कामिनी की कामुक गाथा (भाग 63)

पिछले भाग में आपलोगों ने पढ़ा कि एक अर्द्ध विक्षिप्त अधेड़ व्यक्ति रामलाल ने हमें, अर्थात रश्मि, हरिया और करीम के साथ साथ मुझे, अपनी सेक्स यात्रा के प्रारंभ के बारे में बताया। हम चारों बड़ी तन्मयता के साथ उसके उत्तेजक कहानी को सुनते हुए उत्तेजित हो रहे थे। अपनी उत्तेजना को बमुश्किल काबू में रख पा रहे थे। कहानी के पहले भाग के समाप्त होते न होते रामलाल नें रश्मि की ओर भूखी नजरों से देखते हुए अपनी मंशा भी जाहिर कर दी थी। बेचारा रामलाल, उसने अपने छोटे भाई की पत्नी से संभोग सुख का स्वाद चख कर यही तो सीखा था कि औरत मतलब चुदाई हेतु भगवान द्वारा प्रदत्त उपहार। सरोज ने उसे चुदाई के आनंद से परिचित कराया और फिर रबिया, शहला और अब मैं, चख चुकी थीं उसके विकराल लिंग द्वारा आतंक भरा अदम्य क्षमता से परिपूर्ण अथक संभोग का दर्द भरा आनंद। प्रारंभिक पीड़ा को झेल कर अंतत: जो आनंद प्राप्त हुआ वह अवर्णनीय था, कम से कम मैं तो अपना अनुभव बयां कर ही सकती हूं।

मैं कभी कभी सोचती हूं कि ऊपरवाला भी हम इनसानों के साथ अजीब अजीब खेल खेलता है। अजीब इसलिए हमें लगता है कि हम उसकी इच्छा को समझ नहीं सकते हैं। सच तो यह है कि जो कुछ होता है हमारे साथ, वह सब उसी की मरजी से होता है। उसके द्वारा पैदा की गयी परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल कर हम बहुत सारी खुशियाँ हासिल कर सकते हैं। पाप पुण्य के पचड़े में पड़ कर हम अपनी जिंदगी की बहुत सारी खुशियों से वंचित रह जाते हैं। मेरे साथ अब तक जो कुछ हुआ उसे ईश्वरीय वरदान समझ कर मैं ने खुशी खुशी स्वीकार किया और सच कहूं तो इन सब में मुझे सचमुच में बेइंतहां खुशी हासिल हुई। अब अभी की घटना ही ले लीजिए। मैं कुछ और सोचकर घर आई थी, लेकिन यहां कुछ और हो रहा है। अब जो भी हो रहा है उससे अगर मैं मुंह मोड़ लूं तो मेरे हिसाब से मेरी मूर्खता ही कही जाएगी। भगवान कुछ सोच कर ही ऐसे अवसर प्रदान करता है, तो हम उसकी मर्जी के विरुद्ध क्यों जाएं भला। क्यों न ऐसे अवसरों के लिए भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए ऐसे अवसर का लुत्फ लिया जाय। तो पाठकगण, अब आप समझ ही गये होंगे कि मैं इस वक्त पैदा हुई परिस्थिति में आनंद लेने हेतु अपने हिसाब से ईश्वर की इच्छा के अनुरूप कर गुजरने को कृतसंकल्प हूं। आखिर ईश्वर की इच्छा के असम्मान का पाप कैसे कर सकती थी।

अब आगे की घटना पर मैं आती हूं।

रश्मि का हाव भाव बता रहा था कि रामलाल के प्रस्ताव पर उसे कोई आपत्ति नहीं है, हालांकि दिखावे का उसका इनकार एक स्त्री सुलभ प्रतिक्रिया मात्र थी, जिसे सुनकर हम मुस्कुरा रहे थे। वैसे भी हम सबके सामने भला कैसे खुल कर अपनी सहमति दे देती वह। हम सब सभझ रहे थे।

“तो पहले पूरी कहानी खतम कीजिएगा कि…..” मैं आधा बोल कर चुप हो गयी, बाकी तो सब समझ ही रहे थे।

“पहले रश्मि मैडम।” रामलाल तुरंत बोला।

“छि:, नहीं, मैं नहीं।” उठकर जाने को हुई।

“अरे जाती कहां है मेरी छम्मक छल्लो।” मैं तुरंत उठी और रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ ली।

“छोड़ मुझे साली कुतिया।” रश्मि छटपटाने लगी, दिखावे की छटपटाहट।

“हां मैं कुतिया हूं, मगर तू क्या कम है? मेरी अनुपस्थिति में इन बूढ़ों के लंड का मजा लेने के लिए तेरी चूत में खुजली नहीं मची थी क्या? बड़ी सीधी बन रही है। रामलाल जी, लीजिए पकड़ लीजिए इस कुतिया को और सच में कुतिया बना डालिए इसे। हरामजादी मुझे कुतिया कह रही है।” मैं रश्मि को जकड़े रामलाल को आमंत्रण दे बैठी। हरिया और करीम चुपचाप तमाशा देख रहे थे। उन्हें सब समझ आ रहा था कि यहां जो कुछ हो रहा है उसकी सूत्रधार मैं ही हूं और पूरी स्थिति में मेरा नियंत्रण है।

“ओह्ह्ह्ह्ह, नहींईंईंईंईंईंईंई, प्लीज नहींईंईंईंईंईंईंई।” रश्मि केवल मुंह से बोल रही थी। विरोध शारीरिक नहीं था।

“हां हां हांआंआंआंआंआं, रामलाल जी, आईए शिकार हाजिर है।”

“आया मैडम।” रामलाल भूखे भेड़िए की तरह रश्मि की ओर बढ़ा। उसकी आंखों में इतनी खूबसूरत शिकार को देखकर एक अलग तरह की चमक थी।

“नहींईंईंईंईंईंईंई…….” बेहद कमजोर ना। मुझे हंसी आ गयी।

“अब काहे की ना। सीधे सीधे बोल हां, हां हां हां।” मैं आगे बढ़ते रामलाल की ओर रश्मि को ढकेल कर बोली। रामलाल ने रश्मि को अपनी मजबूत बाजुओं में समेट कर आदमजात स्वभाव अनुसार उसके होंठों पर एक करारा और लंबा चुंबन अंकित कर दिया। उतने में ही तो पिघल गयी पगली। सारा विरोध, झिझक और हमारी उपस्थिति से उपजी शरमोहया कहां घुस गयी पता नहीं। अपने शरीर को उसकी बांहों में ढीला छोड़ समर्पित सी हो गयी रामलाल के सम्मुख। काम हो गया मेरा, अब तमाशा शुरू होने को था। बदहवासी के आलम में रामलाल और रश्मि एक दूसरे की बांहों में समाए चपाचप चुम्बनों का आदान प्रदान करने में मशगूल हो गये, इस बात से बेखबर कि अगले कुछ ही पलों में रामलाल के भीमकाय लिंग द्वारा रश्मि की चूत का क्रियाकरम होने वाला है। उनके शरीर से कपड़े एक एक करके छिलके की तरह उतरते चले गये। अद्भुत नजारा था। कहां रश्मि की खूबसूरत कमनीय काया और कहां रामलाल का गठा हुआ भीमकाय शरीर और उसका टनटनाया महा विकराल लिंग। उसके लिंग का आकार देखकर तो रश्मि भयाक्रांत हो गयी।

“ओ बाबा, एतो बोड़ो! ना बाबा ना। मोरी जाबो गो। छाड़ो छाड़ो।” घबराहट के मारे उसके मुह से निकला। इस वक्त रामलाल का लिंग कुछ अधिक ही बड़ा और भयावह दिख रहा था, काले नाग की तरह फनफनाता हुआ। हरिया और करीम ने भी इतने बड़े लिंग की कल्पना नहीं की थी शायद। करीब 11″ से भी लंबा और वैसा ही गधे सरीखा मोटा।

“चुप रहिए मैडम, कुछ नहीं होता है। चार चार औरतों को चोद चुका हूं, कुछ नहीं हुआ। कामिनी मैडम से पूछ लीजिए।” रश्मि के नंगे जिस्म को किसी गुड़िया की तरह दबोच कर बोला रामलाल।

“नहीं, ओ मां्आं्आं्आं, नहीं।”

“रामलाल, आप मत सुनिए इस कुतिया की बात। चोदिए साली हरामजादी को, बड़ी नखरे कर रही है। एक बार लंड अंदर लेने के बाद खुद बोलेगी चोद राजा चोद।” मैं बोल पड़ी। उत्तेजना मुझ पर भी हावी हो रही थी। “और तुम दोनों बेटीचोद बुड्ढे, खाली उधर ही देखोगे कि इधर भी देखोगे। देख नहीं रहे, मैं, जल रही हूं आग में, चुदास की आग में। अब बोलना पड़ेगा कि चोदो मुझे, या फिर रामलाल और रश्मि की चुदाई देख देख कर मूठ मारने का इरादा है।” रामलाल को उत्साहित करते हुए अपनी उत्तेजना की रौ में हरिया और करीम को आमंत्रण दे बैठी।

“साली कुत्ती, हमें ताव दिला रही है मां की चूत। मूठ काहे मारेंगे, चोदेंगे रे बुरचोदी, चल करीम, इस रंडी की चूत की खुजली मिटाते हैं। तेरी चूत का भोंसड़ा बनाते हैं अभी हरामजादी लंडखोर।” ताव आ गया हरिया को और करीम भी कम खिसियाया हुआ थोड़ी था। दोनों तनतनाए हुए मेरी ओर बढ़े भूखे भेड़ियों की तरह, मुझे नोचने खसोटने। मेरे पास आते ही मेरे कपड़ों को नोच नाच कर पल भर में मेरे तन से अलग कर दिया और मादरजात नंगी कर दिया।

“वाह, साली कुतिया, चुदने को बेताब, मां की लौड़ी, चूत देख हरामजादी की, कैसी गीली हो रही है, रंडी कहीं की।” बड़ी गलीज लफ्जों के साथ करीम मुझ पर टूट पड़ा और बेरहमी से मेरी चूचियों को मसलने लगा।

“ओह्ह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, धीरे आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मादरचोद, आहिस्ते।” मैं तड़प उठी, यही चाहती थी मैं, लेकिन ऐसी वहशियाना आक्रमण, बाप रे बाप, आफत को न्योता दे चुकी थी। अब भुगत साली कामिनी, चुदने के लिए मरी जा रही थी ना।

“धीरे? आहिस्ते? गाली दे रही है साली बुरचोदी? नोच साली कुतिया को। देख अभी हम तेरा क्या हाल करते हैं रंडी।” खूंखार लहजे में हरिया बोला और अपने कपड़े खोल कर जानवरों की तरह मुझ पर टूट पड़ा। बूढ़ा शेर। मेरी गीली चूत में भच्च से अपनी उंगली पेल कर उंगली से ही भचाभच चोदने लगा।

“आह आह आह आह ओह ओह ओह उफ्फ्फ्फ्फ्फ जानवर।” तड़प उठी मैं। मैं पिसी जा रही थी दो जानवरों के बीच। “आह ओह बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद।”

“हां हम बेटीचोद हैं साली कुतिया, तेरे जैसी बुरचोदी बेटी भगवान सबको दे।” हरिया, जिसकी चुदाई का फल थी मैं, वह कमीना बोला।

“ओ्ओओ््ओओह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आद्द्द्द्द्दर्र्र्र्र्रचो्ओ्ओ्ओ्ओद।”

“हांआंआंआंआंआं हम तेरी मां को चोदे हैं, तेरी नानी को चोदे हैं। और कुछ बोलना है मां की लौड़ी।” वह वहशी जानवर की तरह व्यवहार कर रहा था मेरे शरीर के साथ। वह तो वह, करीम मेरी भी चूचियों का मलीदा बनाने पर तुला हुआ था। तड़प उठी मैं। यही तो चाहती भी थी मैं। जानवरों की तरह नोच खसोट में मुझे भी एक अजीब तरह का आनंद आ रहा था। व्यथा युक्त आनंद।

उधर रश्मि, उसकी तो पूछो ही मत। वह छटपटा रही थी, भयभीत हिरनी की मानिंद उस दानव सरीखे अर्द्धविक्षिप्त कामपिपाशु भेड़िए के चंगुल में फंसी। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, छोड़िए ना।”

“ऐसे कैसे छोड़ दूं, बिना चोदे।”

“मर जाऊंगी।”

“नहीं मरोगी।” कहते हुए उसने जबर्दस्ती उसे वहीं फर्श पर पटक दिया और चढ़ बैठा उसके ऊपर।

“ओह बाबा, रहम करो मुझ पर।” गिड़गिड़ाने लगी।

“हां कर रहा हूं रहम, परेशान मत हो। आराम से चोदूंगा।” जबर्दस्ती उसके पैरों को फैलाते हुए बोला। अधपगला था तो क्या हुआ, आखिर चूत का रसिया जो ठहरा। स्त्री तन और चूत की महक उसे पागल किए दे रही थी। एक अधपगला स्त्रीदेह के भूखे को मानवीय पीड़ा एवं भावनाओं की समझ कहां, उसमें और एक कामांध पशु में फर्क ही क्या था। जबर्दस्ती उसने रश्मि के पैरों को फैला कर अपना भयावह लिंग उसकी पनियायी योनि के द्वार पर टिका दिया।

“फट जाएगी मेरी।” रामलाल के चंगुल में फंसी रश्मि भयभीत स्वर में बोली।

“फटने दे। सबकी फटी। फटने के बाद सब बोली मजा आ गया।” चुदक्कड़ पागल अब और समय गंवाना गंवारा नहीं करना चाहता था। गच्च से अपनी कमर को एक जुंबिश दे बैठा और चीख ही तो उठी रश्मि, दर्दनाक चीख, मर्मांतक पीड़ा भरी चीख। थर्रा उठा पूरा घर उसकी चीख से। एक पल तो हम स्तब्ध रह गये, स्थिर, अपनी अपनी स्थिति में। मगर रामलाल तो मानो पगला ही गया था, कोई प्रतिक्रिया नहीं, बस पशु, जंगली, बहरा पशु, जिसे अपने शिकार के खून का स्वाद लग गया हो। बेरहमी से रश्मि की कमर पकड़ कर एक धक्का और लगा दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आ्आर डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए, ओ्ओ्ओह्ह्ह मां्आं्आं्आं।” रश्मि चीखती रही चिल्लाती रही मगर रामलाल तो अब आदमी कहां रह गया था।

“चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प्प, एकदम चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प। हो गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बस हो गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, घुस्स्स्स्स्स्स गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बस्स्स्स्स्स्स्स थोड़ा और उह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हुम्म्म्म्म्म्आ्आ्आह।” एक और पाशविक धक्का और लो, पूरा का पूरा विशालकाय लिंग रश्मि की चूत को चीरता हुआ गुम हो गया चूत के अंदर। खुन्नम खून, हो गया रश्मि की चूत। रश्मि की आंखें फटी की फटी रह गयी। रामलाल के लंड से बिंधी हिलने डुलने से लाचार रश्मि।

“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई रे मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई मैं।” चीखती रह गयी रश्मि मगर रामलाल तो मानो अब चुदाई मशीन बन चुका था। बड़ी बेदर्दी से गचागच, फचाफच पेले जा रहा था पेले जा रहा था। पल भर को रहम आ गया मेरे दिल में उसकी हालत पर, लेकिन मुझे पता था, जो पीड़ा का दौर इस वक्त रश्मि पर बीत रहा है, कुछ समय की बात है, फिर तो उसकी फैल चुकी चूत खुद ब खुद रामलाल के लंड की मांग करने लगेगी। हुआ भी वही। सफलतापूर्वक, रामलाल के लंड को ग्रहण करने की पीड़ा के लम्हों के गुजर जाने के पश्चात खुद ही अपनी कमर उछालने लगी।

“आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स, आह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, चोद चोद चोद चोद आह्ह।” रश्मि मस्ती में भर कर चुदने लगी और रामलाल का तो कहना ही क्या था, गजब, कुत्ते की तरह इतनी तेजी से उसकी कमर चल रही थी कि ऐसा लग रहा था मानो रोबोट बन गया हो।

इधर उनकी जंगली जानवरों वाली धींगामुश्ती, गुत्थमगुत्थी तथा कामुक सिसकारियों से निस्पृह, हरिया और करीम मुझ पर अपनी दरिंदगी की इंतहां करने को पिले पड़े थे। उनके कपड़े कब उनके शरीर से अलग हुए पता ही नहीं चला। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, करीम ने मुझे गुड़िया की तरह उठा कर मुझे ले कर सोफे पर बैठ गया और मुझे अपनी गोद में इस तरह बैठाया कि उसका लंड सरसरा कर मेरी लसलसी चूत के अंदर चला गया। मेरे दोनों पैर फैले हुए थे और करीम की जांघों पर टिके थे। मेरी पीठ उसकी ओर थी, अर्थात उसका लंड पीछे से मेरी चूत में पैबस्त था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” एक लंबी आह निकली मेरे मुह से।

“अभी से आह, हरामजादी, अभी और आह करना है।” हरिया मेरी चूचियों को पीछे से पकड़कर बेरहमी से दबाता हुआ बोला। उनके मन में क्या चल रहा था इसका पता अगले ही पलों में चल गया। सामने से स्पष्ट दिख रहा था कि करीम का पूरा लंड मेरी चूत में समाया हुआ है लेकिन हरिया ने उसी अवस्था में अपना फनफनाता लंड लिए सामने से मेरी चूत को ही निशाना बनाने को तत्पर हो गया। तो क्या, तो क्या ये लोग मेरी एक चूत में दो दो लंड डालने का पागलपन करने वाले हैं?

“उफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्आं्आं्आं, नहींईंईंईंईंईंईंई।”

“नहीं क्या साली कुतिया, देख तेरी चूत में दो दो लंड कैसे घुसेड़ते हैं हम।” हरिया गुर्राया। मैं क्या करती। विरोध करती? कैसे? किस मुंह से? मुसीबत को न्योता तो मैं ने ही दिया था।

“हाय, फाड़ डालने का इरादा है क्या बेटीचोद?”

“हांआंआंआंआंआं।” कहते न कहते हरिया ने वही किया जिस बात से डर रही थी। अपने लंड का दबाव मेरी पहले से लंड ठुकी चूत की बची खुची संकरी छिद्र पर धीरे धीरे बढ़ने लगा। मैं दर्द से कराह उठी। ज्यों ही उसके लंड का अग्रभाग मेरी चूत को अतिरिक्त रूप से फैला कर प्रविष्ट हुआ, मैं छिनाल भी एकबारगी चीख ही उठी।

“आह्ह, मादरचोद, ऐसा नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह हरामजादे, कहां से सीखा यह हरामीपन? छोड़ो, मार डालोगे क्या? एक चूत में दो लंड, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।”

“हमें पता है हम क्या कर रहे हैं रंडी। आज ही रश्मि ने वीडियो दिखाया है। हमें पता है किस पर ट्राई करना है। तुम्हें छोड़ कर और कौन रंडी ले सकती है दो दो लौड़ा अपनी चूत में। ले मां की लौड़ी ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, घुस्स्स्स्स्स्स गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” कहते कहते हरिया ने ठोंक दिया अपना लंड। मैं पीड़ा से तड़प उठी लेकिन यह मेरे लिए भी एक रोमांचक अनुभव था, अतः पीड़ा के बावजूद झेलने की पुरजोर कोशिश कर रही थी, फिर भी एक आह निकल ही गयी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, कमीने बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद। बेटी पर भी रहम नहींईंईंईंईंईंईंई।”

“रहम? तुझ रंडी पर रहम? और बेटी? कैसी बेटी? तेरे जैसी रंडी बेटी? तुझे चुदवाने की मस्ती चढ़ी तो कुत्तों से भी चुदवाने में कोई हिचक नहीं होगी हर्र्र्रामजादी। आज तुझे दिखाते हैं हम बूढ़े लंडों का जलवा।” हरिया बिल्कुल जानवरों की भाषा बोल रहा था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, पीड़ा थी लेकिन दो दो लंडों को अपनी चूत में समा लेने का वह रोमांचक आनंद भी अद्भुत था।

“साली रश्मि कमीनी कुतिया, यह तूने क्या दिखा दिया इन कमीनों को? साले मुझी पर अजमाने लगे। आज फटी मेरी चूत आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं रश्मि को गाली बकने लगी।

“आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, साली बुरचोदी, आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, रामलाल जैसे पागल के हवाले करते हुए बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आ रहा था ना, ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, अब आया मजा तुझे भी कि नहीं? चोदिए चचा चोदिए हरामजादी रंडी को जमकर, फाड़ डालिए साली रंडी की बुर, ओह्ह्ह्ह्ह अह भोंसड़ा बना दीजिए इस कुत्ती के बुर को, भुर्ता बनाईए भुर्ता बनाईए आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह।” रश्मि मेरी ओर देखते हूए चीखी। वैसे अब रामलाल के मूसलाकार लंड से सक्षमता के साथ चुदती हुई आनंदमयी आहें भी निकाल रही थी हरामजादी।

“गया ना, दो दो लंड गया ना तेरी चूत में साली छिना्आ्आ्आ्आ्आल। अब देख हम कैसे चोदते हैं।” कहते हुए दनादन लगे चोदने। नीचे से करीम का लंड, ऊपर से हरिया का लंड। गजब का अहसास हो रहा था मुझे। उफ्फ्फ्फ्फ्फ उस प्रारंभिक पीड़ा के पश्चात जो आनंद मुझे प्राप्त हो रहा था वह अकथनीय था। मुझे खुद ही विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी परिस्थिति को भी मैं सक्षमता पूर्वक झेल सकती हूं, झेलना ही सिर्फ थोड़ी था, आनंद भी लेना था, जो मैं बखूबी ले रही थी। सच कहूं तो इसमें रामलाल के मोटे लंड का भी योगदान था। उससे चुदकर मेरी चूत फैल भी तो गयी थी। रामलाल के लंड के कट सेक्शन का क्षेत्रफल अकेले ही हरिया और करीम के लंडों के सम्मिलित कट सेक्शन के क्षेत्रफल के बराबर होगा, ऐसा मेरा अनुमान था। तभी तो इन दो लंडों से चुदने में सक्षम हो पा रही थी। उस कमरे का पूरा वातावरण बिल्कुल गंदा हो चुका था। एक तरफ रश्मि सिसकारियां लेती हुई रामलाल जैसे अर्द्धविक्षिप्त जानवर की जंगलीपन भरी नोच खसोट से आनंदित उसके अकल्पनीय विशालकाय लंड से चुदती मगन थी और रामलाल, अधपगला औरत चूत का रसिया, पूरे वहशियाना ढंग से उसे किसी खिलौने की तरह रगड़ रगड़ कर मशीनी अंदाज में हूं हूं हूं हूं की आवाज हलक से निकालता चुदाई में मगन और इधर हरिया और करीम जैसे बूढ़े औरतखोरों की वहशियाना चुदाई में पिसती मैं लंडखोर, दो दो लंडों को अपनी चूत में गपागप खाती आनंदमुदित, इस्स्स्स्स्स्स्स उस्स्स्स्स्स की सिसकारियां भरती चुदी जा रही थी। दोनों औरत खोर बूढ़े हांफते हुए अपनी समझ से मुझे नोच रहे थे खसोट रहे थे, भंभोड़ रहे थे, निचोड़ रहे थे और गंदी गंदी गालियों की बरसात किए जा रहे थे। “मां की चूत, गली की कुत्ती, रांड, रंडी की औलाद, छिना्आ्आ्आ्आ्आल, मर्दखोर, लौड़े की ढक्कन, और न जाने क्या क्या।”

मैं भी क्या कम थी, बड़बड़ा रही थी पागलों की तरह, “मादरचो्ओ्ओ्ओ्ओद, बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद, भड़वे बुरचोद, कुत्ते कमीने, औरतखोर हराम के जने, जानवर, सूअरों की औलाद, खड़ूस चोदुओं के लौड़े और न जाने क्या क्या। चोद चोद मां के लौड़े, चोद।” लग रहा था मानो गालियों की प्रतियोगिता हो रही हो। यह सब चलता रहा अंतहीन। पता नहींं चला कि कैसे आधा घंटा बीत गया। इस दौरान मैं तो दो बार झड़ कर पसीने से लतपत अधमरी ही हो गयी। यही हाल रश्मि का भी था। अंततः उधर रामलाल किसी जंगली भैंसे की तरह डकारता हुआ रश्मि को भींच कर झड़ने लगा। “ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” रश्मि बेचारी भी सीधे अपनी कोख में रामलाल के लंड के गरमागरम वीर्य का पतन अनुभव करती हुई झड़ कर अधमरी सी हो रही थी, “ई्ई्ई्ई्ई्ई्ई्ई मां्आं्आं्आं ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ बाबा्आ्आ्आ

आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” निहाल हो गयी थी वह, ऐसा लग रहा था, पूर्ण संतुष्ट हो शिथिल हो रही थी। “आह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, जीवन का सर्वश्रेष्ठ सुख, आनंद दिया रे पगले तूने मुझे ओ्ओ्ओह्ह्ह कोखोनेऊ भूलते पारबो ना्आ्आ्आ्आ्आ्आ” छिपकली की तरह चिपकी ही रह गयी वह तो। रामलाल का शिथिल लंड अब भी रश्मि की चूत के अंदर ही था। आखिर शिथिल अवस्था में भी आठ इंच लंबा जो ठहरा।

इधर पहले हरिया झड़ते हुए मुझे निचोड़ने लगा, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह साली्ई्ई्ई्ई्ई्ई बुरचोदी्ई्ई्ई्ई्ई्,” गया वह। झड़ गया कर वह तो अलग हो गया मगर करीम, वाह रे बुढ़ऊ, लगा रहा गच्च गच्च चोदने में। मुझे अब पलट दिया और सीधे सामने से हमला बोला। करीब और दस मिनट तक मेरी नग्न देह की तिक्का बोटी करता रहा और अंततः वह भी झड़ा और क्या खूब झड़ा। मुझे कस कर अपनी बांहों में भींच कर मानो मेरी जान ही निकाल देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा उस कमीने नें। मैं कितनी भी थकी थी, चर थी, लेकिन तीसरी बार मैं भी झड़ने लगी, “ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मां्आं्आं्आं।” अद्भुत, स्खलन। “वाह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बूढ़े शेरों, निहाल कर दिया मुझे ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, क्या सुख प्रदान किया तुम दोनों ने, बता नहीं सकती।” सभी इधर उधर लस्त पस्त पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे। मैं चकित थी रश्मि की हालत पर। आरंभ में जो इतनी चीख चिल्ला रही थी, अब कितनी खुश, संतुष्ट दिख रही थी।

आगे की कहानी अगली कड़ी में।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।