कंवारी छोरी ने भर-भर गोदी में ले चोदी रे!

होली का मज़ा लेना हो तो आदिवासियों के गाँव-देहात में जाइए। मैं मारवाड़ का हूँ और जिस देहात की मैं बात कर रहा हूँ वहाँ सांसी जाति की एक बस्ती है। इनकी औरतें व लड़कियां बहुत खुली और सेक्सी होती है; मर्द और लड़के लोग चोरी चकारी का धंधा करते हैं। आजकल कुछ कम उम्र की बच्चियाँ बसों में भीख भी मांगती हैं, ये अमूमन 8-9 साल की होती हैं जिन्हें देख दया आ जाती हैं। यूं तो इनकी उम्रदार छोरियाँ आम दिनों में भी लोगों से रुपये ऐंठने के लिए नखरे करती हैं मगर खास मज़ा होली में आता है। होली से बहुत पहले ही  लड़कियान, समूह में, दूकान-दूकान जा कर अश्लील गायन के साथ अश्लील नाच भी करती है जिसे मनचले लौंडे मज़ा लेकर देखते हैं तो प्रौढ़ मर्द उन पर रुपये लुटा देते हैं। होली से तीन दिन पहले रात के समय  कुछ शौकीन लोग इनका नाच कराते हैं जो बहुत गंदा होता है। जिस दिन होली जलनी होती है उस दिन ये तमाशा रुक जाता है पर उसके ठीक दूसरे दिन शाम तक बेहद अश्लील और नंगा नज़ारा होता है। इस वक्त गाये-बजाए गीत कुछ इस तरह के होते हैं:—” अररे, ऊठीयोड़ो लगड़ो थारे मातारानी दीजो रे , भेण की फुद्दी में पूरो घुसियो कोनी रे , छोरी चोद ले ( उठा-खड़ा लंड अपनी मां की चूत में घुसेड़, बहिन की फुद्दी में तेरा लौड़ा अभी पूरा नहीं घुसा है, छोरी चोद !)।

लड़कियों की टोली में 4-5 का गिरोह होता है जो अमूमन 13 से 15 साल के बीच की होती हैं मगर बहुत नखरेवाली और चटक-मटक वाली। इनके साथ अमूमन 40 साल की एक प्रौढ़ औरत भी नाचती है। और कहने की जरूरत नहीं कि खुले में छेड़खानी तो होती ही है।

यह बात जब मैंने अपने दोस्त कोकला प्रसाद को बताई तो उसने कहा हम इन साँसीं छोरियों का मज़ा लेंगे। कोकला प्रसाद लगभग 48 वर्ष के हैं और पता नहीं क्या कर दें  इसलिए मैं झिझका पर मेरे दूसरे दोस्तों ने कहा कि साँसीं छोरियों को उम्र का परहेज नहीं, लेकिन पैसा पूरा लुटाओ तो वे भी चसकेदार खिलन्दरी मज़ा दे देगी, दे-देगी क्या देती ही देती है।

ये मौका मैं भी हाथ से जाने देने वाला नहीं था। हम दो दोस्त तो थे ही कुछ सोच कर हमने एक 17-18 का लौंडा भी पटा लिया। मैं खुद 32 वर्ष का था। हम लोग दिल्ली से मारवाड़ मूंडवा के पास के गाँव में पहुंचे। हमने अपने व औरों के लिए दारू अर्थात शराब का भरपूर इंतजाम कर लिया था क्योंकि सांसी मर्द और औरतें दारू की बहुत शौकीन होती है। होली के तीन दिन पहले ही हम रोल काजियान नाम के गाँव पहुँच गए। हम वहाँ रात को पहुंचे थे ; सरपंच मेरी जानपहचान का था , उसको भी हमने अपना अश्लील इरादा बता दिया था। वह बोला: ‘तुम लोग फिक्र न करो, होली के अवसर पर तो मेरी भी बहू-बेटी शर्म नहीं करती; मैं खुद अपने ही भाई की  जवान बहू और उसकी कमसिन बेटी को चोद डालता हूँ। होली पवित्र त्योंहार है और इस दिन मस्ती नहीं लूटी तो फिर क्या!’

पहली रात तो हमने अश्लील नाच देखा, देख कर हम चकित रह गए। एक भारी भरकम मगर मस्त तंदुरुस्त जवान औरत, वो भी कोई 38 साल की खुल्लमखुल्ला अधनंगी नाच रही थी, लहंगे मैं। तभी एक कम उम्र का लड़का आया जिसके हाथ में एक मुर्गा था। लड़का इस औरत का लहंगा उठा मुर्गे समेत उसमें घुस गया। भारवाली औरत अश्लील अंदाज़ में कभी नीचे बैठती फिर चौंक कर ऊपर उठती, फिर बैठती। भीतर मुर्गा कुकड़ू कूं की  आवाज़ करता। तभी एक दूसरी औरत 30-32 की नाचते-नाचते आती, इर्द गिर्द छोरे, औरत चारों टांगों पर जानवर बन चलती, लड़के उस की  पीठ पर सवारी करते, मैंने देखा उस औरत पर तीन लौंडे एकसाथ चढ़े हुए थे। फिर एक और औरत आती, अमूमन 28 साल की  पर मोटीताज़ी, इस वक्त उसके साथ उससे भी मोटा एक प्रौढ़ मर्द, कोई 48 का, वो आता और उस औरत की  गाँड पर, कभी मम्मों पर  कौड़ा मार-मार उछलता कूदता। इसके बाद जवान लड़कियों का झुंड निकलता, एकसाथ 20,कोई स्कर्ट में, कोई सलवार, कोई लहंगा, कोई साड़ी पहने । ये आपस में धींगामस्ती  करती जिसमें एक लड़की दूसरी लड़की के वस्त्र उतार उसे लगभग नंगी कर देती। तब फिर कोई 10 लौंडों की टोली आती, एक-एक लौंडा दो-दो छोरी के साथ मस्ती  करता। हर छोरी खुले आम दो-दो छोरे अपनी पीठ,पेट या छाती पर चढ़वा लेती। कुछ लड़कियां घोड़ी बनती और एक मजबूत छोरा उनकी गाँड पर चढ़ता।

दूसरे दिन दोपहर की  ही बात है। पास गली की  दूकान पर 3 छोरियाँ अमूमन 14-15 की नाच रही थी, गंदे लटके-झटके कर-कर। वे कुछ गा भी  रही थीं।:” कच्ची-कच्ची छोरियों का नींबुआ निचोड़ लो, चूँस लो निंबोली लाला मीठे बेर तोड़ लो ! भोसकिया में लंड घालो, कमसिन फुद्दी पेलो रे – – – चुद्दी-चुद्दी चस्का मारो, लौड़ा-लौड़ा खेलो रे!!”दुकानदार ने उन्हें — उनमें से हरेक को 20-20 रुपये दिये, जो उन छोकरियों के लिए ना काफी थे। वो कम से कम 50 मांग रही थी। मुझे ताव आ गया, मैंने हरेक को 100 रुपये दे डाले, और कहा हम तुम्हें 200 रुपये भी देंगे पर तुमको लहंगा उठा कर नाचना होगा। वे तुरंत नाचने लगीं, गीत भी गा रही थीं: ‘गुल्ली मारो डंडा मारो,लहंगा फाड़ पेलो रे  होली के धमाके बेटीचोद बनके खेलो रे !!; यह सुन हमें मज़ा आ गया, हमने — इस बार कोकला प्रसाद ने हर छोरी की छाती की चोलिया में 200 रुपये घुसेड़े और उनके गालों पर हाथ फेर आशीर्वाद दिया। रुपयों का चस्का इन छोकरियों को लग गया तो वो कोकला प्रसाद से बोलीं, ‘ अंकल जी, थोड़ा और रुपया फेंको , फिर हमारा सही मज़ा लो’। ” मतलब?”’ कोकला उनसे बोला। छोरियों ने नाचते हुए जवाब दिया: ‘ अर्रे, अर्रे, अररे अंकल !  चंचल कबूतरी की फड़फड़ी जवानी ले ले,  बुलबुल कि मैना- हिरणी चूंसनी-चटानी ले-ले ; गोल-गोल मम्मा-मम्मो दूधिया उठानी ले -ले , मम्मी की  कसम!  छोरी लंड- मरजानी ले-ले!!!”इस वक्त तक सरपंच जी भी वहाँ आ गए, सभी छोरियों ने उन्हें झुक कर प्रणाम किया।उन्होने कहा कि हम लोग उनके मेहमान हैं और ये होली का मौका है, इनकी पूरी खातिरदारी होनी चाहिए। सरपंच जी ने सब छोकरियों को 500 रुपये के करारे नोट दे डाले। वे फिर नाचने लगीं पर सरपंच ने कहा ‘ ‘नाच – वाच से कुछ नहीं होगा; इनको कुछ ज्यादा चाहिए। जाओ और अपने मम्मी-पापा को भेजो , बात कर लेते हैं। ” छोकरियाँ चुप हो गईं।

शाम के वक्त इन सांसी लड़कियों के मां -बाप मिलने भी आ गए। इनको कोई शरम नहीं थी, ये तो ऐसे ही कमाई के मौके ढूंढ रहे थे। बड़ी, मगर गुप्त मीटिंग हुई। हम सब मिलकर 10 लोग इकट्ठा थे। आगे वाला मर्द बोला: ”मैं बलिया सांसी हूँ, ये मेरी बीबी गोरबाई है , मेरी छोकरी का नाम गुलकी है; यह  दलजीत है , इसकी बीबी धपिबाई है, इसकी छोकरी का नाम मुनमुन है; और यह करमा है, इसकी बीबी करीना  है और छोरी का नाम लल्ली। हम लोग, हजूर, इसी अश्लील कला की कमाई खाते हैं। हमारी छोरियाँ एक से एक कमसिन और खिलन्दरी है। बात ये है कि हमें हमारी छोरियों कि अस्मत के वाजिब दाम मिलने चाहिए।”

सरपंच बोले: ‘ देखो, ये खानदानी और रईस  लोग हैं; पैसा इनके हाथ का मैल है। लेकिन मज़ा भी इन्हें भरपूर चाहिए। तुम लोगन  को पता ही है कि शहर के मर्द  तुम्हारी छोरियों से किस कदर अश्लील, गंदा और कड़ा  खेल खेलेंगे। मेरी ज़िम्मेदारी है। अगर तुम्हारी छोरियों में से किसी को गर्भ ठहर जाता है तो मेरी ज़िम्मेदारी है उसे गिराने की।’

दलजीत सांसी बोला: ‘हजूर दाम तय कर दीजिये  पहले, छोरियाँ सब एकदम कच्ची-कोरी हैं; आपको खुद ही पता चल जाएगा कि क्या माल है! मगर दाम? तय कर लीजिये, इसी वक्त, और हाँ,  आधे रोकड़ा ,बाकी काम होने के बाद’। करमा सांसी ने भी यही बात कही। सरपंच ने हमारी ओर देखा। मैंने कोकला प्रसाद को इशारा किया, बाज़ार की  रेट हमें पता थी। कोकला प्रसाद बोला: ‘ रेट तो 50 हज़ार हर छोरी का है, मगर यह स्टेंडर्ड चुदाई का रेट है; हम तो उससे भी ज्यादा गंदा खेल खेलेंगे। इस लिए एक लाख रुपये  हर छोरी देंगे!! लेकिन हमरु एक शर्त भी है , सवा लाख भी हर छोरी दे देंगे पर शर्त ये है कि तुम लोग भी अपनी-अपनी बेटियों की  चुदाई न केवल अपनी नंगी आँखों से देखोगे बल्कि उनको पक ड़-पकड़ कर गंदी चुदाई के लिए हमें परोसोगे भी।’इस पर चुप्पी छा  गयी।काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला तो हमने रेट प्रति छोरी 2 लाख कर दी। मर्द लोग फिर भी चुप रहे पर औरतों में से एक ने कहा — मुझे मंजूर है। ये धपिबाई थी, मुनमुन की मां । इस पर उसका खसम दलजीत भी मान गया। फिर करीना ने हाँ भर दी, फिर  गोरबाई ने। फिर मर्दों ने भी हाँ कर दी। हमने तीन लाख रुपये नकद उसी वक्त चुका दिये और कहा ‘ये प्रति 24 घंटे की  रेट है। धुलंडी तक हम दूसरी छोकरियों का नाचगाना अश्लील  काम देखेंगे। उसके बाद तुम्हारी छोरियों को रगड़ेंगे। धुलंडी 7 को है; तुम लोग 8 को यहीं हाजिर हो जाना। ‘ इस करार पर ये सांसी खुश थे, उनसे भी ज्यादा उनकी औरतें।

धुलंडी के दिन-दोपहर सरपंच का घर-परिवार भी अश्लील क्रिया को तैयार हो गया  था । सरपंच व सरपंच की बीबी , उसकी दो बेटियाँ,  एक बेटा, और उसकी बहूरानी  — ये छह  ; और तीन हम थे ही, फिलहाल तमाशबीन । सरपंच ने मुझे कहा , तुम देखना मैं कैसे-कैसे खुल्लम खुल्ला अपनी दोनों बेटियों को चोदता हूँ,और बहूरानी को भी। मेरा बेटा मेरी बीबी यानी अपनी सगी मां को मेरे सामने चोदेगा ; यही तो होली का दस्तूर होता है। सरपंच की दोनों बेटियों की  उम्र 17 और 19 की थी– दोनों पटाका; पुत्र 21 का था और पुत्रवधू 18 की। सरपंच खुद 48 के थे व उनकी पत्नी 44 की। इस जश्न की शुरूआत तो सरपंच के बेटे ने आपनी  दो छोटी बहनों के मम्मों से छेड़छाड़ से की– सबसे छोटी केतकी और उससे बड़ी रेवती। पुत्र का नाम कलासुंदर और  मां जी का नाम कलावती। उसने दोनों बहिनों को घसीट नंगा किया और उनके मम्मे मसोसने लगा, लेकिन तभी इन बहिनों का बाप यानी सरपंच डोंगलाला बीच में आ गया और पुत्र  को ललकारा — छोड़ केतकी-रेवती को, ये मेरा माल हैं । डोंगलाला ने धम्म से अपनी दोनों बेटियों के गुप्तांगों में हाथ डाला, और बकने लगा– बोलो , तुम दोनों अपने बड़े भा ई से चुदोगी या  बाप से। ”बाप से ”, दोनों बिटियाएँ एकसाथ बोलीं – – सरपंच खुशी से चिल्लाया, ‘वाह, मेरी बुलबुलों’,और दोनों पर पिल पड़ा। ‘लंड चूँस, मेरा लंड चूँस, बेटी लंड चूँस ‘ कहते हुए उसने छोटी बेटी के मुंह में अपना लंड दे मारा आर बड़ी को कहा कि वो अपने बाप को अपनी चूत  चुंसाए। ” ओह, यस पापा ! ‘ कह कर उसने बाप के मुंह पर अपनी तिकोनी फुद्दी गाड़ दी। उधर कलासुंदर अपनी मां कलावती  को नंगी करने लगा; उसने मां को नंगी करने के बाद उसकी एक टांग ऊपर उठा उसकी झांटदार चूत को रगड़ने लगा, पहले हथेली से फिर लौड़ा घुसेड़ कर। उधर डोंगलाला ने अपनी दोनों बेटियाँ चोदने के बाद अपनी बहूरानी की गाँड़ में हाथ डाला। मजे की  बात ये कि उसकी दोनों बेटियों ने ही अपने बाप को कहा कि वो अपनी छमिया बहूरानी की ”गाँड़ मारे”। बड़ा अश्लील दृश्य था। डोंग लाला ने हमें भी कहा कि हम भी इस गंगा में नंगे हो चोदाचोदी डुबकी मार लें। मगर मैंने व कोकला ने तो माना कर दिया पर हमारे साथ के 18 साल के लौंडे से रहा नहीं गया। वो बोला,” अंकल मैं भी होली खेल लूँ?’ मेरे कहने से पहले ही डोंगलाला ने कहा ” आजा बेटा, चार औरतें हैं हैं, इन साली चारों को रगड़। कहने की देर थी कि हमारे वाला लौंडा कमलकिशोर सरपंच की  बीबी पर ही ”मां-मां ” कहते हुए पिल पड़ा। फिर उसने सरपंच की  पुत्रवधू की चूत मारी। फिर रेवती की चूत  बजाई; जब वो सरपंच की  सबसे छोटी बेटी केतकी की फुद्दी में लगालग और बारबार अपना लंड घुसा-घुसा उसे चोद रहा था तब सरपंच ने एक अजीब हरकत की । वो भी कमलकिशोर की  गाँड मारने लगा।

धुलंडी के बाद 8 तारीख आ गई। गुलकी, मुनमुन और लल्ली पहले आ गई अपनी – अपनी  मां  के साथ। कहा पापा लोग भी थोड़ी देर में आ जाएंगे। एक बात बता दूँ कि इनकी मांएं भी कम हसीन न थीं । लल्ली और मुनमुन 14 की थीं और गुलकी 15 की। इनकी माता रानियाँ 32-33 की। जब इन छोरियों के बाप आ गए तब हम दोनों ने याने मैं और कोकला प्रसाद ने एक बड़े होटल में सबको ले गए। पहले मालताल खाया, क्योंकि माल है तो ताल है। फिर छोकरियों को छोडकर सबको शराब पिलाई, खूब।  बाप और औरतें झूम उठीं। रंगा खुश, बिल्ला खुश।

गुलकी, मुनमुन और लल्ली की माताओं से मैंने कहा कि आपकी छोरियों को अश्लील  गायन आपने खूब सिखाया, भई मज़ा आ गया । वो बोलीं ‘ हुजूर , अश्लीलता तो हमारी जाति के खून में हैं। अगर आपको देखना ही है और सचमुच मज़ा लेना है तो हमारा नंगा नाच देखो! बाद में हर छोरी चोद लेना। ”ठीक, तो हो जाय। ” बस यह कहना था कि  गोरबाई उठी  और गुलकी भी; फिर धपिबाई और मुनमुन। गुलकी ने नाचते नाचते मेरी ओर से  अपनी सगी मां को वो भद्दे इशारे किए कि मैं सकते में रह गया। वो कुछ गा रही थी : ‘ ”बाबूजी का लंड, मेरी मां के मुंह को भाए रे ; बाबूजी,मेरी मां को चोदो – – मुझको मज़ा आए रे ।” किछ देर में ही गुलकी की मां रानी नंगी : एकदम नंगी , उसकी चूत वो मोटी ताज़ी,सफाचट  बाल की । गुलकी  ने बिना शरम किए अपनी मां की चूत को मुझे दिखा-दिखा बोली : ” साहब जी , ये है मेरी मां की फुद्दी। मुनमुन भी अपनी मां पर कूद गई और उसने भी मुझे अपनी मां की मोटी गुदाज भोसड़ी दिखा ही दी। वाह, गुलकी; वाह, मुनमुन। मैंने तय किया कि इन छोरियों की मां को भी चोदेंगे।

एकाएक कोकला प्रसाद आ गए और गुस्से में बोले — बंद करो ये नाच-गाना। हम तुम्हारी कमसिन और एकदम कुँवारी छोरी को चोदने का नंगा मज़ा लेने आए हैं, नाच देखने नहीं। मैं पहले लल्ली को और फिर मुनमुन को चोदूंगा; फिर कोकला ने मेरा नाम लेकर कहा– ‘ और सेंतराम गुलकी को रगड़ेगा। . . . तुम पहले देखो कि हम कैसे तुम्हारी बेटियों की अस्मत लूटते हैं। ‘

कोकला प्रसाद ने लल्ली को पुचकार  कर बुलाया। लल्ली सिर्फ एक स्कर्ट पहने हुई थी और टॉप्स भी। कोकला बहुत भारी बदन का गठीला और कद्दावर मर्द था; छह फीट का । उसका सीना 48 इंच का था व उसकी चूतड़ भी लगभग इतनी ही मोटी और भारी थी,वजन 85 किलो। उसके सामने लल्ली थी, 4 फीट 11 इंच लंबी, 30 इंच की  छाती और गाँड 31 की, कमर 23 इंच, बस; वजन 33 किलो!कोकला लल्ली के लिए एक मोटा गैंडा या भैंसा था जबकि लल्ली कम उम्र की  हिरणी; कोकला गिद्ध था तो  लल्ली कबूतरी। कोकला ने वासना की घूंट भरी और लल्ली को उठा कर पहले तो हवा में उछाला और फिर गुदगुदे सोफ़े पर पटक दिया।कोकला ने अपने कपड़े नहीं उतारे, अलबत्ता लल्ली के स्कर्ट में हाथ डाल उसकी पेंटी जरूर निकाल दी थी। लल्ली का चेहरा मोहरा  ना केवल मासूम था बल्कि सेक्सी भी , खास कर आँखें। वो आँखों से तक-तक ताक रही थी ये जानने के लिए कि पुरुष का लंड मूसल सा होता है या मुद्गर- गदा जैसा। कोकला जल्द ही इस को अपने भारी लौड़े को चटाने वाला था। उसने लल्ली के सिर के बाल सँवारे, उसे उकड़ूँ बैठाया, आँखों पर एक नीला चश्मा पहनाया । लल्ली कडून ही आगे सरक ली थे और अपनी तांगे चौड़ी कर ली थी। वो चार पैरों पर रेंगने वाली बच्ची कि तरह बैठी हुई थी, तभी कोकला ने लौ पेंट कि ज़िप खोल अपना मोटा लौड़ा निकाला और लल्ली के मुंह में भर दिया। सिर्फ मुंह में ही नहीं वो उसे बार-बार निकाल कर कभी लल्ली के गालों पर तो कभी ललाट  पर रगड़ता, और वापस मुंह में गाड़ देता। लल्ली के मुंह से चबड़-चबड़ आवाज आ रही थी, और थूक बाहर। लार बह रही थी पर कोकला लंड़ की  जड़ तक उसे इस छोरी के हलक में फंसा रखा था और मज़े ले रहा था।

उधर मैं गुलकी की नंगी गांड को खुल्ला चाट रहा था, उसकी गाँड व मम्मे लल्ली से काफी बड़े थे।

कोकला ने लल्ली कि मुख चोदाई के बाद उसकी चूत को टटोला, प्यारी-सी, कसी-कसी , छोटी पर सेक्सी चूत थी उसकी, खुलने पर चीकू की फांक सी। लल्ली की दोनों टांगें भरपूर चौड़ी कर व उसकी गाँड के नीचे  दो तकिया लगा कर , उसने उसकी कमर व पीठ को ऊंची कर लिया था; छोकरी का सिर सोफ़े के सिरे से बाहर आ गया था  था और वो थोड़ा नीचे की तरफ झूल रहा था । इसी अवस्था में कोकला ने अपना पेंट थोड़ा सा ढीला किया, बस इतना ही कि उसका पूरा लौड़ा छोकरी की फुद्दी में घुस जय और फंस जाय; कोकला ने लल्ली कि कमर के नीचे हाथ फंसा रखा था और अपने लंड के हर धक्के के साथ वो लल्ली को ऊपर उछल रहा था। वो हाँफ रही थी जबकि कोकला मुस्करा-मुस्करा मज़ा ले रहा था।

मैं नंगी मुच्ची गुलकी को जगह-जगह से काट रहा था, और उसको उलट-पुलट करते हुए उसका मांस तोड़ मरोड़ रहा था। अचानक मैंने उसकी नाभि और फिर उसकी फुद्दी में अंगुली की; वह कुछ चींखी। तभी कोकला ने मुझे आवाज़ दी कि गुलकी को छोड़ और पहले आ कर लल्ली के मुंह में अपना लौड़ा फंसा। कहा– गुलकी को भी ले आ। कोकला अपने मोटे सोपारे वाले लंड से लल्ली की चूत आवाज के साथ बाजा रहा था। उसका अंडकोश छोकरी की चू त के तर मांस में घुसने को बेताब था, तभी मैं पहुंचा और लल्ली के लटकते हुए सिर को पकड़ उसके मुंह में अपना लौड़ा टिका दिया। यानि मैं अपनी टागें  चौड़ी कर खड़ा था और मेरा 9 इंच का लौड़ा रफ्ता-रफ्ता उसके मुंह में घुस, जीभ से टकरा और भीतर चक्करघिन्नी काट रहा था। बाहर से मैं उसके गाल दबा रहा था और कभी-कभी गालों पर झापड़ भी मार देता। गुलकी और मुनमुन  दोनों यह चोदा बाटी देख रही थी और दूर से उनके मां-बाप भी। कोकला लल्ली कि जब भरपूर और पेट भर चूत बाजा चुका तब मुझे कहा कि प्यारे तू भी अब इसकी भोसड़ी चोद। मैं पूरा नंगा था, लल्ली कि फैली हुई जांघों के बीच घुसा तभी कोकला ने कहा, ‘यार, छोकरी को उलटा, मैं इस साली की गांड मारूंगा।’कोकला ने लल्ली के नीचे हो उसकी गांड में अपना लौड़ा फंसाने की तैयारी की जबकि मैं सईद से उसकी चूत में अपना लौड़ा  फंसा इंजन के पिस्टन की तरह धक्का लगा रहा था। कोकला ने लल्ली की गां में थूक लपटाया और लंड खिसकाया। वो पक्का छोरीचोद था।

लल्ली के बाद मुनमुन की बारी थी। हम दो मर्द उसके सामने थे मौन उसके बाप के बराबर और कोकला बड़े ताऊ समान। मुनमुन जीन्स-शर्ट में थी। मैंने मुनमुन के बाप दलजीत को कहा कि वो अपनी छोरी की जीन्स व शर्ट हमारे सामने खुद उतारे। वो समझदार था, उसने अपनी बीबी को भी बुला लिया और दोनों मिलकर अपनी सगी बेटी को हमारे मज़े के लिए खुद ही नंगी करने लगे। उसकी मां उससे बोली: ‘ देख कोकला जी तेरे बाप से भी बढ़कर बड़े ताऊ हैं, तू इनके लंड को  पकड़, चूँस और खुद अपनी चूत में धकेल, फिर तू एकसाथ दो मर्दों का लं ड मज़ा ले रही है, जैसा ये कहें वैसा कर!’। कोकला ने उसे शाबाशी दी और मुनमुन के बाप दलजीत को कहा कि वो अपनी बेटी की जांघें खुद चौड़ी करे और फिर उससे कहा कि  तेरी बीबी मेरा लंड अपनी बेटी की फुद्दी में खुद डाले। मुनमुन को हम दोनों बारी-बारी  लेने को बढ़े। कोकला ने मुझसे कहा, वो पहले आगे से उसकी चूत पेलेगा, फिर रुक कर मुझे कहा   ”और तू पीछे से इसकी गांड मार। ”  हम आगे पीछे से  मुनमुन की चूत चोदने और गांड मारने लगे।

फिर यही क्रिया कर्म हमने गुलकी के साथ भी किया। उसे तो मैंने गोदी में लेकर चोदी और कोकला ने भी। बलिया सांसी जो गुलकी का बाप था उसे मैंने कहा — ‘ यार माल तो तेरी छोकरी का जोरदार है, तेरे एक ही बेटी है या कुछ और भी हैं?’वो हाथ जोड़ता हुआ  बोला ” हजूर, लौंडिया तो एक और है मेरे , 13 की  पर उसे दंगल में उतारते ड र लगता है ”; मैंने कहा , ”ठीक है, बड़ी हो जाने दो हम हर साल होली पर तुम लोगों की  मां-बहन-बेटियों के साथ खेलेंगे।”

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