वापस गांव लौटना है, क्यों नहीं इन्हें आज शहर घुमा देती, इनका भी टाइम पास हो जाएगा।”

“हां ई सही आईडिया है। चल बिटिया हम आज शहर घूम आते हैं।” दादाजी बोल उठे।

“मैं नहीं जाती इनके साथ।” मैं बनावटी गुस्से से बोली।

“अरे चल ना बेटी,” अब नानाजी मनुहार करते स्वर में बोले।

“ठीक है लेकिन आप लोग कोई शरारत नहीं कीजियेगा” मैं बोली।

“ठीक है बिटिया ठीक है” सब एक स्वर में बोल उठे।

हमारी नोंकझोंक से पापा मुस्कुरा उठे। फिर हम फटाफट तैयार हो कर बाहर निकले।

मैं निकलने से पहले उसी बूढ़े टैक्सी ड्राइवर को एस एम एस कर चुकी थी, फलस्वरूप वह चेहरे पर मुस्कान लिए अपनी टैक्सी के साथ हाजिर था। उसकी नजरों में मैं अपने लिए हवस भरी चमक और मूक निवेदन साफ साफ देख रही थी।

“वाह ई तो चमत्कार हो गया। ई तो गजब का संयोग है, हमारे लिए। चल आज हम तेरे ही टैक्सी में पूरा शहर घूमेंगे।” दादाजी बोल उठे।

मैं ने बहुत ही मादक अंदाज में मुस्कुरा कर ड्राईवर को देखा, ड्राईवर बेचारा तो घायल ही हो गया और अपनी सीट पर बैठे बैठे कसमसा उठा। मैं ने उसकी अवस्था भांप ली और मन-ही-मन बूढ़े कद्रदान ड्राईवर को शुक्रिया स्वरूप “तोहफा प्रदान” की योजना बनाने लगी। मुझे पता नहीं क्यों, बुजुर्गों के प्रति आकर्षण बढ़ गया था, अवश्य ही यह पिछले दो दिनों में मेरे साथ हुए तीन बूढ़ों के संग कामुकतापूर्ण अंतरंग संबंधों का असर था।

हम सब टैक्सी में बैठे, सामने बड़े दादाजी और पीछे मैं दादाजी और नानाजी के बीच में बैठी। मेरे बांई ओर नानाजी और दांई ओर दादाजी। मैं ने कहा, “पहले हम म्यूजियम जाएंगे फिर जू और उसके बाद किसी होटल में खाना खाना कर नेशनल पार्क और शाम को बाजार होते हुए घर, ठीक है?”

“ठीक है बिटिया”, नानाजी बोल उठे।

फिर हमारा ग्रुप चल पड़ा। जैसे ही टैक्सी चलना शुरू हुआ, नानाजी ने अपना दाहिना हाथ मेरी जांघों पर फिराना चालू किया और मैं गनगना उठी। दादाजी नें मुझको बांये हाथ से अपनी ओर चिपटा लिया और दाहिने हाथ से मेरी चूचियां सहलाने लगे, बीच बीच में दबा भी रहे थे। मैं एकदम गरम हो उठी। मेरी चूचियां तन गईं, मेरी चूत पनिया उठी। मेरे मुंह से हल्की सी आ्आ्आह निकल पड़ी। बड़े दादाजी ने पीछे मुड़कर यह कामुक दृष्य देखा तो वासनात्मक मुस्कान के साथ बोल उठा, “मेरे पीठ पीछे ई का हो रहा है भाई?”

“अरे कुछ नहीं तू आगे देख” नानाजी ने कहा।

उनका हाथ अब मेरी चूत सहला रहा था। मेरी गीली चूत का अहसास उन्हें हो चुका था। मैं भी बेशरम होकर उनके पैंट का जिप खोलकर टनटनाए लंड बाहर निकाल कर सहलाने लगी। मुठियाने लगी। हाय अगर मैं टैक्सी में न होती तो अभी ही चुदवाने लग जाती, इतनी उत्तेजित हो चुकी थी। नानाजी नें मेरा स्कर्ट उठा कर सीधे पैंटी में हाथ डाल दिया और भच्च से एक उंगली मेरी चूत में पेल कर उंगली से ही चोदना चालू कर दिया। “सी सी” कर मेरी सिसकारियां निकलने लगी। मैं ने अपनी दोनों हाथों में एक एक लंड कस कर पकड़ लिया और पागलों की तरह मूठ मारने लगी। उनके मुख से भी दबी दबी सिसकारियां निकलने लगी। हम दीन दुनिया से बेखबर दूसरी ही दुनिया में पहुंच चुके थे। पीछे सीट पर अभी वासना का तूफ़ान चल रहा था कि टैक्सी रुकी और ड्राईवर की आवाज आई, “साहब हम म्यूजियम पहुंच गये।”

हम जैसे अचानक आसमान से धरती पर आ गिरे। हड़बड़ा कर अपने कपड़े दुरुस्त कर मन ही मन ड्राईवर को कोसते हुए टैक्सी से उतरे। ड्राईवर मुझे निगल जाने वाली नजरों से घूरते हुए मुस्कुरा रहा था।

“आप लोग घूम आईए, मैं यहीं पार्किंग में रहूंगा।” ड्राईवर बोला।

मन मसोस कर हम म्यूजियम की ओर बढ़े।

खिसियाये हुए बड़े दादाजी बोले, “साले हरामियों, मुझे सामने बैठाकर पीछे सीट पर मजा ले रहे थे कमीनो। अब मैं पीछे बैठूंगा और मादरचोद तू,” दादाजी की ओर देख कर बोले, “आगे बैठेगा।”

“ठीक है ठीक है, गुस्सा मत कर भाई, आज हम तीनों इसे साथ में ही खाएंगे।” दादाजी बोले। मैं उनकी बातों को सुनकर सनसना उठी। तीन बूढ़ों के साथ सामुहिक कामक्रीड़ा, इसकी कल्पना मात्र से ही मेरा शरीर रोमांच से सिहर उठा। फिर भी बनावटी घबराहट से बोली, “तुम तीनों मेरे साथ इकट्ठे? ना बाबा ना, मार ही डालोगे क्या?”

“तू मरेगी नहीं खूब मज़ा करेगी देख लेना” दादाजी बोले।

“ना बाबा ना” मैं बोली।

“चुप मेरी कुतिया, तुमको हम कुछ नहीं होने देंगे। खूब मज़ा मिलेगा।” अब तक चुप नानाजी बोल उठे।

मैं क्या बोलती, मैं तो खुद इस नवीन रोमांचकारी अनुभव से गुजरने के लिए ललायित हो रही थी।

एक घंटा म्यूजियम में बिताने के पश्चात हम जू की ओर चले। करीब आधे घंटे का सफर था मगर इस सफर में दादाजी का स्थान बड़े दादाजी ने लिया और बैठते ना बैठते मुझे दबोच लिया और मेरी चूचियों का मर्दन चालू कर दिया, अपना विकराल लौड़ा मेरे हाथ में थमा दिया और फिर पूरे आधे घंटे के सफर में मेरे साथ वही कामुकता का खुला खेल चलता रहा। मेरे अंदर वासना की ज्वाला भड़क उठी थी। मैं कामोत्तेजना से पागल हुई जा रही थी और एक बार “इस्स्स” करती हुई झड़ भी गई।

खैर मैंने किसी तरह अपने को संयमित किया और जू पहुंचे। हम वहां दो घंटे घूमे। फिर एक रेस्तरां में खाना खा कर करीब 3 बजे वहां के मशहूर पार्क की ओर चले जो वहां से 10 मिनट की दूरी पर था। वहां घूमते हुए ऐसे स्थान में पहुंचे जहां ऊंची-ऊंची घनी झाड़ियां थीं और एकांत था। मैं ने झाड़ियों के बीच एक संकरा रास्ता देखा और उससे हो कर जब गुजरी तो झाड़ियों के बीच साफ सुथरा करीब 150 वर्गफुट का समतल स्थान मिला जो पूरा छोटे नरम घास से किसी कालीन की तरह ढंका हुआ था, जिसके चारों ओर ऊंची ऊंची सघन झाड़ियां थीं। मेरा अनुसरण करते हुए तीनों बुड्ढे उस स्थान पर जैसे ही पहुंचे, वहां का एकांत और खूबसूरत प्राकृतिक बिस्तर देखते ही उनकी आंखों में मेरे लिए वही पूर्वपरिचित हवस नृत्य करने लगा और आनन फानन मुझ पर भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़े। इस अचानक हुए आक्रमण से मैं धड़ाम से नरम घास से बिछी जमीन पर गिर पड़ी। “आह हरामियों, जरा तो सब्र करो।” मैं गुर्राई।

मगर उन वहशी जानवरों को कोई फर्क नहीं पड़ा, उन्होंने मुझे दबोच कर फटाफट मेरी स्कर्ट उतार फेंकी, मेरा ब्लाउज, ब्रा, पैंटी सब कुछ और मुझे पूरी तरह मादरजात नंगी कर दिया। मैं जानती थी कि यही उनका अंदाज है, और मैं भी तो इतनी देर से कामोत्तेजना दबा कर इसी बात का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। फिर भी मैं झूठ मूठ की ना ना करती रही और दिखावे का विरोध करती रही और अंततः अपने आप को उनके हवाले कर दिया। उन्होंने अपने कपड़े उतार फेंके और जंगली भालुओं की तरह मुुुझ पर झपटे। अपने अपने फनफनाते विशाल लौड़ों से मुझे चोदने को बेताब इसी खुले आसमान के नीचे। दादाजी ने अपना लंड मेरे मुंह में डाल कर भकाभक मुख मैथुन चालू कर दिया। बड़े दादाजी मेरी चूचियां दबा दबा कर चूसने लगे। नानाजी अपनी लंबी खुरदुरी श्वान जिह्वा से मेरी बुर को चपाचप चाटने लगे। मैं उत्तेजना के चरमोत्कर्ष में चुदने को बुरी तरह तड़प रही थी।

अचानक न जाने कहां से चार बदमाश मुस्टंडे वहां टपक पड़े और सब गुड़ गोबर हो गया। “साले ऐसी जवान लौंडियों को बुड्ढे चोदेंगे तो हम जवान लोग क्या बुड्ढियों को चोदेंगे?” उनका लीडर बोल रहा था। “मारो साले मादरचोद बुड्ढों को, इस मस्त लौंडिया को तो हम चोदेंगे।” सब गुंडे मेरे बूढ़े आशिकों पर टूट पड़े । हमारे इतने रोमांचक कामुकता भरे खेल में खलल पड़ने से मैं बुरी तरह झल्ला गई थी। उसी तरह नंगधड़ंग अवस्था में उठ खड़ी हुई और उन गुंडों पर बरस पड़ी।

“मादरचोदो इन बूढ़ों पर मर्दानगी दिखा रहे हो? दम है तो मुझसे लड़ो।” मैं गुस्से में बोली।

“इस लौंडिया को तो मैं देखता हूं” बोलता हुआ सबसे कम उम्र का लड़का मेरी ओर झपटा। जैसे ही मेरे करीब आया, मेरे पैर का एक करारा किक उसके पेट पर पड़ा, वह दर्द से पेट पकड़कर सामने झुका तो मेरे घुटने का प्रहार उसके थोबड़े पर पड़ा और वह अचेत हो कर पर जमीन पर लंबा हो गया। अब मैं बिल्कुल जंगली बिल्ली बन चुकी थी। उनका हट्टा कट्टा लीडर यह देखकर गाली देता हुआ मेरी ओर बढ़ा, “साली रंडी अभी तुझे बताता हूं। तेरी तो,….” उसकी बाकी बातें मुंह में ही रह गई। मैं ने दहिने हाथ की दो उंगलियां V के आकार में कर के सीधे उसकी दोनों आंखों में भोंक दिया, उतने ही जोर से जितने में उसकी आंखें भी न फूटें और कुछ देर के लिए अंधा भी हो जाए। वह दर्द से कराह उठा, “आ्आ्आह”, इससे पहले कि वह सम्भल पाता मेरे मुक्कों और लातों से पल भर में किसी भैंस की तरह डकारता हुआ धराशाई हो कर धूल चाटने लगा। बाकी दोनों लफंगों नें ज्यों ही इधर का नजारा देखा, बूढ़ों को छोड़कर मेरी ओर झपटे। उनकी आंखों में खून उतर आया था। एक के हाथ में बड़ा सा खंजर चमक रहा था। अबतक मैं मासूम कोमलांगिनी से पूरी खूंखार जंगली बिल्ली बन चुकी थी। मेरे बूढ़े आशिक मेरे इस बदले स्वरूप को अचंभित आंखें फाड़कर देख रहे थे।

“साली हरामजादी कुतिया, अभी के अभी यहीं तुझे चीर डालूंगा” कहता हुआ चाकू वाला, चाकू का वार मेरे सीने पर किया मगर मैं नें चपलतापूर्वक एक ओर होकर अपने को बचाया और दाहिने हाथ से उसके चाकू वाले हाथ की कलाई पकड़ कर घुमा दिया। अपनी फौलादी पकड़ के साथ उसके हाथ को इतनी जोर से मरोड़ा कि हाथ मुड़कर पीठ की ओर घूम गया और दर्द के मारे चाकू नीचे गिर पड़ा। दूसरा गुंडा जैसे ही मेरे पास आया, मेरा एक जोरदार किक उसकी छाती पर पड़ा और उसका शरीर भरभरा कर दस फीट दूर जा गिरा। मेरी गिरफ्त में जो गुंडा था उसे मैं ने सामने ठेलाऔर एक लात उसके जांघों के बीच मारा। “आ्आ्आह” करता हुआ दर्द से दोहरा हो गया। फिर तो मैं ने उन्हें सम्भलने का अवसर ही नहीं दिया और अपनी लातों और घूंसों से बेदम कर दिया।

“साले हरामजादे, हराम का माल समझ रखा था, बड़े आए थे चोदने वाले। जा के अपनी मां बहन को चोद मादरचोदो।” गुस्से से मैं पागल हो रही थी। सारा मूड चौपट कर दिया। “मैं नीचे गिरे चाकू को उठा कर चाकूवाले के पास आई और चाकू लहराते हुए बोली, “साले मुझे चीरने चला था। आज मैं तेरा लंड ही काट देती हूं।”

“नहीं मेरी मां, माफ कर दो” गिड़गिड़ा उठा कमीना।

“अच्छा चल नहीं काटती, मगर सजा तो मिलनी ही है। मुझे चोदने चले थे ना, ले मेरी चूत का पानी पी,” कहते हुए मैंने एकदम एक बेशरम छिनाल की तरह उस असहाय गुंडे के मुंह के पास अपनी चूत लाई और बेहद बेशर्मी से मूतने लगी। मुझ से पिट कर घायल गुंडे उसी तरह पड़े कराह रहे थे। अब जाकर मेरी खीझ और कामक्रीड़ा में विघ्न से उपजी झुंझलाहट भरा गुस्सा थोड़ा शांत हुआ। मेंरे बूढ़े आशिक उसी नंग धड़ंग अवस्था में भौंचक बुत बने मेरे नग्न शरीर में चंडी का रूप देख रहे थे। वे सोच रहे थे कि क्या यही वह नादान कमसिन नाजुक बाला है जिसे उन्होंने अपने काम वासना के जाल में फंसाकर मनमाने ढंग से अपनी काम क्षुधा तृप्त की और वासना का नंगा तांडव किया?

अब मेरा ध्यान उन नंग भुजंग बूढ़ों की ओर गया जो मुझे अवाक देखे जा रहे थे और मेरी अपनी नग्न स्थिति पर भी। गुंडों पर अपनी खीझ उतार कर मेरा सारा गुस्सा कफूर हो चुका था और मैं उनकी ओर मुखातिब हो कर बोल पड़ी, “अब क्या? चलो फटाफट कपड़े पहनो और यहां से खिसको, शाम हो गई है, पार्क बन्द होने वाला है” कहते हुए मैं झटपट अपने कपड़े पहनी और गुन्डों को वहीं कराहते छोड़ मेरे बूढ़े चोदुओं के साथ पार्क से बाहर निकली। वे बूढ़े समझ चुके थे कि हमारे बीच जो रासलीला शुरू से अबतक हुई उसमें उनकी कामलोलुपता के साथ साथ परिस्थिति, अवसर और मेरी रजामंदी, सब की भागीदारी बराबर है। अगर मैं रजामंद न होती तो मेरे साथ कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता। वह पल जब मैं कमजोर पड़ी, एक ऐसा पल था जब मैं वासना की आग में तप रही थी, जिस उपयुक्त मौके की ताक में बड़े दादाजी थे, उस पल वहां कोई भी ऐरा गैरा बड़ी आसानी से मेरा कौमार्य तार तार कर सकता था, जैसा कि सौभाग्य से बड़े दादाजी ने किया। यह वही एक कमजोर पल था जब मेरे कामातुर शरीर की मांग के आगे मेरा दिमाग कमजोर पड़ा। मगर उस पल को धन्यवाद जिसने मुझे नारीत्व का सुखद अहसास कराया और संभोग के चरम सुख से परीचित कराया जिसके लिए मैं बड़े दादाजी का आजीवन आभारी रहूंगी।

पार्क से बाहर ज्यों ही हम निकले, टैक्सी ड्राइवर बड़ी बेसब्री से इंतजार करता मिला। “बहुत देर कर दी आप लोगों ने?” उसने पूछा। “हां थोड़ी देर हो गई, अब चलो वापस घर” मैं बोली। अभी की घटना से सभी का मूड खराब हो चुका था मगर कई सारी चीजें स्पष्ट हो गयीं थीं। हमारा रिश्ता अब थोड़ा पहले से और अच्छा हो गया था जिसमें हमने एक दूसरे को और अच्छी तरह समझा।

मैं उस वक्त एक और योजना को कार्यरूप देने जा रही थी और वह थी आज की मेरी अधूरी प्यास बुझाने की, वह भी बूढ़े टैक्सी ड्राइवर को “शुक्रिया अदा करने” के रूप में।

घर पहुंचते पहुंचते संध्या 6:30 बज रहा था। मैं ने टैक्सी ड्राइवर को रुकने का इशारा किया और बूढ़े आशिकों को घर छोड़ कर मम्मी को बोली, “मां मैं रीना से मिल कर आती हूं” और धड़कते दिल से वापस टैक्सी में ठीक ड्राईवर के बगल वाली सीट पर बैठी। मैं ने कनखियों से देखा कि बह सिर्फ कुर्ते पजामे में था। उत्तेजना उस ड्राइवर के चेहरे पर साफ परिलक्षित हो रहा था। उत्तेजना के मारे उसका पजामा शनै: शनै: विशाल तंबू में परिणत हो रहा था।

“हां अब चलिए जी।” मैं बोली।

“कहां बिटिया?” ड्राईवर जानबूझ कर अनजान बन रहा था। “धत, अब ये भी मैं बताऊं” मैं ने बड़े मादक अंदाज में ठसके से कहा। “ओह, चलिए मेरे गरीबखाने में, पास ही है।” कहते हुए उसकी आंखें चमकने लगी। 5 मिनटों बाद टैक्सी एक छोटे से पक्के मकान के सामने खड़ी थी। घर की छत एस्बेस्टस की थी। दरवाजा पुराना और जर्जर हो चुका था। ड्राईवर छरहरे जिस्म का करीब 6 फुट 8 इंच लंबा, लंबी सफेद दाढ़ी, लंबोतरा चेहरा और तोते जैसी नाक। आगे बढ़ा और ताला खोलकर दरवाजा ठेला तो चर्र की आवाज से खुला। मुझे अंदर बुलाया और झट से दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। दो छोटे छोटे कमरे, एक किचन और पीछे एक टायलेट, यही था घर, गंदा, बदबूदार, अस्त व्यस्त, एक कमरे में वर्षों पुराना गंदा सा सोफा सेट और दूसरे कमरे में एक सिंगल बेड, जिस पर सलवटों भरी गंदी सी चादर। मुझे उसी बिस्तर पर बैठने को बोला और खुद बगल में बैठ गया और बोला “बिटिया तुमने मेरे गरीबखाने में पधार कर मुझ पर बहुत बड़ा अहसान किया है। मैं और तुम जानते हैं कि अब हमारे बीच क्या होने वाला है। दस साल पहले मेरी घरवाली के जन्नतनशीं होने के बाद से आजतक मैं ने किसी जनानी को हाथ नहीं लगाया है। आज इतने सालों बाद तुम जैसी कमसिन नाजुक खूबसूरत अप्सरा इस तरह मेरे पास आएगी यह मेरे ख्वाब में भी नहीं था। अब हमारे बीच जो होने वाला है उसमें अगर तुम्हें कुछ बुरा लगे तो बता देना।”

“हाय राम मुझे बुरा क्यों लगेगा भला। मैं अपनी मर्जी से आई हूं ना, फिर जो होगा उसे तो भुगतना तो होगा ही ना। आप चिंता मत कीजिए, जो मेरे साथ करना है बिंदास कर सकते हैं जी।” मैं ने उसका हौसला बढ़ाया।

फिर क्या था वह बूढ़ा आव देखा ना ताव, पल भर में मुझे मादरजात नंगी कर दिया और खुद भी नंगा हो गया। गजब का लंड था उसका। मुसलमान होने के कारण खतना किया हुआ लंड, सामने बड़ा सा गुलाबी टेनिस बॉल सरीखा बड़ा सा सुपाड़ा, भयानक, करीब करीब ८” लंबा और 2″ मोटा, नाग जैसा काला, फनफना रहा था। उसके लंबे छरहरे शरीर पर कोई बाल नही था, केवल लंड के ऊपर हल्के सफेद झांट।

उसने कोई भूमिका नहीं बांधी और सीधे मुद्दे पर आया। पहले मेरी चूचियों को वहशियाना ढंग से दबाता गया और जब मेरी चूत पनिया गई, मेरे पैरों को फैला कर बेड के किनारे तक खींचा और कमर से नीचे का हिस्सा बेड से बाहर करके हवा में उठा दिया और अपना सुपाड़ा मेरी चुदासी दपदपाती पनियायी चिकनी बुर के द्वार पर टिकाया। मेरे सारे शरीर में अपनी चूत पर इतने बड़े सुपाड़े के स्पर्श से दहशत भरी झुरझुरी दौड़ गई। फिर एक करारा ठाप लगा दिया जालिम दढ़ियल नें। इतना बड़ा सुपाड़ा मेरी बुर का मुंह चीरता हुआ अन्दर पैबस्त हो गया। दर्द के मारे मेरी चीख निकल पड़ी। “आ्आ्आह मर गई”।

“चुप कर बुर चोदी, मुझे बहुत तरसाई हो, अब खुद चुदने आई और चिल्ला रही है। टैक्सी की पिछली सीट पर बैठी खूब मज़ा ले रही थी ना बूढ़ों से, मुझे सब पता है, मुझ पर ज़रा सा भी रहम नहीं आया ना, अब चिल्ला मत कुतिया, थोड़ा सब्र कर फिर देख कितना मज़ा देता हूं।” कहता हुआ फिर एक जबरदस्त प्रहार से पूरा का पूरा लौड़ा जड़ तक अन्दर पेल दिया।”उह्ह्ह” “ओह मार डाला रे अम्मा ऊऊऊऊऊऊऊऊ” मैं तड़प उठी। लन्ड का सुपारा मेरे गर्भाशय तक का रास्ता फैलाता हुआ घुसा और गर्भाशय का द्वार पूरा खोल कर अंदर प्रवेश कर गया। उफ्फ वह अहसास, दर्द भी और अपनी संपूर्णता का भी। हंसूं या रोऊं। मैं ने अपने मन को कठोर किया और आगे जो होने वाला था उसे झेलने को तत्पर हो गई। कुछ देर उसी स्थिति में हम दोनों स्थिर रहे फिर आहिस्ते आहिस्ते रहीम चाचा नें लंड बाहर निकाला, ऐसा लग रहा था मानो सुपाड़े से फंसकर मेरा गर्भाशय भी बाहर आ रहा हो। खैर जैसे ही लंड बाहर आया मेरी जान में जान आई। फिर तो मानों क़यामत बरपा दिया उस बुड्ढे नें। दुबारा बेरहमी से लंड घुसेड़ दिया। “आ्आ्आह ओह” करती रही और वह जालिम मेरी चूत का भुर्ता बनाने लगा। पहले धीरे धीरे फिर रफ्तार बढ़ाने लगा, “ओह ओह आह आह” तूफानी गती से चुदती जा रही थी मैं। बेरहम कुटाई। हाय मैं कहां आ फंसी थी। लेकिन धीरे-धीरे मैं अभ्यस्त होती गई और चुदाई के अद्भुत आनंद में डूबती चली गई। “आह ओह आह आह” मेरे मुंह से बाहर निकल रही थी। सिसकारियां ले रही थी। अब मैं मस्ती में बड़बड़ करने लगी,”आह चोद चाचा चोद, आह मजा आ रहा है राजा, आह मेरे राजा, अपनी रानी को चोद ले, आह ओह चोदू चाचा, मुझे अपनी रानी बना ले मेरी चूत के रसिया, मेरे दढ़ियल बलमा,” और न जाने क्या क्या। उनका चोदने का अंदाज भी निराला था। एक खास ताल पर चोद रहे थे। चार छोटे ठापों के बाद एक करारा ठाप। फच फच फच फच फच्चाक। 10 मिनट बाद मैं झड़ गई, “आ्आ्आह” फिर ढीली पड़ गई मगर वह तो पूरे जोश और जुनून से चोदे जा रहा था। बीच बीच में मेरी गांड़ में उंगली भी करता जा रहा था जिससे मैं चिहुंक उठती, मैं फिर उत्तेजित होने लगी और हर ठाप का जवाब चूतड़ उछाल उछाल कर देने लगी। अब वह भी बड़बड़ करने लगा,”आह मेरी रानी, ओह मेरी बुर चोदी, लंड रानी, चूतमरानी, ले मेरा लंड ले, लौड़ा खा रंडी कुतिया” और भी गंदी गंदी बात बोल रहा था। फिर 10 मिनटों बाद झड़ने लगी, “आ्आ्आह ईईई” फिर ढीली पड़ गई मगर वह तो मशीनी अंदाज में अंतहीन चुदाई में मशगूल था। कुछ मिनटों में फिर उत्तेजित हो गई। फिर उस तूफानी चुदाई में डूब कर हर पल का लुत्फ उठाने लगी। हम दोनों पसीने से तर-बतर एक दूसरे में समा जाने की होड़ में गुत्थमगुत्था हो कर वासना के सैलाब में बहे जा रहे थे। अब करीब 45 मिनट के बाद जैसे अचानक वह पागल हो गया और भयानक रफ्तार में चोदने लगा और एक मिनट बाद कस के मुझसे चिपक गया और उसके लंड का सुपाड़ा मेरी कोख में समा कर वर्षों से जमे वीर्य के फौवारे से कोख को सींचने लगा और ओह मैं भी उसी समय तीसरी बार छरछरा कर झड़ने लगी। “अह ओह हां हां हम्फ”। चरमोत्कर्ष का अंतहीन स्खलन, अखंड आनंद ओह। स्खलित हो कर हम उसी गंदे बिस्तर पर पूर्ण सँतुष्टी की मुस्कान के साथ निढाल लुढ़क गये। करीब 10 मिनट तक उसी तरह फैली पड़ी रही, मैं जब थोड़ी संभली तो उस दढ़ियल के नंगे जिस्म से लिपट गई और उसके दाढ़ी भरे चेहरे पर चुम्बनों की बौछार कर पड़ी। उसके लंड की दीवानी हो गई थी। लंड को प्यार से चूम उठी। उस समय रात का 8 बज रहा था। न चाहते हुए भी मुझे घर जाना था। मैं अलसाई सी उठी और अपने कपड़े पहन जाने को तैयार हो गई। वह बूढ़ा भी भारी मन से तैयार हो कर मुझे छोड़ने चल पड़ा। घर पहुंचते ही टैक्सी से उतरने से पहले उसकी गोद में बैठ कर उसे एक प्रगाढ़ आत्मीय चुम्बन दिया और कहा, “आज से मैं आपकी रानी हो गई राजा, आपकी लंड रानी। जब जी चाहे बुला के चोद लीजिएगा।” फिर बाय करते हुए घर की ओर कदम बढ़ाया।

यह घटना कैसी लगी अवश्य बताइएगा।

आपके प्रोत्साहन भरे सुझाव की आकांक्षी।

आपकी रजनी।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।