कामिनी की कामुक गाथा (भाग 10)

सवेरे करीब 6 बजे मेरी नींद खुली। बाहर से (नौकर हरिया) मेरे पापा की आवाज सुनाई दी, “बिटिया उठ जाओ, सवेरा हो गया है”।

मैं अलसाई सी उठी, “हां चाचा, उठ गई।” कल दिन भर की भाग दौड़ और चुदाई की थकान से पूरा बदन टूट रहा था। हब्शी की चुदाई से तो मेरी चूत फूल कर कुतिया की तरह बाहर निकल गई थी। जोश जोश में कल सरदार की ठुकाई के समय मुझे पता ही नहीं चला, मगर आज सवेरे महसूस हो रहा था कि हब्शी के लंड से मेरी चूत की क्या दुर्दशा हुई थी। उस बनमानुष ने मेरी चूचियों का भी बड़ी बेरहमी से मर्दन किया था अतः मेरी चूचियां भी सूज कर लाल हो गई थीं और मीठी मीठी टीस उठ रही थी। सवेरे से लेकर रात तक में सात मर्दों से चुद चुकी थी, कुल मिलाकर 9 बार, (अपने बाप की तीन चुदाई को मिला कर)। धीरे धीरे मैं पूरी रंडी बनती जा रही थी। मैं आहिस्ता आहिस्ता वासना की गुलाम बनती जा रही थी। मुझे इसका अहसास था किन्तु अब मुझे इसमें मजा आने लगा था। मेरे साथ जो कुछ घट रहा था इसका मुझे कोई मलाल नहीं था। आज का सवेरा फिर एक नये दिन की शुरुआत थी, जिसके गर्भ में क्या था यह सिर्फ मेरा भगवान ही जानता था। मैं आज के दिन को अन्य दिनों की तरह भगवान को समर्पित करते हुए नहा धो कर फ्रेश होकर बाहर आई। नहाने धोने से कल की थकान में थोड़ी कमी हुई मगर लगता था नींद अब तक पूरी नहीं हुई।

“मालिक, नाश्ता लगा दूं?” हरी चाचा मेरे नानाजी से पूछ रहे थे।

“लगा दो भाई, मैं इन दोनों को भी बुलाता हूं। अरे रघु, केशू को लेकर नाश्ता करने आ जाओ भाई।” मेरी ओर मुखातिब हो कर बोले, “बिटिया तू ठीक से सोई कि नहीं?”

“मैं ने ठीक से आराम कर लिया नानाजी।” मैं बोली।

“अभी नाश्ता करके हमलोग मार्केटिंग के लिए जाएंगे, तुम भी साथ चलोगी क्या?।” नानाजी ने पूछा।

“नहीं मैं नहीं जाऊंगी। यहां आसपास घूमना पसंद करूंगी।” मैं ने कहा।

“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी” नानाजी ने कहा।

नाश्ता करते वक्त नानाजी ने बताया ” आज तेरे दादाजी का जन्मदिन है, सो हम आज शाम को यहां पार्टी करेंगे।”

“ओह, हैप्पी बर्थ डे दादाजी” कहते हुए मैं चहक उठी और दादाजी के गले लग कर चूम उठी। बाकी लोग ईर्ष्या पूर्ण नजरों से दादाजी को देख रहे थे।

“वाह दादाजी, आज हम सब दादाजी का बर्थ डे धूमधाम से मनाएंगे” मैं ने उत्साह से कहा।

करीम चाचा ने कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए वे उनके साथ बाजार नहीं जा पाएंगे।

“ठीक है करीम कोई बात नहीं, तुम आराम करो, मैं कार चला लूंगा। हम दो तीन घंटे में वापस आएंगे” कहते हुए नानाजी दादाजी और बड़े दादाजी के साथ बाजार निकल पड़े।

ज्यों ही वे बाजार की ओर निकले, करीम चाचा मेरी ओर मुखातिब हुए और बोले, ” तो बिटिया रानी, अब क्या इरादा है?”

“क्या मतलब?” मैं चकित हो कर बोली। अभी अभी तो उन्होंने नानाजी को कहा था कि तबियत खराब है।

“क्या मतलब क्या? तू खूब समझ रही है मैं क्या कह रहा हूं। अनजान मत बन। मुझे भी थोड़ा मजा लेने दे बिटिया। चल बेडरूम में।” बड़े अश्लील ढंग से मुस्कुराते हुए बोला।

मेरे पापा असहाय भाव से हमें देखते रहे।

“तू भी चल ना रघु साथ में, बड़ा मजा आएगा। आजतक तो दोनों मिलकर खूब मज़ा लूटे हैं। आज भी साथ साथ मज़ा लूटेंगे। क्या बोलती हो बिटिया?” करीम चाचा ने पापा और मेरी ओर बेहद कामुक भाव से देखते हुए कहा।

पापा ने मेरी ओर असहाय भाव से देखा, लेकिन शायद वे तो खुद भी यही चाहते थे, तुरंत बोल पड़े, “ठीक है, ठीक है, चलो मैं भी चलता हूं।”

इधर मैं सोच रही थी कि मैं ने भी क्या किस्मत पाई है, एक बार जो वासना के दलदल में उतरी तो मुझसे मिलने वाला हर मर्द मुझे भोगने के लिए लालायित ही मिलता गया। उसी कड़ी में अभी अभी वैसा ही योग मेरे सामने था जिससे न ही मैं बच निकल सकती थी न ही बचना चाहती थी, उल्टे मैं रोमांचित हो रही थी उन दो दो मर्दों की सामुहिक भोग्या बनने की कल्पना मात्र से। अपने पापा के लंड का स्वाद तो चख ही चुकी थी, अब करीम चाचा का नया अजनबी लंड मेरी चूत का इंतजार कर रहा था और मैं भी तो रोमांचित हो रही थी, एक तो करीम चाचा का अजनबी लौड़ा और उस पर अपने पापा के साथ सामुहिक मैथुन।

“कितने चालाक हो करीम चाचा, तबीयत खराब होने का बहाना करके मेरे साथ मौज करने का मौका निकाल ही लिया। चलिए चलिए जो करना है कर लीजिए। बिना किए आप मानिएगा थोड़ी।” बोलती हुई उनके साथ बेडरूम में चली गई।

जैसे ही मैंने कमरे में प्रवेश किया, बड़ी बेताबी से मुझे सामने से बांहों में जकड़ कर करीम चाचा ने चूमना शुरू कर दिया। करीम चाचा भी मेरे पापा की तरह ही हट्ठे कट्ठे 55 साल के पहलवान से कम नहीं थे। तोंद थोड़ा निकला हुआ था मगर थे मजबूत कद काठी के। कद करीब 5 फुट 11 इंच होगा। इधर पापा ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया और खुद भी पीछे से मुझे दबोच लिया और मेरी चूचियों को दबाने लगे। कितने हरामी थे मेरे पापा। खुद तो रिश्ते को शर्मशार करके मेरे साथ मुंह काला किया और अब पराए मर्द के सामने परोस कर पुनः मेरे साथ सामुहिक संभोग के लिए तत्पर थे। रिश्ते नाते की मुझे भी कौन सी परवाह थी, मैं तो खुद भी उनकी कामुकता भरी चेष्टाओं से वासना की अग्नि में झुलसने लगी थी और बड़ी बेकरारी से मेरे साथ होने वाली कामक्रीड़ा का आनंद लेने को लालायित हो उठी थी। मैं अब वासना के खेल का पूर्ण आनंद लेने के लिए हमारे बीच के नाते रिश्ते के तारों को छिन्न-भिन्न करके अपने अंदर की सारी भावनाओं को समूल नष्ट कर देने का मन बना चुकी थी और इसके लिए जरूरी था कि हमारे बीच किसी प्रकार का कोई राज़, राज़ न रहे और हम सब एक दूसरे के लिए खुली किताब बन जाएं। मुझे ही इसकी पहल करनी थी।

“हाय पापा, इतनी बेसब्री और बेरहमी से अपनी बेटी की चूचियों को मत मसलिए ना। मैं कहीं भागी जा रही हूं क्या? पूरी की पूरी आप लोगों की ही तो हूं।” मैं ने जानबूझ कर करीम चाचा के सामने हमारे रिश्ते का पर्दाफाश कर दिया।

करीम चाचा अविश्वसनीय नज़रों से आंखें फाड़कर कभी मुझे देखते कभी नौकर हरिया को।

“साले कमीने, तूने अपनी बेटी को भी नहीं छोड़ा।” वे बेसाख्ता बोल उठे।

मेरे पापा करीम चाचा के सामने इस तरह आकस्मिक हुए रहस्योद्घाटन से तनिक लज्जित और किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये, मगर मैं ने मामला संभाल लिया और बोली, “क्या फर्क पड़ता है चाचा, नाना, दादा, पापा, चाचा, भाई या पति सब बाद में, पहले तो सब मर्द ही हैं ना, कभी न कभी किसी न किसी स्त्री को चोदेंगे ही। मैं बेटी, नतनी, पोती, भतीजी, बहन या पत्नी बाद में हूं, पहले एक स्त्री हूं, जिसकी आज नहीं तो कल किसी न किसी मर्द से चुदाई तो होनी ही है।” फिर पापा की ओर कनखियों से देखती हुई बोली, “वैसे भी किसी ने मुझसे कहा था, लंड ना चीन्हे बेटी। लीजिए, अब मैं कहती हूं, चूत ना चीन्हे रिश्ते नाते। पिछले पांच दिनों में नानाजी, दादाजी, बड़े दादाजी और पापा के अलावा चार अजनबी बूढ़ों ने मुझे मनमर्जी ढंग से चोद चोद कर रंडी बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है क्या? खुद भी बेशरम हो कर मजा लिए और मुझे भी चुदाई का मज़ा लेना सिखा दिया। सच पूछिए तो मैं इन लोगों की शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद भी। अब और ज्यादा दिमाग मत चलाइए, चलिए शुरू हो जाईए, जो आग आप लोगों ने लगाई है पहले उसे बुझा तो दीजिए।” मैं बिना लाग-लपेट के बेशर्मी से बोल उठी।

मेरी बातों ने पापा की शर्मिंदगी को खत्म तो किया ही, साथ ही साथ उस गरमागरम माहौल की आग में घी का काम भी किया।

“वाह बिटिया वाह, अब आएगा मज़ा।” हवस के पुजारी करीम चाचा की आंखों में वासना की भूख चमक उठी। बिल्कुल वहशी जानवर की तरह मुझ पर टूट पड़े और आनन फानन में मेरे शरीर को कपड़ों से मुक्त कर दिया और मेरी नंगी दपदपाती काया को अपलक लार टपकाती नजरों से निहारते हुए अपनी किस्मत पर रश्क करने लगे।

“अब दीदे फाड़ कर क्या देख रहे हैं, पहले कोई नंगी स्त्री नहीं देखी है क्या? अपने कपड़े भी तो उतारिए, कि मैं उतार दूं?” मैं किसी खेली खाई छिनाल की तरह बोल उठी। मैं वास्तव में वासना की ज्वाला में जल रही थी।

करीम चाचा मानों तंद्रा से जाग उठे और पलक झपकते मादरजात नंगे हो गए। पूरे शरीर पर बाल भरे हुए थे, किसी रीछ की तरह। सर पर अधपके घुंघराले बाल और लंबोतरे चेहरे पर बेतरतीब लंबी दाढ़ी। दोनों जांघों के बीच सामने झूलता कोयले की तरह काला 9 इंच लंबा लंड, मगर भयानक मोटा, चार इंच के करीब। लंड के सामने का चमड़ा कटा हुआ, सुपाड़ा चिकना और टेनिस बॉल की तरह गोल। एक बार तो मैं अवाक रह गई, उनके लंड के दर्शन से। मेरी तंद्रा भंग हुई जब किसी भूखे भेड़िए की तरह करीम चाचा मुझ पर टूट पड़े। मुझे अपनी मजबूत बांहों में दबोच कर बिस्तर पर गिरा दिया और बेहताशा चुम्बनों की बौछार करने लगे। इधर मेरे पापा भी मादरजात नंगे हो कर मेरे नंगे जिस्म में पीछे से चिपक गये।

“हाय राम इतनी बेसब्री किस बात की, आराम से कीजिए ना” मैं बोली।

“अब क्या आराम से, इतनी मस्त माल पहली बार मिली है मुझे। अब तो बर्दाश्त नहीं हो रहा है बिटिया।” कह कर करीम चाचा मेरे मुंह में अपनी जीभ घुसा कर चुभलाने लगे और मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगे। मेरी सिसकारियां उनके मुंह से बंद थीं। मेरे पीछे मेरे पापा मेरी गांड़ को चाट रहे थे। मेरी गांड़ को दोनों हाथों से फैला कर मेरे गुदा मार्ग में जीभ डाल कर चाट रहे थे। मेरी उत्तेजना अपने चरम पर थी। मैं पागलों की तरह चाचाजी की बांहों में कसमसा रही थी। अब करीम चाचा ने एक हाथ की उंगली मेरी चूत में भच्च से पेल दिया। इस आकस्मिक हमले से मैं चिहुंक उठी। इधर मेरी चूत में करीम चाचा की उंगली घुसी और दूसरे ही पल मेरी गांड़ में मेरे पापा ने उंगली घुसा दी। इस दोतरफे हमले से मैं छटपटा उठी।

“आह हरामियों, ओ्ओ्ओ्ओह उफ्फ, इस्स्स्स।” मैं सिसक उठी। मैं दो दो पहलवानों के बीच परकटी पंछी की तरह फड़फड़ा कर रह गई। मैं दाहिने करवट पर लेटी थी, सामने करीम चाचा बांए करवट ले कर और पीछे मेरे पापा दाहिने करवट लेकर मेरे नग्न शरीर से खेल रहे थे। मैं पागल होती जा रही थी। मेरी सिसकारियां सुन कर दोनों ने समझ लिया कि लोहा गरम है और प्रहार करने का उचित अवसर यही है। करीम चाचा ने मेरा बायां पैर उठा कर अपने कमर पर चढ़ा लिया और अपना मूसल जैसा लौड़े का सुपाड़ा मेरी गीली चूत के मुहाने पर रखा और एक करारा धक्का दिया। मैं पीड़ा के मारे चीख उठी, क्योंकि उनका सुपाड़ा इतनी देर में मेरे अनुमान से कहीं अधिक बड़ा हो चुका था। मेरी चूत को सीमा से बाहर फैला कर उनका मोटा लौड़ा करीब चार इंच घुस चुका था। मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। सांस थम सा गया था।

“हाय मम्मी मर गई। फट गई रे बप्पा मेरी चूत।” मैं चीखी।

“चुप हरामजादी। एकदम चुप्प्प साली कुतिया, इतना लौड़ा खाने के बाद भी मरने की बात करती है। अभी देख तुझे कितना मज़ा आएगा। हिलना मत।” कहते हुए उस वहशी दरिंदे ने एक और जबर्दस्त प्रहार कर दिया और मेरी चूत को चीरता हुआ उनका लौड़ा पूरा जड़ तक अन्दर पैबस्त हो गया।

“आ्आ्आ्आ्आह” किसी हलाल होती मेमने की तरह मेरी दर्दनाक कराह निकल गई। अभी मैं इस दर्दनाक प्रहार की व्यथा से उभरी भी नहीं थी कि पीछे से मेरे पापा ने अपने लौड़े से मेरी गांड़ में हमला बोल दिया। एक भयानक धक्के से मेरे गुदा द्वार को फैलाता हुआ आधा लंड भीतर ठोंक दिया।

“हाय राम मार डाला रे आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह।” मैं कराह उठी।

अब पापा गुर्राए, “चुपचाप रह और मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में पूरा घुसाने दे कुतिया।” कहते कहते एक और हौलनाक धक्का मारकर पूरा लौड़ा जड़ तक पेल दिया। मेरी घुटी घुटी आह निकल पड़ी। ऐसा लगा मानो मेरी गांड़ फट गई और उनका 9″ लंबा लंड मेरी अंतड़ियों को चीर डाला हो।

मैं दांत भींच कर दोनों लौड़ों को बमुश्किल अपने अंदर समाहित कर स्थिर हो गई। उन्होंने भी मेरी स्थिति को समझा और कुछ पल उसी स्थिति में स्थिर रहे।

परंतु आश्चर्यजनक रूप से कुछ ही पलों में दर्द छूमंतर हो गया और मैं खुद ही चुदासी रंडी की तरह बोल पड़ी, “आह ओह अब ठीक है, अब चोदिए जी।”

उन वहशी भेड़ियों को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई। पहले धीरे धीरे अपने लंड को आगे पीछे करने लगे फिर ठापों की रफ़्तार बढ़ाने लगे। मैं उनके बीच पिसती हुई दोनों लौड़ों से चुदती आनंद के समुद्र में गोते लगाने लगी। दोनों के धक्के एक साथ लग रहे थे और मुझे हिलने की भी आवश्यकता नहीं थी। ऐसा लग रहा था मानो दोनों के लंड आपस में मिलने की कोशिश में मेरे गर्भाशय और अंतड़ियों के बीच की दीवार को फ़ाड़ डालने की जद्दोजहद में लगे हों।

“आह मेरी रानी, ओह मेरी बिटिया, ले मेरा लौड़ा, ओह रे कुतिया, ओह मेरी जान, मेरी रंडी चूतमरानी बुर चोदी,” करीम चाचा बोले जा रहे थे और चोदे जा रहे थे।

“ओह मेरी लंड रानी, तेरी गांड़ पहले क्यों नहीं चोदा। क्या मस्त गांड़ है बेटी, आह बहुत मजा आ रहा है मेरी गांड़ मरानी हरामजादी रंडी। आह ओह ले लौड़ा, हुम हुम हुं हुं।” गंदे गंदे अल्फाज़ उनके मुंह से उबल रहे थे।

मैं भी कहां कम थी। दो दो पहलवानों के बीच पिसती हुई दो दो लौड़े से चुदती मस्ती के सागर में डूबती उतराती बड़बड़ाने लगी थी, “चोद हरामजादों, बेटीचोदों, नानी को चोदा नानी चोद, मां को चोदा मादरचोद, अब बेटी को भी चोद ले, अपनी रानी बना लें, रंडी बना ले, कुतिया बना ले चुदक्कड़ों, कुत्तों, आह आह ओह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह आ्आ्आ्आ्आह।”

वे दोनों बड़े ही अच्छे साझेदारों की तरह इतनी अच्छी तरह तालमेल बैठा कर चोद रहे थे कि मैं सातवें आसमान पर पहुंच गई। कभी करीम चाचा और पापा अगल बगल से चोदते, कभी चाचा नीचे और पापा ऊपर तो कभी पापा नीचे और करीम चाचा ऊपर, मगर मैं हर हाल में उनके बीच पिसती हुई मजे लेती रही। पूरे बेड को मानो हमलोगों ने कुश्ती का अखाड़ा बना दिया हो। इस दौरान मैं एक बार उत्तेजना के चरमोत्कर्ष में बेहद हाहाकारी स्खलन से गुजरने लगी, “आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह अम्म्म्म्म्माआआआआ मैं गई््ई्््ई््ई्््््ई्््ई््ई् ” मेरे निढाल होते शरीर को संभाल कर दोनों खड़े हो गए और मुझे हवा में उठा लिया और आगे पीछे से लगातार चोदते रहे। लगातार होती चुदाई से मैं दुबारा उत्तेजित हो उठी और पूर्ण रूप से अपने आप को उनके सुपुर्द कर दिया कि अब जैसे चाहो चोद लो। वे दोनों जंगली जानवरों की तरह मुझे भंभोड़ रहे थे, झिंझोड़ रहे थे, निचोड़ रहे थे, मेरे शरीर का सारा कस बल निकाल रहे थे। मैं उनकी चुदाई क्षमता की कायल होते हुए मदहोशी में चुदती हुई अपूर्व सुख के सागर में डूब गई थी।

अंततः करीब 40 मिनट बाद पसीने से लथपथ, “आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह ले्ल्ल्ले मेरा लौड़ा रस” उन्होंने मुझे कस के मुझे दबोच कर अपना मदन रस मेरी चूत और गांड़ में पिचकारी की तरह छर्र छर्र उंडेलने लगे और उसी समय मैं भी दुबारा झड़ने लगी।

“हाय राज्ज्जा ओह लंड्ड्डराज्ज्जा आह्ह्ह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स्स्स मैं गई,” चरम सुख के वे अकथनीय पल, मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती हूं। अद्भुत, स्वर्गीय, अनिर्वचनीय। फिर हम तीनों खल्लास हो कर नंग धड़ंग निढाल बिस्तर पर लुढ़क गए। पूर्ण संतुष्टी की मुस्कान उन बूढ़ों के होंठों पर खेल रही थी। देर पहले शेर की तरह सर उठाए उनके विशाल लंड बड़ी मासूमियत से चूहों की तरह दुबक गए थे। मैं ने आज जो सुख पाया उसके लिए उन दोनों की शुक्रगुजार थी। हम निढाल जरूर थे मगर एक दूसरे के नंगे जिस्म से अब भी चिपके हुए थे। मुझे उन पर बहुत प्यार आ रहा था। मैं उनको बारी बारी से चूम उठी।

“सचमुच मेरे राजाओ, खूब मज़ा दिया आप लोगों ने। आई लव यू बोथ।” मैं बोल उठी। करीम चाचा तो निहाल हो उठे।

मेरे गालों को सहलाते हुए बोले, “तू सच में हरिया के लंड की मस्त उपज है रानी। आज तक इतना मजा नहीं आया जितना आज आया। क्या मस्त बदन है तेरा। चोद के दिल खुश हो गया। तू सच में मस्त माल है। हरिया तू सही में किस्मत वाले हो, इतनी जबरदस्त खूबसूरत सेक्सी बेटी मिली है तुझे।”

पापा गर्व से बोले, “अरे आखिर बेटी किसकी है।”

“अब बेटी वेटी कुछ नहीं, मुझे सिर्फ कामिनी बोलिए। बड़े आए बेटी बोलने वाले। एक लौंडिया आपके लंड से पैदा हुई, आपसे चुदवाने के लिए, बस यही याद रखिए।” मैं बड़ी बेशर्मी से बोली।

“हां हां, तू बस एक खूबसूरत लौंडिया हो, जिसका नाम कामिनी है और हम इस लौंडिया के चुदक्कड़। अब ठीक है?” पापा बोले।

“हां अब ठीक है मेरे चोदू बलमा।” मैं उन दोनों के लंड को सहलाते हुए बोली। “अच्छा कल आपने चार औरतों को चोदने की कहानी सुनाई, बाकी औरतों के बारे में भी तो बताईए।” मैं पूछी।

“करीम, आगे की कहानी तू बता दे भाई” पापा बोले।

“ठीक है तो सुनो। सब्जी बेचने वाली औरत से हम दोनों साझेदार हो गये थे। एक दिन तेरे बाप को सब्जी वाली के साथ चुदाई करते हुए मैं ने रंगे हाथ पकड़ लिया। दोनों फर्श पर ही चुदाई में बिजी थे। बिल्कुल नंगे। उस दिन मैं मालिक को जल्दी छोड़ कर आ गया था। दरवाजा सिर्फ उढ़का हुआ था। दरवाजा ज्योंही खुला मैं अंदर का सीन देख कर दंग रह गया। यह हरिया सब्जी वाली को कुतिया बना कर चोद रहा था।”

“यह क्या हो रहा है?” मैं जोर से बोला। नंगी सब्जी वाली की बड़ी बड़ी चूचियों को देख कर मेरा लौड़ा टनटना उठा था। उसकी फूली हुई भैंस जैसी चूत को देख कर मेरे मुंह में पानी आ गया था। मैं उसे चोदने के लिए पागल हो गया था। मैं उसे धमकाते हुए बोला, “देख मैं ने तुम दोनों को चुदाई करते हुए रंगे हाथ पकड़ा है। मुझे भी चोदने दे नहीं तो मालिक को बता दूंगा।” मैं ने धमकी दी तो सब्जी वाली गिड़गिड़ाने लगी।

“मालिक को मत बताइएगा बाबूजी, आप चाहो तो हमें चोद लीजिएगा।” सब्जी वाली औरत बोली।

“ठीक है तो हरिया, तू पहले चोद ले फिर मैं इसे चोदुंगा।” ब्लैकमेल कर के सब्जी वाली को मुझसे चुदने के लिए मना लिया।

जब तक हरिया उस औरत को चोदता रहा, मैं कपड़े उतार कर चोदने के लिए तैयार हो गया। हरिया चोद कर उस औरत को छोड़ा, मैं फनफनाता लौड़ा उठाए उसकी ओर बढ़ा, लेकिन उस औरत ने ज्यों ही मेरा लौड़ा देखा, डर के मारे रोने लगी, “बाप रे इतना मोटा लंड, हम तो मर ही जाएंगेे। मेरी बुर फट जायेगी। हमें मत चोदिए ना।” वह रोती हुई बोली।

“चुप साली रंडी, चुपचाप चोदने दे।” कहते हुए झपट कर उसे पकड़ लिया और उसके थल थल करती चूचियों को मसलते हुए उसके दोनों पैरों को फैला कर अपना लौड़ा उसकी झांटों से भरी हुई भैंस जैसी फूली बुर के मुहाने पर रखा और घप्प से एक जोरदार धक्का मारकर आधा लंड घुसा दिया। “ले रंडी हुम्म्म्म”

वह दर्द के मारे बिलबिला कर जोर से चिल्ला उठी, “आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह फाड़ दिया रे फाड़ दिया मेरा बूर। मार दिया मा्आ्आ्आ।”

मैं ने गुस्से से उसको दो झापड़ रसीद कर दिया और गुर्रा कर बोला, “चोप्प साली बुर चोदी रंडी, चुपचाप चोदने दे।” कहते हुए एक और जोर का धक्का मारकर पूरा लौड़ा उसकी बुर में उतार दिया। वह रो रही थी, छटपटा रही थी मगर मैं ने उसे छोड़ा नहीं, इतने सालों बाद तो चोदने के लिए एक औरत मिली थी, कैसे छोड़ देता। फिर तो दे दनादन चोदने लगा और कुछ ही देर में उसका रोना चिल्लाना बन्द हो गया और खूब उछल उछल कर चुदवाने लगी, “आह ओह राजा चोद साले हरामी फाड़ दो मेरी बुर, आह आह।”

“अब आ रहा है ना मज़ा साली हरामजादी कुतिया बुर चोदी, इसी के लिए इतना नाटक कर रही थी चूत मरानी” मैं बोला। आधे घंटे की घमासान चुदाई के बाद जब मैं अपना आठ साल से जमा लौड़ा रस उसकी चूत में छोड़ने लगा तो वो कुतिया भी पागल की तरह मुझसे चिपट गई और उसका भी काम तमाम होने लगा। “हाय राजा हम तो गये आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह मां ््आ इस्स्स्स मस्त चुदक्कड़ हो जी। हमको मां बना दो राज्ज्ज्जा आ्आ्आह।”

“हां रे कुतिया आज तुझे पेट से कर देता हूं हर्र्र्र्र्रामजादी रं्रं्रं्ड्ड्ड्डी आह ओह आह।” जब तक मेरे लंड का रस अपने बूर से पूरा नहीं चूस लिया, हम से चिपटी रही। उसके बाद तो हम दोनों ने मिलकर उस दिन के बाद ऐसा चोदा कि दो महीने बाद पता चला कि सच में वह पेट से हो गई और हमको बोली, “हम इस बच्चे को जन्म देंगे। आप दोनों ही इस बच्चे के बाप हो। हमरे मरद से तो बीस साल में भी बच्चा नहीं हुआ। अब बच्चा पैदा होने के बाद ही आप लोगों को चोदने देंगे नहीं तो बच्चा खराब हो जाएगा।”

हम घबड़ा गये कि तब तक हम कैसे दिन काटेंगे। हमको चोदने का चस्का लग गया था। बिना चोदे हमें चैन कैसे मिलेगा। फिर भी मन मसोस कर मैं बोला, “ठीक है, आज से हम तुझे नहीं चोदेंगे। मगर तब तक हम कैसे दिन काटेंगे?”

“अरे हम इसका गांड़ तो चोद ही सकते हैं ना। कम से कम पांच छः महीने तो आराम से गांड़ मार सकते हैं।” तेरे पापा बोले।

“नहीं बाबा आप लोगों का लंड बहुत बड़ा है। मेरा गांड़ फाड़ दोगे।” घबराकर वह बोली।

“ठीक है तो चलो अभी देख लेते हैं। अगर तकलीफ होगा तो नहीं चोदेंगे।” मैं बोला।

वह झिझकते हुए राजी हो गई। हमें तो मुंहमांगी मुराद मिल गई। फटाफट कपड़े खोल कर उसे कुतिया बना दिया और पहले हरिया अपने लंड में तेल लगा कर उसकी मोटी मोटी गोल गोल गांड़ को फैलाया और गांड़ के सुराख के पास लंड का सुपाड़ा टिका कर धीरे धीरे दबाव बढ़ाने लगा। हरिया के लंड का सुपाड़ा सामने से नुकीला होने के कारण अपने आप रास्ता बनाता हुआ अन्दर घुसता चला गया। लेकिन कुछ दूर घुसने के बाद वह चिल्ला उठी क्योंकि लंड पीछे की तरफ तो मोटा था। अब एक बार लंड को छेद मिल गया तो तेरा बाप कैसे छोड़ देता। “हाय राम मार डाला रे आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह फाड़ दिया, छोड़ हरामी” वह चिचिया उठी। हरिया कहां मानने वाला था, एक जोरदार धक्का लगाया और पूरा लंड अन्दर पेल दिया। “मां अम्मा मार दिया मादरचोद, आह” चिल्ला उठी। हरिया कुछ नहीं बोला बस चुपचाप चोदने में लग गया।

दो मिनट बाद ही पारो मस्त हो गई और बोलने लगी, “आह ओह राजा, चोद हरामी चोद मादरचोद हमारा गांड़ चोद बाबू।,” हम समझ गए मामला फिट हो गया। फिर क्या था पहले हरिया चोदा फिर हम चोदे। “बहुत मस्त है रे रानी तेरा गांड़। हम पहले काहे तेरी गांड़ पर ध्यान नहीं दिये।” मैं बोला।उस दिन के बाद हम छः महीने तक उसके गांड़ से काम चलाए। उसकी मोटी मोटी गोल गोल गांड़ को चोद चोद कर हमने और ज्यादा फैला दिया था। जब उसके मां बनने के लिए दो महीने बाकी थे और पेट गुब्बारे जैसा फूल गया था तब हमने उसको चोदना छोड़ा। आखिरी महीने में तो उसका पेट इतना बड़ा हो गया था कि बड़ी मुश्किल से चल फिर सकती थी। फिर उसको 46 साल की उम्र में जुड़वां बच्चे हुए। एक लड़की और एक लड़का। दोनों का वजन लगभग ढाई ढाई किलो था। लड़की का नाम करीम से करिश्मा और लड़के का नाम हरिया से हरीश रखा। बच्चे पैदा होने के बाद तो उसकी चूचियों का साइज़ और बढ़ गया और झूल गया था। चूत तो भोंसड़ा बन गया था। हम तीनों के बीच प्यार तो हो गया था मगर चुदाई में अब वह मजा नहीं रहा।

उसे भी समझ आ गया था कि हमारे बीच अब चुदाई में वह रस नहीं रहा। फिर भी कभी कभी चुदाई हो ही जाता था। हम दोनों अब दूसरी औरतों को चोदने के फिराक में लग गए।

आगे की घटना अगली कड़ी में

आपलोगों की कामुक लेखिका

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।