कामिनी की कामुक गाथा (भाग 34)

पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि किस तरह मैं ऋतेश के आकर्षण में बंधी डील फाईनल करने होटल में गयी और ठिंगने, कुरूप, बदशक्ल व्यवसायी रूपचंद और ज्ञानचंद जैसे कामुक भेड़ियों के हत्थे चढ़ी। वे मेरे नग्न शरीर को स्वछंद तरीके से भोगने के लिए बेकरार थे। अब आगे:-

तभी रूपचंद जी की आवाज आई, “ले चल ज्ञान इसे बिस्तर पर, फिर हम इसके साथ खेलते हैं खुला खेल फरुक्काबादी। पहले तू खेल ले फिर मैं आता हूँ मैदाने जंग में। आह्ह्ह्ह्ह साले ऋतेश, ओह्ह्ह्ह मेरी जान उफ्फ्फ, तेरी इसी अदा पर तो फिदा हूँ साले गांडू। ओह ऋतेश मजा आ रहा है आह आह, बस अब बस कर, अभी इस कुतिया को चोदने दे, फिर तेरी चिकनी गांड़ की भूख भी मिटा दूंगा।”

ऋतेश के चूसने का अंदाज था ही गजब। रूपचंद का लिंग अब गधे के लिंग की तरह अपने पूरे शबाब पर था, बेहद भयावह। वे बेहद उतावली में मेरी ओर बढ़े, बिस्तर की ओर, जहां अबतक ज्ञानचंद ने मुझे एक झटके में अपनी गोद में उठा कर ला पटका था। ठिंगना आदमी मुझ जैसी लंबी स्त्री को इतनी आसानी से उठा लेगा इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। काफी मजबूत थीं उसकी बाजुएं। मुझे किसी गुड़िया की तरह कितनी आसानी से उठा कर बिस्तर पर ला पटका। मैं उसकी दानवी शक्ति पर अचंभित रह गई। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, ज्ञानचंद ने सीधे मुझे चित लिटा दिया और मेरे पेट के दोनों तरफ घुटनों के बल पैर रख कर मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया और मुझे चूमने लगा। मेरे होंठों को अपने थूथन में ले कर चूसने लगा। मेरे तने हुए उन्नत उरोजों को अपनी सख्त हथेलियों से बड़ी बेरहमी से मसलने लगा। “वाह, कितनी टाईट चूची है रे इस लौंडिया की, मैं तो पहले इसकी चूचियों को ही चोदूंगा।” वह बोला। दर्द के मारे मेरा बुरा हाल होने लगा। मैं चीखना चाहती थी मगर मेरा मुह उसके थूथन से बंद था, सिर्फ गों गों की घुटी घुटी आवाज मेरे हलक से निकल रही थी। उसका विशाल लिंग मेरे दोनों उरोजों के बीच आ चुका था। मैं छटपटा रही थी लेकिन उसने मुझे इस कदर बेबस कर दिया था कि मैं सिर्फ पैर पटकती रह गई। इससे पहले कि मैं समझ पाती कि चूचियों को चोदने का क्या तात्पर्य है, ज्ञानचंद ने मेरे दोनों उरोजों को सख्ती से पकड़ कर आपस में सटा दिया और अपना भीमकाय बेलन सरीखा लिंग दोनों उरोजों के बीच की घाटी में पूरी ताकत से ठेलने लगा। गनीमत था कि उसका लिंग मेरे थूक से लिथड़ा हुआ था, सर्र से दूसरी ओर पार हो गया और मेरी ठुड्ढी को छूने लगा। मेरे मुह के लार से लिथड़े होने के बावजूद मुझे पीड़ा का आभास हो रहा था क्योंकि एक तो उसने बड़ी जोर से दोनों उरोजों को आपस में सटा रखा था, दूसरे उसके इतने मोटे लिंग को उस संकरी घाटी में जबरदस्ती घुसाने का प्रयास।

“आह मेरी जान, ऐसी बड़ी बड़ी और सख्त चूचियों को चोदने का मजा ही कुछ और है। हुम्म्म हुम्म्म आह्ह्ह्ह्ह ओह” ज्ञानचंद मस्ती में भर कर बोला। अभी यह हमला ही मानो काफी नहीं था, रूपचंद अपने भाई ज्ञानचंद के पीछे उछल कर आ गया और मेरे दोनों पैरों को उठा दिया। मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया। फिर उसने मेरे आव देखा न ताव, तपाक से मेरी पनिया उठी फकफकाती योनी के द्वार पर अपना दानवी हथियार सटा दिया। ओह, उसके मूसल का स्पर्श ज्यों ही मेरी योनी द्वार पर हुआ, मेरा पूरा शरीर गनगना उठा। कब से तरस रही थी मैं अपनी योनी में पुरुष लिंग के लिए। मेरा दिल इधर धाड़ धाड़ धड़क रहा था इस आशंका में कि उनका इनका विकराल लिंग को मैं अपनी योनी में झेल पाऊंगी कि नहीं। मगर मेरी उत्तेजना अब तक इस कदर बढ़ गई थी कि भय के बावजूद मैंने अपनी प्यासी योनी को उस जालिम भेड़िये के सम्मुख समर्पित कर दिया। भय मिश्रित रोमांच का अद्भुत अनुभव कर रही थी मैं। ज्ञानचंद ने जैसे ही अपने थूथन से मेरे होंठों को मुक्त किया, मैं, सिसिया उठी, “इस्स्स्स्स आह्ह्ह्ह्ह”।

तभी, “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह,” कहते हुए रूपचंद जी ने किसी निर्दयी कसाई की तरह अपने लिंंग का भीषण प्रहार मेरी योनी में कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्, मर गई मैं, ओह्ह्ह्ह मां, फाड़ दिया मादरचोद,” मैं चीख पड़ी। एक ही करारे प्रहार से रूपचंद जी ने करीब एक तिहाई लिंग मेरी योनी में घोंप दिया था। उफ्फ्फ, उनका मोटा लिंग मेरी योनी को अपनी सीमा से भी ज्यादा फैला कर किसी कसाई के खंजर की तरह ऐसा घुसा कि मेरी हालत हलाल होती बकरी की तरह हो गई। मैं छटपटा भी नहीं पा रही थी। दोनों भाईयों ने मुझे इतनी कुशलता के साथ बेबस कर रखा था कि मैं हिलने से भी मजबूर थी।

“निकाल साले कुत्ते अपने लंड को, आह, मार ही डालिएगा क्या। ओह मा्म्म्म्म्आं्आ्आ्आं।” मैं लगातार चीखती जा रही थी। मेरी सारी उत्तेजना हवा हो गई थी। अकथनीय पीड़ा से दो चार हो रही थी मैं।

“चुप साली बुरचोदी, ड्रामा मत कर हरामजादी, ले मेरा लौड़ा थोड़ा और हुम्म्म्म्म्म्म” एक और करारा प्रहार कर दिया उस कमीने ने। उफ्फ्फ, ऐसा लग रहा था उनका लंड सीधा मेरी बच्चेदानी तक पहुंच गया हो। अब मैं पूरी तरह बेबस हो गई। मुझे हिलने में भी कष्ट हो रहा था। हिलने की कोशिश में मैं और अधिक दर्द का अनुभव कर रही थी अतः मुझे समझ आ गया था कि शांत रह कर चुदने में ही मेरी भलाई है।

करीब दस इंच लिंग मेरी योनी के अंदर प्रवेश कर चुका था। मैं दांत भींच कर अपनी पूरी सहन शक्ति को एकत्रित करके तत्पर हो गई थी उनके लिंग को अपनी योनी में समाहित करने के लिए। अब रूपचंद जी धीरे धीरे लिंग बाहर निकालने लगे। करीब दो इंच निकाल कर दुबारा गच्च से अंदर घुसा दिया कमीने ने। यह क्रम तीन चार बार दुहराता गया और तब मेरे आश्चर्य का पारावार न रहा जब मुझे अहसास हुआ कि उनका पूरा का पूरा लिंग मेरी योनी के अंदर समा गया। आरंभ का वह अकथनीय दर्द धीरे धीरे कम होता जा रहा था और करीब दो मिनट बाद तो उस पीड़ा का स्थान अद्वितीय आनंद ने ले लिया। उफ्फ्फ वह अहसास। उनका लिंग मेरे गर्भ का द्वार खोल कर गर्भगृह में खलबली मचा रहा था। मेरी योनी से गर्भगृह तक का संकरा मार्ग उनके विकराल लिंग से बड़ी सख्ती से चिपक कर मुझे अखंड आनंद से सराबोर कर रहा था। बेसाख्ता मेरे मुह से आनंदमयी सिसकारियां निकलने लगीं, “आह ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स, मां, ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह,”।

“भैया, इस रंडी को अब मजा आ रहा है। देख कैसे सिसकारियां मार रही है साली कुतिया।” ज्ञानचंद बोला।

“मुझे पता है। इस हरामजादी की चूत देखकर ही मैं समझ गया था कि यह हमारा लौड़ा आराम से ले लेगी। हमारी तो किस्मत खुल गई रे ऐसी लौंडिया चोदने को मिली है। क्यों री छमिया, मजा आ रहा है ना? खूब नखरे कर रही थी।” रूपचंद जी की आवाज आई। अब वे चोदने की अपनी रफ्तार बढ़ा चुके थे। गचागच लगे चोदने।”हुम्म्म हुम्म्म हुम्म्म हुम्म्म आह ओह”

उत्तेजना और आनंद की पराकाष्ठा थी वह, जब मुझसे और बर्दाश्त नहीं हुआ। “आह्ह्ह्ह्ह मैं गई राजा” एक दीर्घ निश्वास के साथ मेरा पूरा शरीर थर्रा उठा और मैं उसी वक्त खल्लास होने लगी। मैंने ज्ञानचंद के मोटे शरीर को कस के जकड़ लिया और झड़ गई। ज्ञानचंद मुस्कुरा उठा और मेरे होंठों को फिर से अपने थूथन से चूमने लगा और मेरे उरोजों को जकड़े हुए दनादन चोदने में मशगूल हो गया। मेरे स्खलन का अहसास रूपचंद जी को भी हो गया था, वे गचागच मेरी योनी की कुटाई अपने मूसल से करते रहे। नतीजा यह हुआ कि मैं दुबारा उत्तेजित हो कर इस सम्मिलित अजीबोगरीब संभोग का आनंद लेने लगी। अंततः करीब पंद्रह मिनट बाद सर्वप्रथम ज्ञानचंद के लिंग से फचफचा कर गरमागरम वीर्य निकलना शुरू हुआ। बिना कोई मौका गंवाए उसने वीर्य उगलते अपने लिंग को मेरे मुह में ठूंस दिया। यह वही आनंदमय पल था जब मैं दुबारा स्खलित होने लगी और उस आनंद के आवेग में मैं ज्ञानचंद का पूरा नमकीन, कसैला व प्रोटीनयुक्त वीर्य अपनी हलक में उतारती चली गई। इधर ज्ञानचंद झड़ कर निवृत हुआ उधर मैं झड़ कर निढाल हुई। ज्ञानचंद ने ज्यों ही मुझे छोडा़, रूपचंद जी को पूरी आजादी मिल गई।

“चल मेरी रानी अब मैं दिखाता हूँ तुझे मेरे लंड का जलवा,” कहते हुए ज्ञानचंद जी अपनी पूरी शक्ति से मेरे ढीले पड़ते शरीर को अपनी मजबूत बाजुओं में दबोच कर धाड़ धाड़ चोदने लगे। इसका परिणाम वही हुआ, मेरे ढीले पड़ते शरीर में पुनः नवजीवन का संचार हो गया। अब मैं भी बेशर्मी में उतर आई और उनके मोटे कमर को अपनी लंबी टांगों से लपेट लिया और अपनी कमर उचका उचका कर खूब मस्ती से चुदवाने लगी। “आह्ह्ह्ह्ह राजा, ओह मेरे रूप, ओह्ह्ह्ह साले हरामी मादरचोद, चोद साले कुत्ते, चोद मुझे जी भर के, रंडी बना दे, कुत्ती बना दे, ओह्ह्ह्ह मार डाल राजा््जजा्आ्आ्आ्आह……” और न जाने क्या क्या बकती जा रही थी मैं पागलों की तरह।

ज्ञानचंद एक बार खलास हो कर वहां से हटा जरूर था, किंतु उसने ऋतेश को अपनी ओर बुलाया और कहा, “चल ऋतेश तू मेरा लौड़ा चूस। चूस चूस कर दुबारा खड़ा कर।” ऋतेश किसी आज्ञाकारी गुलाम की तरह अब ज्ञानचंद का लिंग चूसने लग गया। पता नहीं क्या इरादा था उसका। शायद इस बार ऋतेश के साथ ही गुदा मैथुन का आनंद लेना चाहता हो। खैर मुझे उससे क्या, मैं तो इस वक्त रूपचंद जी की भीषण चुदाई के आनंद में डूबी जा रही थी।

“आह आह बड़ी मस्त है रे तू हरामजादी। अह अह तेरे जैसी लौंडिया जिंदगी में पहली बार मिली है चोदने को। तुझे सच में हम दोनों भाई भूल नहीं पाएंगे। ओह्ह्ह्ह रानी तेरी चूत चोदने में स्वर्ग का सुख है। चल तुझे कुतिया ही बना लेता हूँ,” कहते हुए मुझे कुतिया की तरह ही पलट दिया और पीछे से मुझ पर सवार हो गया। उसके बाद उसने मेरी ज्ञान चंद के मोटे लंड से चुद चुद कर लाल और फूली हुई चूचियों को बेदर्दी के साथ मसलते हुए करीब और दस मिनट तक चोदता रहा। गजब की स्तंभन क्षमता थी उसकी। करीब आधा घंटा तक चोदने के बाद जाकर उनका झड़ना शुरू हुआ। “आह्ह्ह्ह्ह मेरी रानी ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स,” करीब एक मिनट तक झड़ते रहे।

पूरी शक्ति से मेरी चूचियों को दबोच रखा था कमीने ने, लेकिन उसी वक्त मैं भी तीसरी बार स्खलन के सुख में डूबी अपने होशोहवास में नहीं थी, “आह्ह्ह्ह्ह राज्ज्ज्ज्जा, मैं गयी््य््य््यय्ईई््ईई््ईई”। पूरा बच्चादानी भर दिया था शायद उस ठिंगने चुदक्कड़ ने। जब रूपचंद जी मुझे चोद कर बिस्तर पर ही लुढ़क गये तो मैं भी थक कर चूर पसीने से तरबतर वहीं लुढ़क गयी। उनका लिंग सिकुड़ कर छ: इंच का हो गया था। मेरी योनी से अभी भी उनका वीर्य रिस रिस कर बाहर निकल रहा था और बिस्तर गीला होता जा रहा था। रूपचंद जी किसी सूअर की तरह निढाल पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे और मैं चुद निचुड़ कर लस्त पस्त निर्जीव प्राणी की भांति पेट के बल ही पड़ी हुई थी। मेरी योनी का तो मानो भुर्ता ही बना डाला था कमीने ने। फूल कर कचौड़ी बन गई थी मेरी योनी। मीठा मीठा दर्द भर दिया था रूप चंद जी ने। मेरी चूचियों को इस बेदर्दी से शायद पहली बार नोच खसोट से गुजरना पड़ा था। लाल हो गयीं थीं दोनों चूचियां। शायद सूज भी गई थीं। पूरे शरीर को मानो तोड़ कर रख दिया हो, ऐसा महसूस हो रहा था।

तभी मैंने अर्द्धचेतन अवस्था में अपने चिकने नितंबों पर किसी के हाथों के स्पर्श को महसूस किया। मैं चौंक कर छिटकना चाहती थी, किंतु मेरा थका मांदा शरीर मेरे इरादे का साथ देने में पूरी तरह सक्षम नहीं था। मैं पलटना चाहती थी, लेकिन पूरी तरह पलट नहीं पाई। किसी तरह कमर से ऊपर के हिस्से और गर्दन को घुमा कर देखा तो पाया कि ज्ञान चंद दुबारा मुझ पर चढ़ाई करने को तत्पर था। जब तक मैं कुछ समझ पाती, ज्ञान चंद ने मेरी कमर को अपने मजबूत हाथों से कस कर पकड़ा और मेरे नितंबों के फांक में अपना थूथन भिड़ा दिया। कुछ पल मेरे नितंबों को चाटा फिर मेरे गुदा द्वार को पागलों की तरह चपाचप चाटने लगा।

“उफ्फ्फ, क्या करते हो, छि:, छोड़ो मुझे” मैं अलसाई सी बोली।

ज्ञानचंद अपना सर उठाया और बोला, “तेरी गोल गोल चिकनी गांड़ कब से मुझे ललचा रही है रानी। तेरी चूचियां बहुत मस्त थीं, चोदने में बड़ा मजा आया। तेरी गांड़ की खूबसूरती तो गजब ढा रही है। अब बताओ भला, ऐसी गांड़ को बिना चोदे कैसे छोड़ दें।” इतना कह कर दुबारा अपना मुह मेरी गांड़ के छेद पर भिड़ा दिया और पागलों की तरह चाटने लगा। बीच बीच में वह मेरी गांड़ की छेद में भी अपनी लंबी जीभ घुसा घुसा कर चाट रहा था। यह शुरू में बड़ा अटपटा लग रहा था किंतु कुछ ही समय बाद मैं खुद ही छटपटाने लगी। “ओह आह, हाय आह” ये थे मेरे मुह से निकलने वाले उद्गार। मेरे अंतरतम को तरंगित कर रहा था उसका यह घृणित मगर उत्तेजक कार्य। कुछ मिनटों में ही मैं मानो पगला गई थी। “ओह राजा, आह्ह्ह्ह्ह मां, आह डियर, अब चोद भी डालो ना,” मैं उत्तेजना के मारे मानो अपना होश खो बैठी थी। भूल ही गई थी कि उसका लिंग मेरी गुदा का क्या हाल करने वाला है। बस अब और क्या था, ज्ञान आनन फानन में मेरे ऊपर चढ़ गया। दोनों हाथों से मेरी गुदा का फांक खोला और अपना तनतनाया हुआ गधा का लिंग मेरी गुदा द्वार पर रख कर दबाव देने लगा।

उसके लिंग का विशाल सुपाड़ा मेरी गुदा के संकीर्ण मार्ग को फैला कर जैसे जैसे अंदर प्रविष्ट होता गया, “आह्ह्ह्ह्ह मरी रे मरी मैं, ओह्ह्ह्ह धीरे बाबा धीरे हाय फाड़ ही डालोगे क्या ओह मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” दर्द के मारे मैं चीखने लगी।

“चुप कर साली रंडी, अभी बोल रही थी चोद डालो, अभी कुतिया की तरह कांय कांय कर रही है। चुपचाप चोदने दे बुरचोदी। इतनी सुंदर गांड़ को बिना चोदे छोड़ दूं, ऐसा कैसे हो सकता है। ले ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, आह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म,” कहते कहते मेरी दर्दाई चूचियों को पीछे से कस के दबोच कर बेरहमी से घुसाता चला गया अपना गधे सरीखा लंड। “ओह कितना टाईट और गरम है रानी तेरी गांड़, उफ्फ्फ ऐसा लग रहा है मेरा लौड़ा किसी संकरी भट्ठी में घुस रहा हो, आह्ह्ह्ह्ह”, कहते कहते धीरे धीरे पूरा का पूरा लिंग मेरी गुदा में जड़ तक उतार दिया हरामी ने। दर्द से मेरा बुरा हाल हो रहा था। मेरी गुदा का हाल अब फटी तब फटी वाली हो रही थी। मैं छटपटाने से भी बेबस थी, इस बुरी तरह से उसने मुझे दबोच रखा था। पीछे हाथ लगाया तो एक बार तो मुझे भी यकीन नहीं हो रहा था। उसके लिंग का एक सेंटी मीटर भी बाहर नहीं था। मलद्वार में ऐसा लग रहा था मानो किसी ने खंजर से चीर दिया हो। अंदर ऐसा लग रहा था मानो उसके लिंग का अगला भाग मेरी अंतड़ियों को फाड़ ही डालेगा।

“निकाल मादरचोद अपना लंड, आह्ह्ह्ह्ह साले कुत्ते की औलाद,” पीड़ा की अधीकता से मैं चीख पड़ी। मैं सिर्फ चीख ही सकती थी, हिलने डुलने में मुझे असमर्थ कर दिया था उस ठिंगने पहलवान ने।

“चूऊ्ऊऊ््ऊऊप्प्प्प्प्प्प छिना्आ्आ्आ्आल, पूरा लौड़ा तो खा ही ली, अपनी गांड़ में, अब काहे चिल्लाती हो।” मेरी चूचियों को पूरी ताकत से भींचते हुए बेहद खौफनाक आवाज में ज्ञान चंद बोला। अब उसकी वहशियत खुल कर सामने आ चुकी थी। मेरा चीखना चिल्लाना बेमानी था। जो हो रहा था उसे रोक पाना मेरे वश में नहीं था। चुपचाप गांड़ चुदवाने में ही मेरी भलाई थी। अब उसने मेरी कमर के नीचे से मेरे पेट की तरफ हाथ डालकर एक झटके से उठा कर चौपाया बना दिया और सर्र से आधा लिंग बाहर निकाल कर पुनः सटाक से ठोंक दिया जड़ तक। अब यह क्रम चल निकला। सटासट मेरी गांड़ की संकरी गुफा को अपने मूसल से कूट कूट कर ढीला करने लगा। धीरे धीरे सच में मेरी गांड़ की संकरी गुफा ढीली होने लगी और यह फैल कर बड़ी गुफा में तब्दील हो गई। अब उसका विकराल लिंग अविश्वसनीय रूप से बड़ी सुगमता से मेरी गांड़ के अंदर बाहर हो रहा था। ओह उस घर्षण का आनंद, जो पहले पहल अत्यंत पीड़ा दायक था, अब अद्भुत सुख प्रदान कर रहा था।

“आह आह इस इस उफ ओह चोद राजा ओह चोदू, आह मेेेरे गांड़ के रसिया, आह मजा आ रहा है साले बहनचोद,…..” मैं मस्ती में भर गई थी। मेरी चूत में सुरसुरी होने लगी। मैं एक हाथ की उंगली से अपनी चूत रगड़ने लगी।मेरी हालत वहां उपस्थित सभी लोग बड़े मजे से देख रहे थे। अब तक रूपचंद जी का लिंग फिर से जागृत हो कर फनफना उठा था। वे भी पुनः कूद पड़े इस मैदाने जंग में। वे घुस गये मेरे नीचे से, मेरे हाथ को मेरी चूत से हटाया और अपने फनफनाते लंड को मेरी चूत मेंं टिका कर बिना किसी कष्ट के सटाक से एक ही बार में चूत के अंदर कर दिया। “आह मेरी जान, तेरी चूत स्वर्ग का द्वार है। ओह्ह्ह्ह जितनी बार भी चोदो, साला मन ही नहीं भरता। ले मेरा लौड़ा आह” कहते हुए भिड़ गये गपागप चोदने। मेरी चूचियों को बारी बारी से कभी चूसते कभी हाथों से दबाते और कभी मेरे निप्पल्स को दांतों से हल्के से काट लेते थे।

“उई मां, दर्द होता है, आह,” मैं चीख पड़ती। मगर उस वक्त मेरी सुनने वाला कौन था वहां। नीचे से रूप चंद जी ऊपर से ज्ञानचंद, दो ठिंगने राक्षस, लगे हुए थे मुझे भंभोड़ने, नोचने, चोदने। उनकी जालिमाना हरकतों से अब मुझे दर्द के साथ साथ जो मजा मिल रहा था वह अवर्णनीय था। दर्द मिश्रित आनंद, अद्वितीय आनंद, जिसमें मैं डूबती उतराती चुदती जा रही थी।

“आह्ह्ह्ह्ह मेरे चुदक्कड़ राजाओ, ओह्ह्ह्ह रूप, आह ज्ञान, हाय हाय रंडी बना दिया ओह मुझे जन्नत की सैर करा रहे हो उफ्फ्फ साले मां के लौड़ों…..” पागल कर दिया था उन दोनों ने। धमाधम उधम मचा दिया था दोनों कामुक भेड़ियों ने।

“साली कुतिया, मां की लौड़ी, अब आ रहा है ना मजा, चूत मरानी….” रूपचंद अपने पूरे वहशी बन चुके थे। चोदते हुए मेरे शरीर को पागलों की तरह नोचते खसोटते रहे।

“भाई, ये तो अब हमारे लंड की हो गयी दीवानी। उफ्फ्फ ऐसा माल फिर कहां मिलेगा। साली कितने मजे से चुदवा रही है। मैं तो इसकी गांड़ और चूचियों का दिवाना हो गया हूं, ओह्ह्ह्ह” ज्ञान चंद भी पागलों की तरह लगा हुआ था मुझे चोदने। मेरे अंदर ऐसा लग रहा था मानो भूचाल आ गया हो। करीब आधे घंटे तक इस बार उन दोनों ने जी भर कर मुझे भोगा। इस आधे घंटे में उन्होंने मिलकर मेरे शरीर का सारा कस बल निकाल दिया था। अविश्वसनीय रूप से इस दर्दनाक चुदाई में भी मैं ने भरपूर आनंद का उपभोग किया। इस दौरान मैं तीन बार झड़ कर बिल्कुल बेजान सी हो गई थी। एक एक करके उन दोनों ने भी अपने मदन रस से मेरी गुदा और योनी को सराबोर कर दिया। मेरे दोनों यौन छिद्रों का तो कचूमर ही निकाल दिया था कमीनों ने। हम तीनों थक कर निढाल उसी बिस्तर पर लस्त पस्त पसर गये थे। तीनों पसीने से तर बतर। कोई भी देखता तो उन्हें विश्वास नहीं होता कि मुझ जैसी कमनीय काया वाली खूबसूरत स्त्री इन बदसूरत ठिंगने सूअरों जैसे गोल मटोल पुरुषों के साथ इस तरह कामलीला कैसे कर सकती है। मगर मैं ही जानती हूं कि इनके साथ संभोग में मैं ने कितना आनंद उठाया था। मेरी चूचियों को इस बुरी तरह से नोचा था कि वे लाल हो गयीं थीं। सूज गयीं थीं। मेरी योनी का तो भोसड़ा ही बना डाला था। ज्ञान का लिंग जब मेरी गुदा से बाहर आ रहा था तो ऐसा लग रहा था मानो मेरी अंतड़ियाँ भी बाहर निकल पड़ेंगी। कुल मिलाकर कहूँ तो अपनी कामक्षुधा शांत करते करते मुझे पूरी तरह निचोड़ डाला था उन कमीने भाईयों ने। मैं भी कहां कम कमीनी थी। जीवन में पहली बार ऐसी चुदाई का सामना करना पड़ा था, यादगार चुदाई, यादगार लिंग, अविस्मरणीय दर्द मिश्रित आनंद का अनुभव।

“वाह रानी, मजा आ गया। कमाल की चुदक्कड़ हो।अब जब भी हमें चोदने का मन करेगा, हम रांची आ जाएंगे। बिजनेस तो होता ही रहेगा, मगर तुम्हारे साथ बिजनेस का मजा ही कुछ और है।” कहकर रूपचंद जी ने मुझे बांहों में भर के चूम लिया।

“सही कहा भाई, ऐसी लौंडिया बड़े नसीब वालों को ही नसीब होती है। अब तो हमें बार बार रांची आना पड़ेगा। कमाल की गांड़, कमाल की चूचियां। गजब हो तुम मेरी रानी।” ज्ञान चंद बोला और मेरे नितंबों और चूचियों को सहला दिया।

“हाय मेरे प्यारे चोदुओ, आज आपलोगों ने पहली बार चुदाई का ऐसा सुख दिया है जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगी। जब मर्जी चले आईएगा, मैं आप लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध रहुंगी।” कहकर मैंने बारी बारी से उन दोनों को चूम लिया। ऋतेश को तो मैं क्या कहूं, चलो उसके आकर्षण में बंधी इन दोनों चुदक्कड़ों के जाल में फंसी और यादगार संभोग का सुख प्राप्त किया, इसलिए उस हिजड़े को भी शुक्रिया अदा किया। फिर करीब ग्यारह बजे रात को मैं वहां से निकली अपने घर की ओर। ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मेरी चाल देख कर दोनों चुदक्कड़ मुस्कुरा रहे थे। मैं खिसियानी सी मुस्कान के साथ वहां से रुखसत हुई। दूसरे ही दिन सवेरे ऑफिस खुलते ही रूपचंद जी फिर आ धमके। मेरी हालत वैसे ही बेहद खराब हो चुकी थी। पूरा बदन टूट रहा था, लेकिन फिर भी बीती रात को जो कुछ हुआ था उसकी मीठी मीठी कसक पूरे बदन में तारी थी। रूपचंद जी वही पूर्व परिचित लार टपकाती नजरों से मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। मैं ने भी व्यवसायिक मुस्कुराहट के साथ उनका स्वागत किया। एक हफ्ते की बात तो छोड़िए, बॉस के आते ही उसी वक्त हमारा डील फाईनल हो गया। बॉस की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने मुझे बधाई दी और साथ ही एक सरप्राईज गिफ्ट, एक प्रोमोशन के रूप में। वाह, मेरी तो निकल पड़ी थी। हां, एक बात और, जाते जाते रूपचंद जी ने वापस लौटने से पहले मुझसे मिलने की इच्छा जताई उसी होटल में। हालांकि मैं पिछली रात की नोच खसोट और धींगा मुश्ती से मेरी हालत कोई अच्छी नहीं थी, किंतु उनका आमंत्रण अस्वीकार नहीं कर पाई। नतीजा वही, फिर पिछली रात की तरह कामुकता के एक और तूफानी दौर से मुझे गुजरना पड़ा। इस बार शुरू में ही उन्होंने मुझे व्हिस्की का एक पैग पिला दिया और जी भर के मनमाने ढंग से मेरे शरीर से खेला। चुदाई के एक दौर के पश्चात फिर दूसरा पैग पिलाया और बड़े ही गंदे तरीक़े से मेरे जिस्म को भोगा। मुझे नशे की हालत में उठा कर बाथरूम ले गए और जबतक मैं कुछ समझ पाती, बाथरूम के फर्श पर ही लिटा कर रूपचंद जी और ज्ञानचंद मेरे ऊपर छरछराकर मूतने लगे। उनके गरमागरम मूत्र से मैं पूरी तरह भीग गई थी। मैं विरोध करना चाह रही थी लेकिन पता नहीं क्यों मुझे भी यह सब अच्छा लग रहा था। यह भी काफी उत्तेजक था मेरे लिए। शायद नशा का भी असर रहा हो। मेरी उसी अवस्था में मूत्र से भीगे शरीर के साथ ही उन्होंने मनमाफिक ढंग से अपनी कुत्सित कामेच्छा शांत की। क्या नहीं किया उन्होंने। लंड चुसवाया, अंडकोश चटवाया, गांड़ चटवाया, लंड हाथ में थमा कर मूठ मरवाया, मेरी कांख में लंड डाल कर चोदा, जांघों को सटा कर जांघों के बीच चोदा, चूची चोदा, चूत की कुटाई की, गांड़ की कुटाई की, हर संभव तरीक़े से मेरे शरीर का भरपूर इस्तेमाल किया। करीब चार घंटे तक यह निहायत ही घिनौने तरीक़े का वासना का तांडव होता रहा। उफ पता नहीं क्या हो गया था मुझे भी। पागलों की तरह उनकी हर क्रिया में सहयोग करती गई। वे तो खुश हुए ही, मेेेरे जीवन में भी खुशी का एक नया मार्ग दिखा दिया उन हरामियों ने। नहा धोकर जब मैं वहां से निकलना चाह रही थी, मेरे कदम साथ देने से इन्कार करने लगे। मजबूरन मैं रात भर वहीं रुकी रही, रात भर चुदते रहने के लिए। गनीमत थी कि बीच बीच में ऋतेश भी अपनी गांड़ प्रस्तुत कर देता था। सवेरे तक मैं चलने फिरने लायक भी नहीं रही थी। किसी तरह मुझे सहारा दे कर उन्होंने घर तक अपनी गाड़ी में छोडा़ और टाटा निकल गए। दो दिन तक मेरी हालत खराब थी।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।