कामिनी की कामुक गाथा (भाग 12)

मेरे प्रिय सुधी पाठकों,

अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह मेरे पापा हरिया और करीम चाचा ने मिलकर अपनी हवस मिटाने के लिए दो और औरतों का शिकार किया। दोनों औरतें मजदूर रेजा थीं। उनकी कामुकता भरी कथा सुनते सुनते मैं इतनी उत्तेजित हो गई थी कि उत्तेजना के आवेग में उन हवस के पुजारियों के अंदर के जंगली जानवर को जगा बैठी, जिसके परिणामस्वरूप वे दोनों वहशी दरिंदे की तरह बड़े वहशियाना तरीके से मेरी चीख पुकार की परवाह किए बगैर मेरे जिस्म पर अपनी दरिंदगी का नमूना पेश कर डाला। बेरहमी से नोचते खसोटते रौंदते हुए मेरे शरीर को ऐसा भंभोड़ा कि मैं हाय हाय कर उठी। आश्चर्यजनक रूप से उनकी उस दरिंदगी भरी चुदाई के दौरान आरंभिक पीड़ा के पश्चात एक अलग ही प्रकार के आनंद से रूबरू हुई जिसका बयां करना मुश्किल है। करीब दो घंटे के दौरान उनकी चुदाई यात्रा कथा में पांचवीं और छठी औरत के साथ कामोत्तेजक शारीरिक संबंधों के बारे में सुनते हुए दो बार चुदी।

फिर मैंने कहा, “बस अभी का बहुत हो गया, बाकी कहानी बाद में सुनुंगी, अभी मुझे थोड़ा आराम करने दीजिए। नानाजी लोग आते होंगे। शाम को दादाजी का जन्मदिन भी मनाना है। आज मैं उन्हें सरप्राइज गिफ्ट करना चाहती हूं। उसकी तैयारी भी करनी है।” कहती हुई उसी तरह नंगी ही उठी और अपने कपड़े समेट कर अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर धम से गिर गई और करीब एक घंटे तक सोई। करीब बारह बजे नानाजी और बाकी सब लोग बाजार से वापस लौट आए। उन लोगों ने काफी सारी खरीददारी की थी।

“लो बिटिया यह तेरे लिए” कहते हुए नानाजी ने एक कैरी बैग मुझे थमा दिया। मैं ने उत्सुकता से बैग के अंदर देखा तो उसमें सुंदर लाल रंग का लहंगा चोली था।

मैं खुशी से चहक उठी, “थैंक्स नानाजी”। फिर मैंने पूछा, “बर्थडे केक का आर्डर दिया कि नहीं?”

“हां वह शाम को आ जाएगा” नानाजी ने बताया।

“बर्थडे ब्वॉय का नया कपड़ा?” मैं पूछी।

“शाम को पहनेगा तो देख लेना” नानाजी ने उत्तर दिया।

“सजावट के लिए सामान लाए कि नहीं” मैं पूछी।

“बैलूनों का एक पैकेट है” नानाजी ने बताया।

फिर हम दोपहर का भोजन करके अपने अपने कमरे में आराम करने चले गए। शाम को करीब साढ़े चार बजे मैं उठी और मेरे पापा हरिया और करीम चाचा के साथ मिलकर ड्राइंग रूम को अच्छी तरह सजा दिया। मैं ने म्यूजिक के लिए टीवी का ही इस्तेमाल करने का निश्चय किया। स्मार्ट टीवी था इसलिए पेनड्राइव में कुछ खास किस्म के गानों को लोड किया। फिर नहा धो कर सजने संवरने लगी। मेरे उरोजों का उभार पिछले पांच छः दिनों की वासना के नग्न खेल में गुत्थमगुत्थी भरी कामक्रीड़ा के दौरान दब कुचल कर थोड़ा और बढ़ गया था इसलिए ब्रा थोड़ी छोटी पड़ रही थी लेकिन किसी तरह मुश्किल से पहन ही ली। ब्रा मेरे उरोजों को बड़ी मुश्किल से संभाले हुए था। नया लहंगा चोली पहन कर अच्छी तरह मेकअप वगैरह करके अपने बालों को करीने से संवारा लेकिन बाल खुला ही रहने दिया। चोली लो कट होने के कारण मेरे सीने के उभारों का काफी नग्न हिस्सा चोली के ऊपर से स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। दोनों उरोजों के बीच की दरार की गहराई भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। चोली ऊपर से तो लो कट थी ही, नीचे से भी काफी ऊपर थी। मेरे उभारों से बमुश्किल डेढ़ इंच नीचे तक। पीठ का हिस्सा करीब करीब पूरा ही खुला हुआ था। चोली की हालत देख कर मैं ने भी जानबूझ कर लहंगा को नाभी से काफी नीचे पहना, करीब तीन इंच नीचे। मेरे लंबे पांवों के कारण लहंगा जमीन से फिर भी काफी ऊंचा था। आईने के सामने अपने को खूब अच्छी तरह निहारा, क़यामत लग रही थी मैं। आज इन मर्दों पर बिजली गिराने का इरादा था। मैं ठान चुकी थी कि आज इनके मन से सारी ग्लानी (सरदारजी वाले एपिसोड से उपजी, खास कर दादाजी, बड़े दादाजी और नानाजी के) दूर कर दूंगी और इनके अंदर के वही पुराने आत्मविश्वास से भरे मर्दों की मर्दानगी को उभाड़ कर उनके दिल की हसरतों, अरमानों को बिल्कुल बेबाक तरीके से पूरा करने का पूरा अवसर प्रदान करूंगी। अब मैंपूरे शरीर पर खुशबूदार परफ्यूम स्प्रे करके तैयार हो गई।

करीब सात बजे मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई और मेरे पापा की आवाज आई, “बिटिया नीचे ड्राइंग रूम में आ जाओ, सब आ चुके हैं।”

“ठीक है आप चलिए मैं आती हूं”, कहते हुए मैं दरवाजे की ओर बढ़ी। जब मैं कमरे से निकल कर सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी तो सबकी निगाहें मुझ पर टिक गई थीं। सब आंखें फ़ाड़ कर एक टक मुझे देखते रह गए थे। मैं उनके नज़रों की ताब न ला सकी और तनिक शरम से लाल हो उठी। मैं ने महसूस किया कि सबके कलेजे में छुरियां चल गयीं थीं।

सन्नाटा छा गया था जिसे नानाजी की आवाज़ ने भंग किया, “आओ बिटिया हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे”।

मैं ने देखा कि नानाजी, दादाजी और बड़े दादाजी एकदम बदले रूप में चमक रहे थे। क्लीन शेव करके नये कपड़ों में खूब फब रहे थे। लंबे चौड़े दादाजी और बड़े दादाजी के बगल में ठिंगने कद के नानाजी भी बुलडोग जैसे चेहरे के बावजूद फब रहे थे। मेरे आते ही जैसे महफ़िल में जान आ गई। मैं ने अपने पापा याने हरिया और ड्राईवर करीम के बारे में पूछा कि वे कहां हैं, उन्हें भी बुला लीजिए। आज की पार्टी में घर के सभी सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है। उनके बिना पार्टी अधूरी होगी। नानाजी ने उन लोगों को भी बुला लिया। अब हमारी महफ़िल में पांच पुरुष और मैं एकमात्र स्त्री थी। सबकी भूखी नजरें मुझ पर थीं जिन्हें मैं बखूबी समझ रही थी। मैं जान बूझ कर अपनी चाल ढाल और नजरों से उन सबके दिलों पर छुरियां चला रही थी। फिर सेन्टर टेबल पर एक बड़ा सा सजा हुआ केक रखा गया। उसपर एक ही बड़ा सा मोमबत्ती जलाया गया क्योंकि दादाजी की उम्र के अनुसार 65 मोमबत्ती जलाना संभव भी नहीं था। दादाजी ने फूंक मारकर उसे बुझा दिया और सबने उन्हें अपने अपने ढंग से जन्मदिन की बधाई दी। मैं ने भी उन्हें बधाई देते हुए सबके सामने ही उनसे लिपट कर एक गरमागरम चुम्बन दिया। सब के सब ईर्ष्या से जल भुन गये। फिर दादाजी ने केक काटा और सबको एक एक टुकड़ा दिया। मैं ने एक टुकड़ा उठा कर दादाजी को खिलाया। करीब तीन चौथाई केक बच गया तो मैंने कहा कि उसे अभी वैसा ही रहने दिया जाए। मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। फिर मैंने दादाजी को बड़े सोफे पर अकेले बैठा दिया।

उन्हें फूल गुच्छा दिया गया, उपहार दिया गया और जब मेरी बारी आई तो मैंने बड़े मादक अंदाज में कहा, “मैं आज दादाजी को खास उपहार देना चाहती हूं लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि आप सब को यह मान लेना पड़ेगा कि यहां आप सब एक ही स्तर के मर्द हैं और मैं सिर्फ एक स्त्री। आपस में कोई नौकर, ड्राईवर मालिक वाली भावना नहीं होनी चाहिए। आपलोग स्वतंत्रता पूर्वक व्यवहार कीजियेगा, इसमें न ही मुझे कोई आपत्ती होगी और न ही आपलोगों के बीच किसी प्रकार की आपत्ती और मतभेद होना चाहिए। छोटे बड़े का लिहाज बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यहां जो कुछ भी होगा, इस दौरान हम जो कुछ भी अनुभव करेंगे, अपने अपने लफ्जों में बिना लाग-लपेट के बेहिचक व्यक्त करेंगे। हम सब इस कमरे में अपने मन के अनुसार कुछ भी करने को बिल्कुल आजाद हैं, इस बात का ख्याल रखना है कि दादाजी की इच्छा का भी हमें मान रखना है।”

“ठीक है, ठीक है, ऐसा ही होगा” सब बेसब्री और उत्सुकता से एक स्वर में बोल उठे।

“ठीक है तो आपलोग अपनी अपनी जगह पर बैठ जाईए। आज हम सब खुल कर दादाजी के जन्मदिन में मज़ा करेंगे। आपलोग सिर्फ इतना याद रखियेगा कि आज के मुख्य अतिथि दादाजी हैं और दादाजी की इच्छा का सम्मान हम सब को करना है।” मैं बोली।

“ठीक है बाबा ठीक है, अब तुम्हें जो उपहार देना है जल्दी दो, ज़रा हम भी तो देखें क्या उपहार है।” नानाजी बेसब्री से बोले।

“आप लोग शराब तो अवश्य लाए होंगे?” मैं ने पूछा।

“यह भी कोई पूछने की बात है? राघव का जन्म दिन हम ऐसे ही सूखे सूखे थोड़े मनाएंगे।” नानाजी ने कहा। “तो फिर बोतल निकालिए और सबके लिए ग्लास भी” मैं बोली।

“सबके लिए मतलब? तू भी पिएगी क्या?” नानाजी बोले।

“अरे नहीं बाबा, मैं दारू नहीं पीती हूं। मेरे लिए कोल्डड्रिंक चलेगा।” मैं बोली। नानाजी ने फटाफट शराब की बोतल, पानी, सोडा और ग्लास ला कर सेंटर टेबल पर रख दिया।

“ऐसे नहीं, सबके लिए जाम तैयार कर के रखिए।” मैंने कहा। उन्होंने वैसा ही किया। मेरे लिए एक ग्लास में फैंटा ओरेंज डाला। मैं ने पेनड्राइव म्यूजिक सिस्टम में लगा कर जानी मेरा नाम का गाना,

“हुस्न के, लाखों रंग, कौन सा, रंग देखोगे, आग है, ये बदन, कौन सा अंग देखोगे।” चुना और सबकी ओर मुखातिब हो कर कहा, “अभी मैं इस गीत पर नृत्य प्रस्तुत करूंगी और नृत्य के दौरान मेरे इशारे को समझ कर उसी के अनुसार ठीक वैसा ही आप लोग भी कीजियेगा। ठीक है?”

“ठीक है ठीक है” सबने एक स्वर से कहा। मैंने म्यूजिक सिस्टम चालू कर दिया। मैं जब पेन ड्राइव लगा रही थी उसी दौरान नानाजी ने चुपके से मेरे ग्लास में शराब मिला दिया था जिसका मुझे पता ही नहीं चला और उसका नशा बाद में बहुत धीरे-धीरे मुझ पर होने लगा था। जैसे ही गाना चालू हुआ, मैं ने नृत्य शुरू किया। नृत्य करते करते दो तीन मिनट बाद मैंने हाथ पीछे ले कर चोली की रस्सी खोल दी और धीरे धीरे चोली उतारने लगी। मैं ने उन्हें इशारा किया ऐसा ही करने के लिए। वे भी फटाफट अपने कुर्ते उतारने लगे। कुछ पलों में ही मैं चोली से मुक्त हो गई और चोली दादाजी की ओर उछाल दिया। उधर वे सभी भी कुर्ते उतार कर बनियान में आ गए। मैं ने नृत्य करते करते बारी बारी से सबको जाम थमाया और मैं अपने ग्लास का कोल्डड्रिंक गटक गई, थोड़ा अजीब सा स्वाद लगा लेकिन माहौल की गर्मी और कोल्डड्रिंक की मिठास के कारण मैं ने उस पर ध्यान नहीं दिया। मैं अब कमर से ऊपर सिर्फ ब्रा में थी। कसे हुए ब्रा से बमुश्किल संभले हुए अपने उन्नत उरोजों को मादक अंदाज में हिलाते और अपनी कमर लहराते हुए दो तीन मिनट तक नृत्य करते करते मैं ने एक झटके में लहंगा नीचे गिरा दिया और उन्हें भी ऐसा करने का इशारा किया। उन्होंने फटाफट अपने पैजामे को अवांछित वस्तु की तरह अपने तन से अलविदा कर दिया और बनियान और अंडरवियर में आ गए। नानाजी नें शराब का पहला पैग खत्म होते ही दूसरा पैग बना दिया और उसी तरह मेरे ग्लास में भी शराब मिस्रित कोल्डड्रिंक भर दिया। अब तक वे काफी उत्तेजना में आ चुके थे और सबके अंडरवियर विशाल तंबुओं की शक्ल अख्तियार कर चुके थे। अब मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में बड़े ही कामुक अदाओं के साथ कमर मटकाते हुए थिरक रही थी। मेरी पैंटी के सामने फूली हुई योनि स्पष्ट नामुदार हो रही थी। मेरे उत्तेजक नृत्य को देखते हुए भूखे भेड़ियों की तरह अपनी आंखों में वहशी जानवरों की चमक लिए हुए सब के सब फिल्म के खलनायक प्रेमनाथ की तरह अपनी जगह पर बैठे बैठे गद्देदार सोफे पर उछल रहे थे। थिरकते हुए मैं ज्यों ही दादाजी के पास पहुची, उन्होंने मुझे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और मेरे उरोजों को मसल दिया और चूम लिया। “अब तू मुझे अपने हाथों से पिला” दादाजी बोले। मैं तनिक चिहुंक उठी थी क्योंकि मैं असंतुलित हो कर सीधे उनके विशालकाय तंबू की शक्ल अख्तियार किये हुए सख्त लिंग पर बैठ गई थी। ऐसा लगा मानो मेरी पैंटी और उनके अपने अंडरवियर को फाड़ कर उनका फनफनाता लिंग मेरे नितंबों की दरार में धंस गया हो। मैं गनगना उठी। फिर भी मैं ने उनकी गोद में बैठे बैठे अपने हाथों से दादाजी को दूसरा पैग पिलाया आखिर वे आज के बर्थडे ब्वॉय जो ठहरे। दूसरा पैग पिलाने के बाद उठ गई और फिर से नृत्य करते हुए अपनी कसी हुई ब्रा का हुक खोल दिया और एक झटके से अपने उरोजों को ब्रा से मुक्त कर दिया। मेरी नग्न कबूतरियां फड़फड़ा कर उनके सामने तन कर खड़ी हो गयीं। इस बार मेरे इशारे का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं थी, उन्होंंने आनन फानन में अपने अपने बनियान उतार फेंके। उधर सबने दूसरा पैग भी खत्म किया और मैं कोल्डड्रिंक का दूसरा ग्लास भी गटक गई। ड्राइंगरुम के अंदर वासना की गर्मी और उत्तेजना अपने चरम पर थी। बहुत ही अश्लील माहौल बन चुका था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने को नियंत्रित कर रखा था। उनके अंडरवियर फट पड़ने के कागार पर थे। अब मैं ने थिरकते हुए पैंटी के ऊपर से ही अपनी उंगली योनि के ऊपर फिराने लगी। वे लोग भी अंडरवियर के ऊपर से ही अपने अपने लिंग सहलाने लगे। मैं एक उंगली से पैंटी को नीचे सरकाने लगी।

“और थोड़ा नीचे, और नीचे” सब एक स्वर में बोल उठे। धीरे धीरे पैंटी से मेरी योनि की दरार दिखने लगी। उनके मुख से सिसकारियां निकलने लगी। फिर मैंने पूरी की पूरी पैंटी एक झटके में निकाल फेंका और मादरजात नंगी हो गई, फिर क्या था वे भी लगभग मेरे ही साथ, या फिर मुझसे भी पहले, पूरे नंगे हो गये, मुझ पर टूट कर भंभोड़ डालने को बेताब। शराब का नशा धीरे धीरे सभी पर चढ़ रहा था और मुझ पर भी कोल्डड्रिंक में मिले शराब ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। मेरे कहने की आवश्यकता नहीं थी, नानाजी ने तीसरा पैग बना कर सबको दिया और सभी ने एक ही सांस में तीसरा पैग भी अपने हलक में उतार दिया। इधर पहला गीत खत्म हुआ और भोजपुरी में दूसरा गीत चालू हुआ, “हाय बेदर्दी बलमा जरा धीरे धीरे”।

इससे पहले कि वे मेरी ओर बढ़ते, मैं ने उनको रोका और कहा, “अभी थोड़ा सब्र कीजिए, एक खेल बाकी है।” कहते हुए मैं ने केक का एक टुकड़ा लिया और दादाजी के मूसलाकार लिंग पर पोत दिया। फिर मैं झुक कर अपने जीभ से उनके लिंग को ऊपर से नीचे तक चाट चाट कर साफ़ करने लगी।

मेरे इस उत्तेजक हरकत से दादाजी के मुंह से कामुक आहें निकलने लगी थी। “आह बिटिया।”

मैं ने टोका, ” बिटिया नहीं, कामिनी बोलिए, रंडी बोलिए, कुतिया बोलिए, मगर बिटिया मत बोलिए”।

” हां रे बुर चोदी कुत्ती चाट मेरा लौड़ा, चूस हरामजादी” अब दादाजी जोश में आ गए थे। इसी बीच बाकी लोगों ने बचा खुचा केक मेरे पूरे नंगे बदन पर मल दिया था और मेरे नंगे तन को कुत्तों की तरह चाटने लगे।

जैसे ही मैंने दादाजी का लिंग चाट कर साफ़ किया, दादा जी बोल उठे, “चल अब हम सब इसे एक साथ चोदेंगे।”

“एक साथ? नहीं बाबा नहीं, एक साथ नहीं, मर जाऊंगी, प्लीज।” मैं ने घबराने का नाटक किया और उनसे छूट कर भागने लगी।

“पकड़ साली हरामजादी कुतिया को, आज इसको सब मिलकर कुत्ती बना देंगे” दादाजी बेहद वहशियाना ढंग से बोले।

सब मेरे पीछे भागे, “भाग कर जाएगी कहां साली बुर चोदी,” नानाजी बोले। अंततः मैं जानबूझ कर गिर पड़ी और सबने मिलकर मुझे दबोच लिया। सबने मिलकर मुझे उठाया और सेंटर टेबल पर लिटा दिया।

“नहीं नहीं सब एक साथ नहीं” मैं चिल्लाने लगी मगर अब शुरू हुआ काफी देर से कामोत्तेजना की अग्नि में धधकते नंग धडंग भूखे, शराब के नशे के सुरूर में डूबे, कामुक वहशी जानवरों का कामुकता पूर्ण बेहद वहशियाना खेल। उनको दादाजी की तरफ से हरी झंडी मिल गई, एक साथ मुझ पर टूट पड़े। एक एक उरोजों को नानाजी और बड़े दादाजी आपस में बांट कर बेरहमी से मसलने और चूसने लगे। दादाजी मेरी फूली हुई योनि पर टूट पड़े और पागलों की तरह चाटने और चूसने लगे।

मेरे पापा मेरे मुंह के पास अपना टनटनाया लिंग लाए और बोले, “ले चूस मेरा लौड़ा साली चूतमरानी रंडी”। करीम चाचा मेरे नितंबों को फैला कर गुदा मार्ग में जीभ डाल कर चाटने लगे। मुझमें भी अब तक नशे का असर हो चुका था और मैं पागलों की तरह उनकी कामुकता की पराकाष्ठा को पार करते हुए वासना के इस बेहद घिनौने कृत्य में संलिप्त सिसकारियां भरने लगी थी। पांच मिनट में ही मैं उत्तेजना के चरमोत्कर्ष में पहुंच कर अभूतपूर्व स्खलन में डूब गई। मेरे शरीर की थरथराहट को सबने महसूस किया मगर वे अपने हवस और नशे में डूबे मुझे भंभोड़ने में लगे रहे। उनके सम्मिलित कामकेली से मेरी काम पिपाशा पुनः जागृत हो गई और मैं संभोग के लिए छटपटाने लगी। दादाजी ने तुरंत मुझे उठा कर फर्श के कालीन पर लिटा दिया और मेरे पैरों को फैला कर मेरी योनि में अपना लिंग अड़ाया और एक भीषण प्रहार से पूरा का पूरा लिंग एक ही बार में मेरी योनि में ठोंक दिया।

“ले बुर चोदी हमारा लौड़ा तेरी बुर में” इतनी बेरहमी से उन्होंने प्रहार किया था कि मेरी घुटी घुटी आह निकल पड़ी। उन्होंने मुझे कस के पकड़ा था और मुझे लिए दिए एक करवट हो गये।

पीछे से पहले से तैयार करीम चाचा ने मेरे नितंबों को फैला कर गुदा द्वार में अपना भीमकाय लिंग का सुपाड़ा टिका कर एक ही जोर के झटके से सटाक से पूरा नौ इंच लम्बा लिंग मेरी गुदा में भोंक दिया। “ले साली कुतिया मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में”।

नशे में होने के बावजूद भीषण प्रहार से मैं तीव्र पीड़ा के मारे चीख पड़ी, “हाय मादरचोद, साले कुत्ते, गांड़ फाड़ दिया रे्रे्रे्रे्रेए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह”।

मगर मेरी चीख पुकार की किसे पड़ी थी, सब के सब जंगली जानवर बन चुके थे। मुझे उसी हालत में लिए हुए दादाजी सोफे पर बैठ गए। सामने मेरी योनि में दादाजी का लिंग घुसा हुआ था, पीछे मेरी गुदा में करीम चाचा का विशाल लिंग धंसा हुआ था, सोफे के पीछे से मेरे पापा अपना खौफनाक लिंग मेरे मुंह में डाल चुके थे और मेरे एक हाथ में नानाजी का लिंग, दूसरे हाथ में बड़े दादाजी का लिंग था। मैं पूरी तरह उन वासना के भूखे भेड़ियों के चंगुल में फंसी अपने तन को पिसते देखने और किसी हलाल होते हुए मेमने की तरह विवशता में पीड़ा और आनंद मिस्रित स्थिति में खुद को उनके रहमो करम पर छोड़ दिया। अब मैं पांच नशे और उत्तेजना में मदहोश, विभिन्न रंग रूप और शरीर के साथ, हवस के भूखे जंगली जानवरों सरीखे मर्दों से पिसती, उनके विकृत सामुहिक संभोग में लिप्त हो गई। उनके विभिन्न आकार, लंबाई और मोटाई के लिंग, मेरे तन के हर उपलब्ध छिद्रों में या मेरे हाथों की मुट्ठियों में थे और वे अपनी अपनी कामक्षुधा तृप्त करने के लिए जी जान से मुझ पर पागलों की तरह पिल पड़े थे।

करीम चाचा अपने विशाल लिंग को मेरी गुदा में अंधाधुंध ठोंकते हुए मेरे उरोजों को बेहद वहशियाना तरीके से दबा रहे थे और बोल रहे थे, “गांड़ मरानी कुतिया, आज तेरी गांड़ का भुर्ता कर दूंगा, साली रंडी, ओह तेरी गांड़ का गूदा निकाल दूंगा आह छिनाल”,

इधर दादा जी मेरी कमर को सख्ती से पकड़े हुए मेरी योनि में अपने लिंग को दनादन पेलते हुए बोल रहे थे, “हां मेरी बुर चोदी चूत मरानी कुत्ती, साली हरामजादी, रंडी की औलाद, कुतिया की बेटी, छिनाल चूत मरानी, आज तेरी बुर का ऐसा भोंसड़ा बनाऊंगा कि तेरी मां याद आ जाएगी, आह ओह चूत की चटनी बना दूंगा”।

मेरी हालत की किसे परवाह थी, मैं ने तो खुद उन्हें खुला निमंत्रण दे कर उनके अंदर के जंगली जानवरों को जगाया था।

मेरे पापा मेरे मुंह में अपने लंबे और टेढ़े लिंग से मेरे साथ मुखमैथुन करते हुए बड़बड़ कर रहे थे, “चूस हरामजादी मेरा लौड़ा, खा कुतिया मेरा लंड, आह ओह मां की लौड़ी”।

मैं उनकी अश्लील बातों और कामुक हरकतों से उत्तेजित नानाजी और बड़े दादाजी के फुंफकारते लिंगों को अपनी मुट्ठियों पकड़े उन्हें हस्तमैथुन का सुख प्रदान कर रही थी और वे भी अश्लील गालियों के साथ हस्तमैथुन का मज़ा ले रहे थे। “साली मूठमारनी रंडी, मूठ मार कुतिया की औलाद, रंडी की चूत” बड़े दादाजी दहाड़े।

वे सब अपने अपने ढंग से मेरे तन से अपनी वासना की आग शांत करने में लिप्त हो गये। पन्द्रह बीस मिनट बाद सर्वप्रथम दादाजी ने मेरी कमर को सख्ती से पकड़ कर अपने से चिपका लिया और अपना वीर्य मेरी कोख में छर्र छर्र भरने लगे। ज्यों ही वे स्खलित हो निवृत्त हुए और हटे, उनका स्थान मेरे पापा ने लिया और धकाधक चोदने में मशगूल हो गए। करीब पांच मिनट बाद वे भी अपने वीर्य को मेरी कोख में भरने लगे, “आ्आ्आ्आ्ह बुर चोदी”।

अब मेरा मुंह स्वतंत्र था, मैं भी अपशब्दों की बौछार कर बैठी, “आह मादरचोद, कुत्ते साले हरामी, सूअर की औलाद, रंडी बना दे, अपने बच्चों की मां बना दे कुतिया बना दे हरामी आह मैं गई” कहते हुए मैं भी खल्लास हो गई। मगर जैसे ही मेरे पापा खल्लास हो कर हटे बड़े दादाजी ने मेरी चूत में धावा बोला और धकाधक चोदने लगे।

करीब दो मिनट में ही वे भी मेरी चूत में वीर्य उंडेलने लगे, “आ्आ्आ्आ्आह बुर चोदी आज तुझे हम सब मिलकर पेट से कर्र्र्र्र्र् देंगे आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।”

मैं अब तक दो बार झड़ चुकी थी मगर अब मेरे नानाजी और करीम चाचा का लंड अपनी चूत में लेना बाकी था। मैं चाहती थी कि आज सबके सब मेरी चूत में ही वीर्य डालें। आठ दस दिन पहले मेरी माहवारी बंद हुई थी और मुझे लग रहा था कि इस समय संभोग से मुझे गर्भ ठहर सकता है किंतु मुझे इसकी रंच मात्र भी परवाह नहीं थी। इस वक्त तो मैं उन बूढ़ों के सामुहिक चुदाई के अपार आनंद में डूब गयी थी। मैं ने करीम चाचा को मेरी चूत परोस दी। मैं जानती थी कि नानाजी का लौड़ा मेरी चूत में फंस जाएगा अतः सबसे अंत में मैं उनको मौका देना चाहती थी। करीम चाचा ने आव देखा न ताव झट से अपने गधे जैसे लंड को एक ही बार में मेरी चुदी चुदाई बुर में उतार दिया और लगे भकाभक चोदने। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मेरी घुटी चीख निकल पड़ी।

“साली बुर चोदी कुतिया तीन तीन लोगों से चुदवा ली है और अभी मेरे लौड़े से चुदने में तेरी चूत फट रही है रंडी कहीं की, देख मैं तुझे कैसे चोदता हूं,” कहते कहते करीब दस मिनट और भयानक ढंग से पटक पटक कर चोदा और फ़िर अपना वीर्य मेरी कोख में भर कर निढाल हो गया। अब बारी आई नानाजी की। उस बुलडोग बूढ़े ने मुझे कुतिया की तरह झुका कर पीछे से कुत्ते की तरह मेरी चूत में अपना लौड़ा ठोंक दिया और लगे दनादन चोदने।

“हरामजादी बहुत इंतजार कराया, मां की लौड़ी कुतिया।” नानाजी बोले।

“हाय मेरे बूढ़े बलमा। आप ही तो एक कुत्ते हो जिसकी मैं कुतिया हूं। मुझे अपनी कुतिया बना के चोद मेरे कुत्ते रज्ज्ज्ज्जा, मुझे अपने पिल्लों की मां बना दे मादरचोद आ्आ्आ।” मैं बोली।

“हां रे मेरी कुत्ती, अभी मैं तुझे गर्भवती करता हूं साली चुदक्कड़ रंडी, तुझे मेरे कुत्तों की मां बना दूंगा बुर चोदी, आह आह ओह ओह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह,” बोलते हुए करीब दस मिनट चोदते रहे और फिर अपना वीर्य मेरी कोख में फचफचा कर भरने लगे और इसी समय “आह रज्ज्ज्ज्आ्आ्आह्ह्ह् मैं गई रे मादरचोद” मैं भी चुदाई की मस्ती के चरमोत्कर्ष में तीसरी बार छरछरा कर झड़ने लगी। तभी “आ्आ्आ्आह” दर्दनाक चीख निकल पड़ी जब मैं ने अपनी चूत के अंदर विशाल गेंद की शक्ल अख्तियार कर चुके नानाजी के लंड से फंस गई। मैं ने छूटने की हल्की सी कोशिश की लेकिन उनका लंड गांठ इतना बड़ा हो चुका था कि मेरी चूत फटने फटने को होने लगी। मैं पीड़ा के मारे स्थिर हो गई और अपने को उसी हालत में छोड़ दिया।

“साले कमीने कुत्ते आखिर मुझे अपनी कुतिया बना ही लिया, बेटी चोद, आह ओ्ह्ह्ह्ह” मैं कुतिया की तरह उनके लौड़े से फंसी बड़ बड़ करती रही। करीब बीस मिनट तक हम कुत्ते कुतिया की तरह आपस में जुड़े रहे उसके बाद उनका लंड सामान्य हुआ और “फच्चाक” की आवाज से मेरी चूत से बाहर निकल आया। हमारी चुदाई को सभी बड़े ही आश्चर्य, अविश्वास और कौतूहल से देख देख मजा लेते रहे। यह कार्यक्रम करीब दो घंटे तक चलता रहा था। सभी मर्दों ने जी भर के मनमाने ढंग से मुझे चोदा और अपने अंदर की ग्लानी से मुक्त हो कर मानो हवा में उड़ने लगे थे। सभी खुश थे और मैं भी बेहद खुश थी कि इन पांच वहशी दरिंदों की दरिंदगी भरी कामक्रीड़ा में शामिल हो कर उनकी सामुहिक भोग्या बन कर अकेले दम पर उनकी काम पिपाशा शांत कर सकी। मुझे अपनी क्षमता पर नाज़ हो रहा था, यह और बात है कि इस तरह मैं बड़ी ही बेशरम, नीच, छिनाल बनती जा रही थी। हम सभी थके मांदे पूरी तरह संतुष्ट निढाल नंग धड़ंग अवस्था में फर्श पर बिछे कालीन पर पड़े हुए थे।

मेरी चूचियों और सीने पर नानाजी और बड़े दादाजी के दांतों के लाल लाल निशान पड़ गये थे। करीम चाचा ने इस बेदर्दी से मेरी चूचियों को मसला था कि अभी भी दर्द कर रहा था जो कि चुदाई की मस्ती में मुझे महसूस नहीं हुआ था। मेरी चूत तो फूल कर किसी चुदी हुई कुतिया की तरह बाहर की ओर उभर आई थी। मेरी गांड़ का तो करीम चाचा ने सच में भुर्ता बना दिया था।

अचानक नानाजी, दादाजी से बोले, “अरे रघु, तूने चोदते समय कामिनी को रंडी की औलाद, कुतिया की औलाद क्यों कहा था?”

“यह सच है। इसकी मां सही में छिनाल ही थी। चाहे अनचाहे वह रंडी बनी। मेरा बेटा बच्चा पैदा करने के काबिल नहीं है यह बात मैं जान गया था, उस डॉक्टर से जिसने उसकी जांच की थी। उसका वीर्य बहुत पतला था। उसके वीर्य में शुक्राणु नहीं के बराबर थे या बहुत कमजोर थे जो लाइलाज था। फिर भी मेरी बहु गर्भवती हुई। मैं चकित था और एक दिन मैं ने अकेले में उससे पूछ ही लिया, “बहु सच बताओ, किसका बच्चा तेरे पेट में पल रहा है?” वह सन्न रह गई।

मैं बोला, “देखो मुझे पता है कि मेरा बेटा बाप नहीं बन सकता है। तूने किसके साथ मुंह काला किया है? मुझे सच बताओ तो मैं कुछ नहीं बोलुंगा, क्योंकि यह हमारे परिवार की इज्जत का सवाल है। तू गर्भवती है, सभी खुश हैं, हमारे खानदान का चिराग आने वाला है इस ख्याल से मैं भी खुश हूं। अब बता कौन है वह आदमी?” डरते डरते और रोते रोते उसने हरिया का नाम लिया। मैं ने उसे कहा कि यह बात और किसी को पता नहीं चलना चाहिए। फिर उसने इस लौंडिया को जन्म दिया। हम थोड़े निराश हुए लेकिन एक संतान होने की खुशी परिवार में थी। मुझे इस बात की तसल्ली थी कि मेरी बहु मां बन सकती है।

मैं ने कामिनी के पैदा होने के एक साल बाद बहु से कहा, “अब हमें खानदान चलाने के लिए एक बेटे की जरूरत है। मैं नहीं चाहता कि तुम फिर से बाहर के किसी मर्द के बच्चे को जन्म दो, जब घर में ही मेरे जैसा मर्द उपलब्ध है तो क्यों नहीं मुझसे ही संभोग करके गर्भधारण करती हो?”

मेरे इस प्रस्ताव से वह हत्प्रभ रह गई फिर बोली, “हाय राम, ससुरजी आप के साथ?”

“हां मेरे साथ। क्यों, मुझमें क्या खराबी है? चुपचाप मेरी बात मान लो वरना ठीक नहीं होगा।” मैं बोला। असल में जब से मुझे पता चला कि बहु लक्ष्मी बाहर के मर्द से चुद चुकी है, मैं उसे अलग ही नजर से देखने लगा था। उसके मस्त जवान नंगे बदन को अपनी बाहों में भर कर चोदने का ख्याल बार बार मेरे दिमाग में घूमता रहता था। मैं ने इसी बहाने से उसे मजबूर किया और चोदा।

यह सब मेरे इस चचेरे बड़े भाई केशव को एक दिन पता चला तो मुझसे बोला, “साले मादरचोद, अकेले अकेले इतने मस्त माल में हाथ साफ कर रहे हो? मुझे भूल गए हरामी? मैं भी बहु को चोदुंगा।” मैं क्या करता। राजी हो गया और बहु को केशव से भी चुदने के लिए मजबूर किया। फिर ठीक नौ महीने बाद इसका भाई पैदा हुआ। इस तरह मैं कुछ हद तक अपनी बहु लक्ष्मी को रंडी बना दिया।”

“ओह दादाजी आप तो बहुत बड़े हरामी निकले। मेरी मां को भी रंडी बना दिया।” मैं बोली।

नानाजी भी बेसाख्ता बोल उठे, “साले मादरचोद मेरी बेटी को इस हरामी हरिया के साथ साथ तुम दोनों भी चोद लिए? बड़े कमीने हो साले हरामियों।”

अगले भाग में आप विस्तार से जानेंगे कि किस तरह से मेरे दादाजी और बड़े दादाजी का मेरी मां के साथ अनैतिक संबंध स्थापित हुआ।

तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

आपकी कामुक लेखिका

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।