कामिनी की कामुक गाथा (भाग 49)

पिछली कड़ी में मैं बता रही थी कि मेरे पुत्र क्षितिज की मुझ पर आसक्ति से मुक्ति के लिए मैं उपाय ढूंढ़ रही थी। एक ही उपाय मेरे जेहन में आया कि उसका ध्यान मेरे अलावा अन्य स्त्रियों की तरफ किसी तरह मोड़ सकूं। किसी तरह मना बुझा कर मैंने क्षितिज को इसके लिए तैयार किया कि कम से कम एक बार किसी अन्य स्त्री के साथ हमबिस्तर तो हो। फिर आगे देखा जाएगा। मेरा यह मानना था कि एक बार अगर अन्य स्त्रियों के संसर्ग का मजा चख ले तो खुद ब खुद ढूंढ़ ढूंढ़ कर शिकार करने लगेगा। पहली ऐसी स्त्री ढूंढ़ने का जिम्मा मेरे माथे था। मैंने ढूंढ़ भी लिया। रेखा सिन्हा नाम था उसका, मेरी ही उम्र की। काली थी मगर थी बड़ी खूबसूरत। उसके साथ मेरा परिचय कैसे हुआ, यही मैं पिछली कड़ी में बता रही थी। उसका पति अलोक सिन्हा जो एक नंबर का रंगीला औरतखोर था। अपनी पत्नी के अलावा सारी स्त्रियों पर लार टपकाता रहता था। ऐसे ही करीब साल भर पहले मैं उनकी शिकार बनी। मैं खुद भी उस दिन कुछ अधिक ही वासना की भूख से परेशान थी। कुछ परिस्थिति, कुछ उनका मौके के ताक में रहने की आदत और कुछ खुद मेरा समर्पण, इन सबका मिला जुला फल यह हुआ कि उन्होंने चटखारे ले ले कर मेरे जिस्म का रसपान कर लिया। उस दिन उनके घर में उनके अलावा और कोई नहीं था। ड्राइंग रूम के सोफे पर ही जी भर के मेरे शरीर को रौंदा, नोचा, खसोटा, भंभोड़ा और बुझाया अपनी वासना की भूख। न सिर्फ उसे औरतों का शिकार करना आता था बल्कि संभोग सुख देने की कला में पारंगत भी था। तभी तो उनके भीषण झिंझोड़ निचोड़ के बावजूद मैं सुखद तृप्ति का अनुभव कर रही थी। वासना के उस सैलाब के उतरने के बाद हम दोनों नंग धड़ंग एक दूसरे के तन से चिपके हांफ रहे थे। जब थोड़ी सांस में सांस आई तो मैंने पूछा,

“एक बात पूछूं मेरे चोदूजी?”

“एक नहीं दस पूछो मेरी प्यारी बुरचोद।”

“इतनी खूबसूरत पत्नी के रहते आप पराई औरतों को चोदने की फिराक में क्यों रहते हो?”

“उंह, साली काली कलूटी कुतिया का नाम लेकर मूड खराब कर दिया।”

“काली ही ना है, लेकिन खूबसूरत तो है ना।”

“अब उसका जिक्र छोड़ो, मुह कसैला हो गया। मुझे पसंद नहीं तो मैं क्या करूं।”

“अच्छा ये बताओ चोदूजी, आपकी बेरुखी से अगर कहीं आपकी पत्नी आपसे बेवफाई करने लगे तो?”

“वो गांड़ मराए, मेरी बला से। मुझे क्या? अब मूड मत खराब करो मेरी जान, तेरी चूत चोद कर मेरा जन्म सार्थक हो गया। साली भैंस जैसी इतनी बड़ी चूत मैंने जिंदगी में नहीं देखी। इतनी बड़ी मगर साली इतनी चिकनी, गजब है। उससे भी गजब तो यह है कि इतनी बड़ी चूत होने के बावजूद इतनी टाईट! गजब तेरी चूत और गजब तू खुद मां की लौड़ी। अब यही देखो, इस उमर में भी इतनी बड़ी बड़ी चिकनी चूचियां इतनी सख्त कैसे?” मेरे नितंबों पर हाथ फेरते फेरते वे बोले, “तेरी गांड़? गांड़ कुछ कम है क्या? इतनी बड़ी बड़ी, चिकनी, उफ्फ्फ बड़ी जबरदस्त है, जबरदस्त। ऐसी गांड़ भी मैंने जिंदगी में नहीं देखी। साली जभी देखो तभी मेरा लौड़ा फनफना कर अपने आप खड़ा हो जाता है।”

“जो बोलना है साफ साफ बोलिए ना।”

“समझने वाले को इशारा ही काफी है।”

“ओह, तो मेरी गांड़ चोदने का खयाल है मेरे चुदक्कड़ जी को।”

“और क्या।”

“मतलब अब मेरी गांड़ फाड़ने का इरादा है।”

“गलत बात, फाड़ने का नहीं रे पगली, चोदने का।”

“एक ही बात है, आप तो चोदिएगा, लेकिन चुदवाने वाले की तो फटेगी।”

“एक बार ले कर तो देख, मजा न आए तो कहना।”

“ना बाबा ना, मेरी चूत का कचूमर निकाल दिया आपने अब मेरी गांड़ का मलीदा बनाना है क्या?” वे मेरी गांड़ को सहलाते जा रहे थे और बीच बीच में गांड़ की दरार में उंगली भी करते जा रहे थे। मजा आ रहा था मुझे मगर नाटक कर रही थी।

“मलीदा नहीं रे पगली, यह तो खुद ही स्वादिष्ट फालूदा है। चाटने का मन हो रहा है।”

“छि: गंदे”

“मक्खन है मक्खन”

“बात बनाना तो कोई आप से सीखे सिन्हा जी”

“लो, सच कह रहा हूँ। चाटूंगा भी, चोदूंगा भी। देख मेरा लौड़ा कैसे बमक उठा है फिर से।” उन्होंने मेरा हाथ अपने लंड पर रख दिया। वाकई, टन्न टन्न कर रहा था, तप रहा था गरम हो कर। झनझना उठी मैं। पुनः मेरी देह में कामुकता का सैलाब अंगड़ाई लेने लगा। इस बार उन्होंने मुझे पलट दिया, ऐसा पोजीशन लिया कि उनका मुह ठीक मेरे नितंबों पर था और उनका लिंग मेरे हाथ में। “खेल मेरे लंड से रानी, मन करे तो चाट, मन करे तो चूस, आह्ह्ह् हां ऐसे ही” और मैं समर्पित हो गयी। मेरी गुदा को प्रस्तुत कर दिया उनके सम्मुख, खेलने के लिए, चाटने के लिए और और और चोदने के लिए। मैं खुद भी भूखी कुतिया की तरह चाटने लगी, चूसने लगी उनके गधे सरीखे मोटे लिंग को, चपाचप, गपागप। उधर वे भी मेरी गुदा को बड़े प्रेम से चूमने लगे, चाटने लगे, मेरी गुदा के दरार में जीभ फिराने लगे, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, फिर मेरे गुदा द्वार में जीभ घुसाने लगे उफ्फ्फ मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, कितना मजा आ रहा था बता नहीं सकती। करीब तीन चार मिनट में ही हम दोनों पागलों की तरह व्यवहार करने लगे। वे मेरी गुदा को मसलते हुए गुदा मार्ग में जीभ घुसा घुसा कर सटासट चाट रहे थे, बीच बीच में मेरे भगांकुर को छेड़ते मेरी उत्तेजना की अग्नि में घी डालते जा रहे थे और मैं उनके नितंबों को कस के दबोचे पूरी शक्ति से उनका पूरा लिंग हलक में उतार कर निगलने का असफल प्रयास करने लगी। बदहवास हो कर अंततः हम दोनों ने पैंतरा बदला और लीजिए, मेरी गुदा के तिया पांचा होने की घड़ी आ पहुंची।

“मान गई, मान गई रे चोदू आपको, उफ्फ्फ पगली कर दिया मादरचोद, आह्ह्ह् अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” बड़बड़ करने लगी।

“आ गया आ गया मेरा लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह आ गया मेरी रानी।” पोजीशन तो सटीक थी, कूद कर टूट पड़ा, सीधा लंड मेरी थरथराती गुदा द्वार में टिका कर सट्ट्टाक से पेल दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मर गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई रे, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई मेर्र्र्र्री्ई्ई्ई गां्आं्आं्आं्आंड़।” मेरी दर्दनाक चीख से पूरा कमरा दहल उठा। हलाल होती बकरी की भांती छटपटा उठी।

“चो्ओ्ओ्ओ्ओप्प्प्प्प मां की चूत। फटी नहीं है बुरचोदी। चिल्ला मत कुतिया। देख अब आयेगा मजा।” मेरी कमर को कुत्ते की तरह पकड़ कर दनादन ठोकने लगा, पेलने लगा, चोदने लगा, भच्च भच्च। सच में जंगली कुत्ता बन गया था वह।

“हाय हाय ओह ओह ओह मां, ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, उफ्फ्फ।” मेरी चीखों की परवाह किए बगैर पिल पड़ा था वह जालिम, जल्लाद, कसाई की तरह हलाल करने को मुझे, मेरी गांड़ का गूदा निकालने। मेरी पहली चीख सचमुच ही वास्तविक पीड़ा की चीख थी। आंखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। बिना जाने खुद को समर्पित कर बैठी ऐसे कसाई के हाथों जिसे मेरी चीखों में आनंद आ रहा था। उत्साहित हो रहा था। लेकिन कुछ पलों के पश्चात वही पीड़ा आनंद देने लगी मुझे। मेरी संकीर्ण गुदा मार्ग हौले हौले ढीली होने लगी और फिर तो कहना ही क्या। उस घर्षण के सुखद आहसास में डूबती चली गयी। चीखें आनंदमय सिसकारियों में तब्दील हो गयींं। “आह इस्स्स्स्स, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह, आह्ह्ह्, सी्सी्सी्सी्सी।” अपनी गांड़ उछाल उछाल कर चुदवाने लगी, “अहा, मजा, मजा आ रहा है राजा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे चोदू डार्लिंग, चोद मेरी गांड़, निकाल मेरी गांड़ का गूदा, बना दे इसे फलूदा, आह मादरचोद, ओह बहन के लौड़े,” पागलों की तरह बोल निकलने लगे थे मेरे मुख से।

“आया, आया मजा आखिर मेरी कुतिया को साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई, रो रही थी, चिल्ला रही थी हरामजादी रंडी की चूत। अब बोल आह आह मेरी रानी ओह हुम हुम मजा आह आह हुंं हुंं हुंं आ रहा है कि नहीं हीं हीं हीं।”

“आह आह आ रहा है आ रहा है ओह ओह बहुत बहुत मजा आह आह आह आह आ रहा्आ्आ्आ्आ है राजा ओह आह चोदता रह चोदता रह ओह ओह मेरे चुदक्कड़, ओह मेरे चोदू, ओह मेरे गांड़ के लौड़े, ओह साले चोद मां के लौड़े, ओह मेरे ज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ्आन्न्न्न्नू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ,” चुदती रही मैं, नुचती रही मैं। वे अब वहशीपन पर उतर चुके थे। मेरे कंधों पर दांत गड़ा गड़ा कर लाल कर दिया। पीछे से मेरी चूचियों को दबोच दबोच कर आटे की तरह गूथने लगे। ओह मेरी मां। दर्द, बेहद दर्द, मगर दर्द में मजा, बेहद मजा मिल रहा था मुझे। झिंझोड़ झिंझोड़ कर चोद रहा था, निचोड़ निचोड़ कर चोद रहा था और मैं आनंदित हो रही थी, बेशुमार खुशी प्रदान कर रहा था हरामजादा। करीब बीस मिनट के इस नोच खसोट में मैंने मानो जन्नत की सैर कर ली हो, थरथर कांपती हुई झड़ने लगी मैं, ऐसा लगा मानो मेरा शरीर हल्का फुल्का हो कर हवा में उड़ रहा हो। ऑफिस की थकान के बाद इतनी थकान भरी चुदाई, ताज्जुब था, थकान की जगह हल्के पन का आहसास हो रहा था मुझे। थकान सारी मेरी चूत और गांड़ में घुस गई थी। “ओह मजा आ गया राजा।” मेरे मुह से निकला। बीस मिनट बाद वे स्खलित होकर मुझ पर लद गये। मेरी गांड़ में छरछरा कर वीर्य इतना भर दिया कि मेरी योनि से होता हुआ सोफे को चिपचिपा कर रहा था। मह उसी तरह नंगे बदन एक दूसरे से लिपटे चिपटे करीब दस मिनट तक पड़े रहे।

“वाह, तू तो बहुत बड़ी चुदक्कड़ है री”

“हट, जबरदस्ती चोद कर आपने ही न चुदक्कड़ बनाया मुझे। मैं तो मना कर रही थी।”

“चुप कर बुरचोदी, इतने मजे से चुदवाना और वो भी मेरे इतने मोटे लंड से पहली बार, किसी साधारण औरत के बस की बात नहीं है। जैसी भी है तू मगर मस्त है। कसम से आज से पहले ऐसा मजा कभी नहीं मिला। अब तो बार बार चोदूंगा तुझे कामिनी जी। दोगी न चोदने?”

“हां जी हां रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मेरे मस्त मस्त चोदू जी।” तृप्ति और खुशी के मिले जुले भाव से उन्हें चूम बैठी। जब मैं वहाँ से निकली, उस वक्त रात साढ़े नौ बज रहा था। उस दिन के बाद हमारा मिलना जुलना बदस्तूर जारी रहा। आपस में घर आना जाना, परिवार वालों से मिलना जुलना चलता रहा। मुझे पता चल गया था कि उनकी पत्नी रेखा सिन्हा जी की बेरुखी झेलते हुए पत्नी धर्म निभाए जा रही है। मुझे इस बात का अंदाजा था कि ऐसी औरतें, जिन्हें परिवार में पति का प्यार, पति से पत्नी सुख नसीब नहीं होता है, प्यार और शारीरिक भूख के लिए आसानी से फंस सकती हैं। हो सकता है कहीं किसी से चक्कर चल भी रहा हो, कौन जानता है। पारीवारिक मेल जोल के चलते रेखा से मेरी घनिष्ठता भी हो गयी थी, यह और बात है कि उसे सिन्हा जी और मेरे बीच के अनैतिक संबंध के बारे मे बिल्कुल भी पता नहीं था। अब मैं योजना बना कर उसे क्षितिज के बिस्तर तक लाने की जुगत में भिड़ गयी, दूसरे ही दिन उसमें सफल भी हो गयी।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।