कामिनी की कामुक गाथा (भाग 45)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तर आईलेक्स से निकल कर दो शोहदों नें मुझे छेड़ा और उनकी अश्लील हरकतों और ढीठ कमेंट्स ने मुझे उकसाया कि उन्हें सबक सिखाऊं। फलस्वरुप मैंने उनकी जमकर पिटाई की।

अब आगे:-

वहां से निकलते ही मेरे रौद्र रूप से स्तब्ध क्षितिज कुछ देर तक तो कुछ बोल नहीं पाया। उसके लिए मेरा यह रूप बिल्कुल नया था। कोमलांगी सी दिखने वाली मुझ जैसी स्त्री रणचंडी का रूप भी धर सकती है, यह उसे पता नहीं था। कहां एक दु:स्वप्न के कारण भय से थरथर कांपने वाली स्त्री और कहां आज की यह वीरांगना। असमंजस में पड़ा कुछ देर की चुप्पी के बाद क्षितिज अचंभित और प्रशंसात्मक शब्दों में बोला, “मॉम, आपने दो दो मुस्टंडों को इस तरह अकेले सरेआम पीट कर जमीन पर बिछा दिया, यकीन नहीं हो रहा है।”

“अपनी आंखों से देख लिया ना? यकीन कर ले। ऐसे लफंगों से निपटना मुझे बखूबी आता है।” मैं बोली।

“लेकिन मॉम, यह सुजीत बहुत बड़ा कमीना है। मैंने बताया था न, एक नंबर का छिछोरा। वह चुप नहीं बैठने वाला है।”

“अच्छा ऐसा? वह रहता कहां है?”

“लालपुर चौक के पास। आनंद विहार अपार्टमेंट में, क्यों?”

“तू कुछ मत पूछ, देखता जा, इनकी अच्छी खातिर करवाती हूं।” कहकर मैंने एस पी को फोन करके सुजीत और उसके साथी के साथ हुई घटना के बारे में बताया और कहा कि उसे दो दिन तक लॉकअप में बंद कर के बढ़िया से खातिर करवाएंं। S. P. साहब से मेरा ‘बहुत अच्छा’ परिचय था। (एस पी राठौर पहले हजारीबाग में थे। लंबे तगड़े, रोबदार लंबी मूंछों वाले राठौर साहब बड़े रंगीन मिजाज, बहुत बड़े रूप के रसिया और औरतखोर हैं। वहां से उनका तबादला हुआ रांची। स्थानीय गुंडों की रंगदारी से संबंधित केस के सिलसिले में मेरी मुलाकात उनसे हुई थी। मुझे देखते ही मुझ पर फिदा हो गए। उनकी नजरों को पहचानना मेरे लिए क्या मुश्किल था। वैसे भी मैं ठहरी एक नंबर की छिनाल। उन्होंने मुझे अपने सरकारी बंगले पर बुलाया, पहुंच गई मैं, रातभर उन्होंने मेरी कमनीय देह का रसपान किया और हो गया मेरा काम। उन गुंडों से स्थायी मुक्ति मिल गयी। उनके अपने रसूख के कारण अभी तक उनका तबादला रुका हुआ है। अभी भी यदा कदा वे मुझे बुला लिया करते हैं। वैसे थानेदार पांडे जी, भी एस पी साहब की वजह से मुुुझे अच्छी तरह पहचानते हैंं। मुुुझे मालूम था कि इन दो दिनों में हवालात में उनकी जो कुटाई होने वाली थी, उससे उनकी सारी हेकड़ी बाहर निकल जाने वाली थी।

“वाऊ मॉम, आप भी कमाल हो।” फोन पर एस पी साहब से मेरे वार्तालाप को सुनकर बोला क्षितिज। घर पहुंचते पहुंचते 10 बज गए, तबतक मैं सामान्य हो चुकी थी, क्षितिज के चेहरे पर चिंता की रेखाएं अबतक गायब हो चुकीं थीं, फिर भी उसे आश्वस्त करती और विषय बदलती हुई बोली, “हां वो तो हूँ, लेकिन तू भी क्या कम कमाल है? रात भर अपनी मां को चोदा, दिन को भी चोदा, अब आज फिर रात को चोदने की सोच रहा है, कमाल तो तू है मेरे प्यारे चोदू बेटे।”

“उफ्फ्फ मॉम, यू आर रियली ग्रेट, आज आपको चोदने का कुछ और ही मजा आएगा, वीरांगना लक्ष्मीबाई जी।” वह निश्चिंत होकर मुझे अपनी बांहों में ले कर चूम लिया।

“चल हट बदमाश कहीं के मेरे शरारती चुदक्कड़।” मैं उसकी बांहों से आजाद हो कर उसके गाल पर प्यार से चपत लगा कर बोली। दरवाजा हरिया ने खोला। घर के अंदर घुसते ही मैंने क्षितिज से कहा, “जा जल्दी फ्रेश हो कर खाने की मेज पर आ जा, बड़ी जोर की भूख लगी है।” खाना खाते वक्त क्षितिज मुझे देख देख कर मुस्कुरा रहा था।

“क्या बात है बेटा, बहुत मुस्कुरा रहे हो?” हरिया बोला।

“नानाजी, ये जो सामने बैठी मॉम शांति से खाना खा रही है ना, यह वास्तव में लक्ष्मीबाई है।”

“क्यों ऐसा कह रहे हो?”

“आज दो मुस्टंडों की मरम्मत की है इन्होंने।” फिर सारी घटना बता दिया उसने।

“उनकी किस्मत खराब थी बेटा जो इससे उलझ बैठे।” हरिया बोला।

“हां वो तो है, उनकी हालत देखकर तो ऐसा ही लग रहा था।” हंसते हुए क्षितिज बोला।

“बस बस बहुत हुआ तुम लोगों की बकबक, अब खाना खतम करो और सोने चलो। रात बहुत हो गई है।” कहकर मैंने उनके वार्तालाप को बीच में ही रोक दिया।

खाना खाकर हम अपने अपने कमरे में जाने लगे। मैं दरवाजे में घुस ही रहीथी कि मेरे कानों में क्षितिज की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, “आ रहा हूं मेरी जान तैयार रहना, दरवाजा अंदर से बंद मत कर लेना।” मेरे सारे बदन में चींटियां सी दौड़ गयीं। मैं तुरंत कर कमरे में दाखिल हुई और सोचने लगी, अंततः कपड़े तो उतरनी ही है फिर कपड़ों के बोझ से क्यों न कभी ही मुक्त हो जाऊं। हौले से दरवाजा सिर्फ उढ़का दिया और लाईट ऑफ करके नाईट बल्ब जला दिया। सारे कपड़ों से मुक्त हो कर मादरजात नंगी, एक पतली चादर ओढ़े बिस्तर पर औंधी लेट गयी। आज मेरे मन में कुछ नया करने की कामना थी। उस नादान आशिक के लिए एक नया तोहफा देने की। मेरा हृदय उसके इंतजार में धाड़ धाड़ धड़क रहा था। सहसा मुझे अहसास हुआ कि मेरे ऊपर से पतले चादर का आवरण हट रहा है। कब वह अंदर आया, मुझे पता ही नहीं चला। चादर मेरे पैरों की ओर से खींचा जा रहा था। अंतत: मेरे संपूर्ण निर्वस्त्र शरीर का पृष्ठभाग अनावृत हो गया। उफ्फ्फ भगवान, उसका अगला कदम क्या होगा, अपने अंदर के रोमांच, उत्कंठा, उत्तेजना को समेटे आंखें बंद किए लेटी रही।

“उफ्फ्फ मॉम, सामने से जितनी खूबसूरत हो उतनी ही पीछे से भी, वाऊ, ब्यूटीफुल बैक। ” यह प्रशंसात्मक उद्गार थे उसके। मैंने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा, मौन रही, सिर्फ कसमसा कर उसकी उसकी प्रशंसा को स्वीकार किया। सर्वप्रथम उसने मेरी सुराहीदार गर्दन का स्पर्श किया। उसकी उंगलियों का स्पर्श मेरी गर्दन से ले कर पीठ से होता हुआ मेरी कमर और और फिर, और फिर मेरे भरे भरे गोल गोल नितंबों पर आ कर रुका। मैं सिहर उठी। फिर मैं ने उसकी गरग गरम सांसें अपनी गर्दन पर महसूस की। उसके होंठों का स्पर्श मेरी गर्दन पर हुआ, उफ्फ्फ, सारा शरीर रोमांचित हो उठा। उसने एक बार चूमना शुरू किया तो फिर रुका नहीं, चूमता चला गया गर्दन से होते हुए मेरी पीठ पर, ओह भगवान, और नीचे और नीचे मेरी कमर पर आह्ह् मेरी मां, और नीचे और नीचे, हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम, मेरे भरे भरे चिकने नितंबों पर ओह्ह्ह्ह्ह्ह अब और नहीं, बर्दाश्त की भी एक हद होती है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ। या खुदा, कैसा जालिम है यह, मेरी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है क्या? धमनियों में रक्त का संचार इस तीव्रता से हो रहा था मानो फट पड़ने को बेताब हों।

“अपनी मुनिया को छुपा लो मॉम छुपा लो, देखता हूं कितनी देर छुपाओगी।” वह बेसब्र होता जा रहा था। उसने अब चूमना छोड़ कर चाटना आरंभ कर दिया था, हाय दैया उस निर्दयी के जीभ का स्पर्श ज्यों ही मेरे नितंबों पर हुआ, तड़प उठी मैं। चाटते चाटते उसकी जीभ मेरे नितंबों के बीच के दरार पर दौड़ने लगी। हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम, उसकी जीभ का रुख मेरी गुदा द्वार की ओर थी। मेरी गुदा द्वार पर ज्यों ही उसकी जिह्वा का स्पर्श हुआ चिहुंक उठी मैं। बमुश्किल खुद को रोक पा रही थी। इस्स्स्स्स मां, कैसे एक नर खुद ब खुद अपनी आदमजात भूख मिटाने हेतु मार्ग तलाश लेता है? अचम्भा हो रहा था मुझे। थरथरा उठी आनंद के उस अनिर्वचनीय पलों में मैं। यदा कदा उसकी जिह्वा का स्पर्श मेरी पनिया उठी फकफकाती योनि पर भी हो रहा था। मेरे पैर अपने आप धीरे धीरे फैलने लगे।अब? आगे क्या? क्या करने वाला था वह अनाड़ी पागल? मेरी भी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। योनि मैथुन का स्वाद तो चख चुका था वह, आनंदित भी खूब हुआ वह। तो क्या अब मैं अपनी गुदा की ओर उसे आकर्षित कर सकी थी? शायद, या फिर निश्चित तौर पर। देखती हूं आगे क्या करता है यह पगला। उसकी इन उत्तेजक हरकतों से निहाल होती हुई अपने शरीर को उस अनाड़ी बच्चे के हाथों समर्पित कर चुकी थी। यह क्या? उसने यकायक मेरी गुदा द्वार के अंदर अपनी जिह्वा प्रविष्ट करा दी, उफ्फ्फ वह आहसास, असहनीय, अकथनीय, अवर्णनीय आनंद। उसके बाद तो मानो वह पागल हो गया। सटासट मेरी गुदाद्वार के अंदर डाल डाल कर कुत्ते की तरह चाटने लगा। मिल गया था उसे एक और स्वर्गीय सुख का मार्ग, बिन बताए।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मेरे राजा, बहुत हो गया, ओ्ओ्ओह्ह्ह् मेरे चोदू, मेरे बर्दाश्त की और परीक्षा न ले पागल, अब चोद भी डाल हरामी।” अंततः मेरा धैर्य जवाब दे बैठा।

“वाह मॉम, ये हुई न बात। चोदूंगा जानेमन चोदूंगा, मगर आपकी मुनिया को तो बाद में देखूंगा, पहले इस दरवाजे को तो देख लूं। एक और दरवाजा मिला है अभी। आपके पीछे वाला दरवाजा, आपका हग्गू दरवाजा।” वह बोला। उसकी उत्तेजना उसकी आवाज में झलक रही थी।

हंसी आ गयी मुझे, “हग्गू दरवाजा नहीं रे मादरचोद, गुदा बोल, गांड़ बोल।”

“हां हां वही, गांड़। मस्त चिकनी है, लग भी रही है बहुत टाईट। आप बोलिए तो गांड़ चोदूं?” बह बेताब हो रहा था।

“चोद न रे हरामी, पूछ क्या रहा है। पूरी की पूरी मैं तुम्हारी हूं। जो चोदना है चोद, मगर जल्दी चोद, कहीं मर न जाऊं इंतजार में।” मैं तड़प कर बोली।

“वाऊ, गुड। यही सुनना चाहता था मेरी लंडरानी मॉम।” नंगा तो न जाने कब का हो चुका था। कूद कर आ गया मैदाने जंग में। मेरी कमर पकड़ कर उठा लिया और चौपाया बना दिया मुझे। बहुत जल्दी जल्दी सीख रहा था मेरा अनाड़ी बेटा। आश्चर्य हो रहा था मुझे, कैसे बिना बताए जीव जंतु नैसर्गिक तौर पर शारीरिक संबंधों को अंजाम देते हैं, आनंद का मार्ग खोज निकालते हैं। एक ही दिन में उसने मेरे मुख मैथुन से लेकर योनि मैथुन से होते हुए गुदा मैथुन तक का मार्ग तलाश लिया था। वाह रे प्रकृति।

बिना समय गंवाए उसने अपने आठ इंच लंबे लंड का सुपाड़ा मेरी गांड़ के मुहाने पर रखा और लगा दिया एक करारा प्रहार।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, फाड़ ही डालोगे क्या हर्र्र्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आ्म्म्म्म्मी्ई्ई्ई्ई्ई, निर्दयी मां के लौड़े, हाय, ऐसी भी क्या बेसब्री, आराम से रे मादरचोद आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, एक ही बार में पूर्र्र्र्आ्आ्आ्आ्आ पेल दिया इतना मोटा लौड़ा।” उसके एक ही करारे प्रहार ने मेरे मुख से चीख निकालने पर मजबूर कर दिया। अनाड़ी चुदक्कड़ से गांड़ चुदवाना मतलब गांड़ की दुर्गति। कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। एक ही झटके में उसने मेरी गांड़ के अंदर जड़ तक ठोंक दिया था अपना आठ इंच का मोटा हथियार। ऐसा कभी हुआ नहीं था मेरे साथ शायद। जिसने भी मेरी गांड़ चोदी, क्रमशः दबाव देते हुए आराम से डाला था अपना लंड मेरी गांड़ के अंदर। इसमें उस बेचारे को भी क्या दोष देना। खुद मैं भी तो मरी जा रही थी गांड़ मरवाने के लिए। उत्तेजना के आवेग में मैं बिना सोचे समझे उस नादान बच्चे को आमंत्रण दे बैठी और नतीजा मेरे सामने था। पीड़ा के मारे मेरा चेहरा विकृत हो गया। ऐसा लगा मानो किसी ने पूरा भाला घुसेड़ दिया हो मेरी गांड़ में, गांड़ चीरता हुआ सीधे मेरी अंतड़ियों को फाड़ डालने को आतुर। मेरी दर्दनाक चीख सुन कर घबराहट में एक ही झटके में उसने पूरा लंड बाहर खींच लिया। ऐसा लगा मानो मेरी गुदा मार्ग में अचानक शून्यता तारी हो गई। ऐसा लगा मानो उसके लंड ने मेरी अंतड़ी खींचने की पुरजोर कोशिश की हो। उफ्फ्फ, इस प्रकार का अहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” लंड निकलने पर भी पीड़ा। “लो, लंड डालो तो मुश्किल, निकालो तो मुश्किल, क्या करूं मैं?” क्षितिज बोला।

“धीरे धीरे डाल मेरे रसिया, धीरे धीरे निकाल चोदू, ढीला होने दे मेरी गांड़ को मादरचोद। फिर चोदना, जी भर के चोदना, रगड़ रगड़ के चोदना, पटक पटक के चोदना, गाली दे दे के चोदना, कुत्ते की तरह चोदना, कुतिया बना के चोदना, रंडी बना के चोदना, जैसी मर्जी वैसा चोदना, मैं खुद गांड़ उछाल उछाल के चुदवाऊंगी मेरे अनाड़ी बलमा।” मैं दर्द बर्दाश्त करती हुई बोली।

“ओके मेरी जान। वैसे बड़ी टाईट और रसीली है आपकी गांड़ मॉम। मस्त मस्त। चोदने के लिए आदर्श छेद। वाह क्या गांड़ है, आपकी गांड़ तो मुनिया से भी बढ़कर है। उफ्फ्फ, डाल रहा हूं मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” बोलते बोलते धीरे धीरे घुसाता चला गया अपना लंड।

“आह ओह हां हां ऐसे हीई्ई्ई्ई्ई उफ्फ्फ, अब अच्छा लग रहा है मेरे बच्चे।” उसके लिंग के प्रवेश से होने वाले घर्षण से मेरी गुदा मार्ग में स्थित स्नायु तंत्र तरंगित हो रहे थे। इसी तरह जब वह अपना लिंग बाहर निकाल रहा था, वही आनंदमय घर्षण। “आह्ह्ह् आह्ह्ह् आह्ह्ह्’ करता रह ओह मेरे बच्चे, करता रह ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे चोदू बेटे, चोदता रह अब मजा आ रहा है ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बेटे” खुशी के उद्गार निकल रहे थे मेरे मुख से।

“हां हां मेरी मां, मेरी प्यारी बुरचोदी मां, मेरी प्यारी चूतमरानी मां, आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा आ रहा है उफ्फ्फ, ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में ओह मेरा पपलू पागल हो रहा है अहा ओहो” उसे पता चल गया कि अब मुझे भी मजा आ रहा है। अब वह बड़े आनंद से चोदने लगा, मजा ले कर चोदने लगा, मेरी कमर पकड़ कर बिल्कुल कुत्ते की तरह भकाभक मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने लग गया।

“चोद मादरचोद, गाली दे मुझे मेरे चोदू बेटे, ओह गंदी गंदी गाली दे साले मां के लौड़े, मेरे लंडराजा, मेरे कुत्ते, मेरे रसिया, चोद मुझे लौड़े के ढक्कन, अपनी मां को रंडी बना दे हरामजादे कमीने आह्ह्ह् मेरे नादान चुदक्कड़।” मैं आनंदित हो कर बड़बड़ाती जा रही थी।

“ठीक है, ठीक है मेरी रंडी मां, मेरी कुत्ती मां, आह साली चूतमरानी मॉम, साली बुरचोदी मॉम, ओह मेरी रंडी, ओह मेरी कुतिया, ले मेरा लंड ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह्ह्ह्,” दनादन दनादन चोदे जा रहा था, भकाभक, किसी जंगली कुत्ते की तरह पिल पड़ा था। अब वह मेरी चूचियों को दबोच कर मसल रहा था। मेरी गर्दन, कंधे पर किसी कुत्ते की तरह दांत लगा दे रहा था। उफ्फ्फ, वासना का वह सैलाब मुझे और मेरे बेटे को कहां बहाए जा रहा था होश ही नहीं था। मेरी शह पाकर पागल हो चुका था क्षितिज, जंगली जानवर बन चुका था। मैं कहां किसी कुतिया से कम थी, गांड़ उछाल उछाल कर चुदवाती जा रही थी। करीब चालीस मिनट तक उस युवा चुदक्कड़ ने मेरे जिस्म पर अपनी युवा मर्दानी शक्ति का भरपूर प्रदर्शन किया। उफ्फ्फ, मां बेटे के रिश्ते की मर्यादा को इतने घृणित तरीकों से तार तार करने में हमें जरा भी संकोच नहीं हो रहा था। पहले मैंने अपने नग्न देह से उसे खेलने दिया, उसके यौनांग से मैं खेली, चूसी, उसे मेरे यौनांगों से खेलने दिया, चाटने दिया, फिर अपनी चुदासी योनि में उसके कुवांरे लिंग को समाहित करने का जघन्य पाप कर बैठी, पाप या अपराध, जो भी था गया मेरी चूत में, उस आनंद के सामने क्या पाप क्या पुण्य, सब माफ उस सुख के समुंद्र में डूब कर, अब मेरे बेटे के साथ अप्राकृतिक मैथुन, ओह्ह्ह्ह्ह्ह हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये थे। अप्राकृतिक ही सही, पाप या अपराध ही सही, भाड़ में गया सब, गांड़ में गया सब, उस आनंद के आगे हमें और कुछ नहीं सूझ रहा था। गुत्थमगुत्था होते रहे, आनंदित होते रहे। अंततः जब वह स्खलन के कागार पर पहुंचा, मेरी तो मानों पसलियां कड़कड़ा उठी हों। इतनी जोर से दबोचा था हरामी ने।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह् सा्आ्आ्आ्ली्ई्ई्ई्ई कु्त्त्त्त्ती्ई्ई्ई्ई, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह सा्आ्आ्आली्ई्ई्ई रंडी्ई्ई्ई्ई्ई,” कहते हुए झड़ने लगा, उफ्फ्फ गरमागरम लावा फचफचा कर मेरी गुदामार्ग को सराबोर करता रहा। मैं निहाल हो गई। मैं भी झड़ी तीन बार झड़ी। खूब डूब कर झड़ी। गांड़ मरवाते हुए तीन बार झड़ी, कमाल हो गया, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा, सुख, आनंद, अपने चोदू बेटे के सामर्थ्य की दाद देती हूं। आखिर है तो मुझ जैसी कामुकता की ज्वालामुखी का उपज, उन हरामी चुदक्कड़ मर्दों के सम्मिलित चुदाई का फल। मुझ कमीनी मां के दिल को सुकून मिला कि चलो मेरी अंतरात्मा की हां ना के झंझावत में डूबती उतराती अंततः मेरा बेटा सयाना हो गया।

“ओह मेरी रानी, स्वर्ग का सुख दे दिया तूने” स्खलन के सुख में डूबा, थक कर निढाल, मेरी नग्न देह को बांहों में भरकर चूम लिया और बोला।

“और तूने मुझे क्या कम सुख दिया मेरे चोदू अनाड़ी बलमा।” खुशी के मारे लिपट गई उससे और चुंबनों की झड़ी लगा बैठी उसके चेहरे पर। आखिर ठहरी रंडी की रंडी। अपने कोख जाए बेटे से संभोग का लुत्फ उठा कर मन में न कोई ग्लानि थी न ही रंचमात्र अपराधबोध।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।