कामिनी की कामुक गाथा (भाग 64)

उस दिन रश्मि और मेरी जो हालत हुई बता नहीं सकती। रश्मि को रामलाल नें अपने विकराल लिंग का दर्शन करा के डरा तो दिया, लेकिन अंततः अपना शिकार बना ही डाला। रश्मि बेचारी की तो भय के मारे घिग्घी बंध गयी थी लेकिन उत्तेजना की अवस्था में उसने अंततः रामलाल के सम्मुख हथियार डाल दिया। रामलाल, अधपगला औरत देह का रसिया, अपनी पाशविक प्रवृति के वशीभूत, रश्मि की देह का ऐसा भोग लगाया कि रश्मि हाय हाय कर उठी। एक तो उसकी चूत में विकराल लिंग के प्रवेश की पीड़ा, दूसरा उसके दानवी शरीर की दरिंदगी भरी संभोग क्रिया, अधमरी कर के ही छोड़ा उसने। लेकिन वाह रे रश्मि, गजब, पहले रोना चिल्लाना, फिर रामलाल की चुदाई से निहाल आनंदमुदित सिसकारियों के साथ उसकी कामक्रीड़ा में बराबर की हिस्सेदारी निभाई उसने। उसकी चूत को बड़ी सी गुफा में तब्दील कर दिया था रामलाल ने, लेकिन रश्मि मुदित थी। उसके नग्न देह से चिपकी, उसके शिथिल लिंग को अपनी गुफा बन चुकी लहुलुहान योनि में समायी, आनंदित, संतुष्ट, पड़ी हुई थी, मानो उसे जीवन का सर्वश्रेष्ठ खजाना मिल गया हो, अलग होने की किंचित भी इच्छा नहीं थी। इधर मैं अपनी चूत के दरवाजे को फाटक बनाने वाले बूढ़े चुदक्कड़ों के नये अंदाज में संभोग क्रिया से मुदित थी। यह प्रथम अनुभव था, एक साथ दो मर्दों के लिंगों को अपनी योनि में समाहित कर संभोग का लुत्फ लेने का। असंभव सा लगने वाला यह संभोग मेरे लिए संभव हुआ रामलाल की कृपा से, उसके अविश्वसनीय मोटे और लंबे लिंग से चुदी जो थी। इन दोनों ने अपनी समझ से मुझ पर तो कहर ही ढा दिया था। लेकिन मैं उनकी नोच खसोट से अति प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी।कृतज्ञ भी थी रश्मि की, कि उसके वीडियो से प्रेरणा लेकर उन खड़ूस बूढ़ों ने मुझ पर ही आजमाने की जोखिम उठाई। इस तरह उनकी सनक भरी मनोवांछित जुगुप्सा शांत हुईऔर मुझे प्राप्त हुआ एक नया रोमांचक अनुभव।

“साली रश्मि, बड़ी बदमाश है रे तू तो।” मैं बोली।

“कैसे?”

“जाने कैसी कैसी फिल्में देखती है और दिखाती है। ये खड़ूस बूढ़े मुझी पर आजमा बैठे और मेरी तो जान ही निकाल दी।”

“और रंडी, तू कम है क्या? इस जानवर के हवाले करके मुझे मार डालने में कोई कसर छोड़ी थी क्या?”

“चल कोई बात नहीं, हिसाब बराबर हो गया। हां तो रामलाल जी, कैसा लगा?”

“मजा आ गया। रश्मि मैडम को चोदने का तो मजा ही कुछ और है।” बड़ा खुश खुश लग रहा था।

“हाय मेरे चोदू राजा, आपने भी तो मुझे स्वर्ग दिखाया।” रश्मि उससे चिपकी, चूमते हुए खुशी से ओतप्रोत बोल उठी।

“ओह मेरी लाड़ोरानी, बन गयी न उसकी दीवानी। फालतू में नखरे कर रही थी।”

“फालतू में? ऐसे लंड को कोई औरत एक बार देख ले तो थरथरा जाएगी।”

“और अब जो उस लंड को चूत में लिए पड़ी है?”

“हाय हाय, मन ही नहीं कर रहा अलग होने को।”

“तो पड़ी रह ऐसे ही। रामलाल जी, चलिए अब आगे की कहानी बताईए।” मैं बोली। हम ऐसे ही नंग धड़ंग पड़े बेशरमी के साथ वार्तालाप कर रहे थे। कोई झिझक नहीं, शर्म नहीं। रामलाल बोलने लगा:-

“ठीक है आगे सुनिए। जब सरोज गर्भवती हो गयी और उसका पेट फूलने लगा तो सरोज मुझे चोदने से मना करने लगी। मैं परेशान हो उठा। एक दिन ऐसे ही सरोज दिन के करीब दो बजे, जब घनश्याम दुकान जा चुका था, घर में मेरे और सरोज के सिवा और कोई नहीं था, सरोज बावर्ची खाने में खड़ी खड़ी काम कर रही थी तो मैं ने पीछे से जाकर उसे पकड़ लिया और बोला, “चोदने दे न रानी।”

“नहीं”

“क्यों?”

“मेरे पेट का बच्चा खराब हो जाएगा।”

“लेकिन मेरा क्या होगा?” मेरा लंड बमक कर चोदने को परेशान था। मैं बेचैन हो उठा। मैं पीछे से उसकी चूचियों को दबाने लगा। मेरा लंड उसकी पिछाड़ी में घुसा चला जा रहा था। चौंक उठी वह।

“यह क्या कर रहे हैं आप?”

“क्या कर रहा हूँ मैं?”

“हमारी गांड़ फाड़ने का इरादा है क्या?”

“गांड़? ये क्या होता है?”

“अरे यही, जहां आपका लंड घुसा चला आ रहा है।” मेरी बांहों में छटपटाती हुई बोली सरोज।

“ओह्ह्ह्ह्ह, तो हग्गू को गांड़ बोलते हैं।”

“हां रे पागल जेठजी।”

“तो चूत नहीं तो गांड़ ही सही।”

“हटिए आप। छोड़िए मुझे।”

“नहीं, मान भी जाओ न।” मैं मनाने लगा उसे। मेरा लंड सख्त होकर दर्द कर रहा था। मुझे राहत चाहिए थी किसी भी तरह।

“नहीं, हटिए, छोड़िए ना।” मेरी बांहों में अब छटपटाने लगी।

“ऐसा नहीं होता है क्या?”

“होता है, मगर आप का लंड बहुत बड़ा है।” झल्लाहट से बोली।

“तुमने कभी गांड़ नहीं चुदवाया है क्या?”

“हां, घनश्याम नें हमारी गांड़ भी मारी है, लेकिन उसका लंड आपसे बहुत छोटा है। हो गया। मरवा ली गांड़। लेकिन आप तो फाड़ ही दीजिएगा। छोड़ दीजिए ना मेहरबानी करके।” अब गिड़गिड़ाने लगी थी वह। मुझे यह सुनकर अच्छा लगा कि गांड़ चुदवा चुकी है, मतलब उसकी गांड़ चोदी जा सकती है। उसकी गांड़ है भी बड़ी मस्त, चिकनी, गोल गोल और बड़ी सुंदर। आशा की किरण नजर आई मुझे।

“गांड़ चुदवा चुकी हो तो मुझसे चुदवाने में किस बात का डर।” मैं उसकी साड़ी उठाते हुए बोला।

“मेरी गांड़ फट जाएगी जेठजी। आपका लंड बहुत बड़ा है।” वह मेरी एक बांह में कसी हुई छटपटा रही थी।

“तेरी चूत चोदने से पहले भी तो यही कह रही थी तुम। फटी क्या? नहीं ना। फिर डर काहे रही हो?” मैं अबतक उसकी साड़ी कमर तक उठा चुका था। अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, उसकी चिकनी गांड़ देख कर मेरा लंड और टाईट हो गया। मैं परेशान हो उठा। उसी परेशानी की हालत से छुटकारा पाने के लिए मैंने अपने पजामे का नाड़ा और अंडरपैंट का नाड़ा ढीला कर दिया और नीचे गिरने दिया। मेरा लंड फनफनाता हुआ उसकी गांड़ के बीच धंसने लगा। जितना छटपटा रही थी उतना ही और घुसता जा रहा था। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। अबतक सिर्फ गांड़ की फांकों के बीच ही धंसा था मेरा लंड। हग्गू वाली छेद को छू रहा था। चिहुंक उठी वह।

“हाय राआ्आ्आ्आ्आ्आम। यह यह यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह?” झल्लाहट में बोली वह।

“दे दे सरोज अपनी गांड़।”

“नहींईंईंईंईंईंईंई।” मगर मुझ पर तो भूत सवार हो चुका था। जबर्दस्ती पर उतर आया मैं।

“चोदे बिना तो मानूंगा नहीं।”

“मानिएगा नहीं?”

“हां” बेचारी तड़पती रही और मैं धीरे धीरे घुसाने की कोशिश करने लगा अपना लंड उसकी गांड़ की छेद में।

“आह नहीं, ओह बाबा्आ्आ्आ, सूखी सूखी गांड़ में जलन हो रही है जेठ जी, चोदना ही है तो प्लीज तेल लगा लीजिए अपने लंड पर।” अंत में थक हार कर बोली। मुझे और क्या चाहिए था, बोतल से बादाम का तेल लिया और लंड पर लसेड़ कर फिर टिका दिया उसकी गांड़ की छेद पर।

“हम फिर कह रहे हैं छोड़ दीजिए ना हमें। मर जाएंगे हम।” अतिम कोशिश करने लगी लेकिन अब मैं कहां रुकने वाला था, मुझे तो मुहमांगी मुराद मिल चुकी थी, वह रोने लगी, लेकिन मैंने परवाह नहीं की। मैंने उसकी चूचियों को मजबूती से दबोच कर एक जोर का धक्का लगा दिया। फच्च से एक ही बार में तेल चुपड़े लंड का आधा भाग उसकी गांड़ को चीरता हुआ अंदर समा गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र्र्र डाला्आ्आ्आ्आ्आ्आ रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” दर्द से तड़प रही थी वह। सच में फट चुकी थी उसकी गांड़। बहुत टाईट थी उसकी गांड़। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बड़ा मजा आ रहा था मुझे। कैसे अब रुक सकता था मैं। एक और जोर का धक्का लगाया और सर्र से पूरा लंड उतार दिया उसकी गांड़ में। इतना मजा पहले कभी नहीं मिला, इतनी टाईट गांड़ होती है मुझे पता नहीं था।

“ओ्ओ्ओह्ह्ह फट्ट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यीई्ई्ई्ई्ई मेरी गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़। ओह कुत्ते्ए्ए्ए्ए जेठ जी्ई्ई्ई्ई्।” चीख उठी वह। मगर मुझे अब होश कहाँ था। सटासट चोदना शुरू कर दिया उसकी टाईट गांड़। उफ्फ्फ्फ्फ्फ बहुत मजा आ रहा था। कुछ देर के दर्द के बाद अब उसकी गांड़ भी थोड़ी ढीली पड़ी और वह भी गांड़ उछाल उछाल कर अपनी गांड़ चुदवाने लगी।

“आह ओह हाय आह चोदिए जेठ जी, मजा आ रहा है ओह राजा, ओह बलमा ओह मेरे चोदू जेठ जी, चोदिए मेरी गांड़, आह।” मजे में चुदते हुए बोल रही थी। मैं भी जोश में आ कर दनादन चोदने लगा। उसे कुतिया की तरह पीछे से चोदने में मशगूल था। मेरे लंड के नीचे का अंडू वाला थैला थप थप उसकी चूत पर थपकियाँ दे रहा था। करीब बीस पच्चीस मिनट बाद मैं उसकी चूचियों को निचोड़ता हुआ अपने लंड का पानी उसकी गांड़ में भरता चला गया।

“आ्आआ््आआ््आआ््हह मां्आं्आं्आं,” कहती हुई वह भी थरथरा थरथरा कर ढीली पड़ गयी। वह बावर्ची खाने के स्लैब पर हाथ टिकाए झुकी हुई लंबी लंबी सांसें ले रही थी। मैंने उसकी चुत की तरफ हाथ लगाया तो देखा कि चूत से लसलसा पानी निकल रहा था। हम चुदाई करके अलग हुए तो देखा कि मेरे लंड पर खून लगा हुआ था। सरोज की गांड़ सचमुच में फट चुकी थी। उसका मलद्वार काफी बड़ा हो चुका था। मलद्वार का छल्ला लाल हो गया था।

“कैसा लगा?” मैं हांफता हुआ पूछा।

“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मार ही डाला था आपने तो हमें। दर्द से जान ही निकल गयी थी हमारी। हां, बाद में उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बाद में तो स्वर्ग सा सुख मिला ओह्ह्ह्ह्ह राजा, मेरे बलमा जेठ जी, आप महान हैं। दीवानी बना डाला आपने तो हमें अपने लंड की। ऐसा लं, बाप रे बाप। अभी तक जल रही है मेरी गांड़। दर्द हुआ मगर मजा ओह ऐसा मजा जीवन में कभी नहीं मिला मेरे स्वामी। गांड़ में आपके मोटे लंड का धमाल, चूत में आपके अंडुओं की थपकी। निहाल हो गयी मैं तो।” कहते कहते मेरे लंड को, जो खून और हल्के हल्के गू से सना था, बिना किसी घिन के दोनों हाथों से पकड़ कर चूम उठी वह पगली। फिर लड़खड़ाते हुए सीधे पैखाने घर की ओर गयी। मैं उसे सहारा दे कर ले चला। पैखाने पर बैठते ही भर्र भर्र करके उसकी गांड़ से मल निकलने लगा। ऐसा लग रहा था मानो पूरा पेट खाली हो गया।

फिर गांड़ धो कर जब वह वापस आई तो मैं पूछा, “कैसी है तबीयत? ठीक तो हो?” घबरा रहा था मैं।

“ठीक हूं। लग रहा है पूरा पेट साफ हो गया। आपके लंड ने तो हमारी गांड़ का रास्ता ही खोल दिया।” मरी मरी सी आवाज में बोली वह। मेरी जान में जान आई। उसके बाद दो दिन तक ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उसके बाद तो मेरी गाड़ी चल पड़ी। जबतक बच्चा नहीं हुआ, उसकी गांड़ ही चोदता रहा। बच्चा हुआ तो फिर वही शुरू हो गया। कभी चूत, कभी गांड़। खूब मजे से चुदवाती है वह।

इसी दौरान बच्चा होने के करीब दो साल बाद एक दिन मैं सरोज को बावर्ची खाने में साड़ी उठा कर खड़े खड़े चोद रहा था कि,

“अरे, अरे, यह क्या हो रहा है?” एक आवाज सुनकर हम चौंक उठे। यह रबिया की आवाज थी। वह चालीस साल की भरे भरे बदन वाली सांवली विधवा औरत हमारी पड़ोसन थी, जो लोगों के घरों में चौका बर्तन का काम करती थी। दूसरों के घर चौका बर्तन का काम करके अपना और अपनी बेटी, जो सत्रह बरस की हो चुकी थी और कॉलेज में पढ़ रही थी, का पेट पाल रही थी और बेटी को पढ़ा रही थी। शायद किसी काम से आई थी। असावधानी के कारण हम दरवाजा बंद करना भूल गये थे, इस कारण रबिया बेरोकटोक बावर्ची खाने में सीधे आ गयी थी और हमें इस हालत में देखकर चौंक उठी थी। मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन सरोज, वह तो घबरा ही गयी। हड़बड़ा कर अलग हो गयी और झेंपती हुई वहां से भागी। मैं वहीं अपने तनतनाए लंड के साथ खड़ा रह गया। मैं परेशान, अपने खड़े लंड की अनबुझी प्यास के साथ खड़ा रबिया को देखता रह गया। गुस्सा भी आ रहा था उसपर। औरत और वह भी रबिया जैसी भरे बदन वाली औरत, अच्छी खासी सेहत वाली, मेरे भूखे लंड के लिए बिल्कुल सही औरत, ऊपर से चुदाई के बीच में कूद पड़ने वाली औरत, मेरी समझ से जिसे शायद भगवान ने इसी वास्ते भेजा था कि बाकी की चुदाई उसी से पूरी कर लूं, देख कर मेरा भेजा ही फिर गया था। उधर मेरे लंड को देख कर रबिया बीबी की आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी जगह खड़ी की खड़ी रह गयी। उसके मुंह से निकला, “हा्आ्आ्आ्आ्आ्आय अल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ला्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह।”

आगे की कहानी अगले भाग में।

आपलोगों की

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।