कामिनी की कामुक गाथा (भाग 57)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह संयोग से रश्मि हमारे हत्थे चढ़ी। वह बेचारी 31 वर्षीय, खूबसूरत बैंक मैनेजर, तलाकशुदा स्त्री, अपने वैनिटी बैग लेकर भागते एक उचक्के के पीछे भागती हुई मुझसे आ टकराई। मेरी मेहरबानी से उसका बैग उसे मिला और अहसान से दबी चाय के लिए मेरे आमंत्रण को ठुकरा न सकी। संयोग से वह रेखा की ननद निकली। उसकी खूबसूरती से आकर्षित हो कर मैंने उसे अपनी हवस का शिकार बनाने की ठान ली। चाय पीने के दौरान ही क्षितिज का भी आगमन हो गया। उसकी खूबसूरती के आकर्षण से वह भी अछूता न रहा। हम मां बेटे मिलकर रश्मि को फंसाने की योजना बना बैठे। पहले मैंने उसकी कामुक भावनाओं को भड़का कर उसकी नग्न देह का रसास्वादन किया, फिर पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार क्षितिज भी उसकी कमनीय देह पर सवारी गांठने में सफल हो गया। उस दौरान मैं हरिया से अपने शरीर की भूख मिटाती रही। इसी क्रम में रश्मि हम मां बेटे के बीच के अनैतिक रिश्ते से परिचित हो गयी। एक ही कमरे में रश्मि, क्षितिज, हरिया और मेरे बीच वासना का नंगा नाच होता रहा रश्मि खुश, क्षितिज खुश, हरिया और मैं खुश। हमारे बीच बातचीत के क्रम में रश्मि की जुबान से कोई राज की बात निकलते निकलते रह गयी थी, जिसे वह बाद में बताने के लिए मान गयी। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि हम मां बेटे के अनैतिक रिश्ते को मैंने अपने वाकचातुर्य से बड़ी सुंदरता के साथ उसके सामने सही ठहरा दिया था।

आपलोग पता नहीं मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे। दरअसल शुरुआत से मैं ऐसी नहीं थी। सोलह साल तक तो स्त्री पुरूष के बीच शारीरिक संबंधों से बिल्कुल अनजान थी। लेकिन सोलह साल की होते न होते उस कमसिन उम्र में एक बूढ़े की कामवासना की शिकार होकर मैं अपना कौमार्य गंवा बैठी। उस वक्त अवश्य मैं नादान थी। लेकिन उस नादान उम्र में उचित अनुचित की समझ न होते हुए संभोग सुख का जो अनुभव मुझे हुआ उससे मैं काफी प्रभावित थी। उसके उपरांत मेरे अपने बुजुर्गों ने मेरी नादानी का भरपूर लाभ उठाया और मेरे अंदर ऐसी कामाग्नि भर दी जिसके वशीभूत अपनी कामक्षुधा शांत करते करते कई मर्दों की अंकशायिनी बनती चली गयी। चूंकि आरंभ में मेरे शरीर से खिलवाड़ करके अपनी शारीरिक भूख मिटाने वाले मेरे अपने रिश्तेदार बुजुर्ग ही थे, अत: वासना की भूख मिटाने हेतु रिश्ते नातों की सारी वर्जनाएं उन्हीं शुरुआती दिनों से मेरे लिए महत्वहीन हो गयी थीं। दूसरी बात यह थी कि, चूंकि मेरे सेक्स जीवन के आरंभिक दौर में मेरा पाला सिर्फ बुजुर्गों से पड़ा था, इसलिए आजतक प्रौढ़ पुरुष ही मुझे अधिक पसंद आते हैं। कम उम्र युवाओं पर मैं आज भी बुजुर्गों को ही तरजीह देती हूं। हरिया और करीम, जो आज सत्तर साल से ऊपर के हो चुके हैं, आज भी मेरी देह के आकर्षण से बंधे यदा कदा मुझपर अपना मालिकाना हक जता दिया करते हैं। हां, यह और बात है कि इसके लिए मुझे उन पर बुढ़ापे का ताना मारते हुए उनकी मरदानगी को चुनौती देनी पड़ती है। उसके बाद मेरा ये लोग वह हाल करते हैं कि खुदा ही बचाए। मुझे बड़ा मजा आता है उनका यह सब करना। इनके अलावा भी बाहर के अधेड़ या बुजुर्ग मर्द जब मुझ पर लार टपकाती नजरें गड़ाते हैं, मेरी कामुकता धधक उठती है। कई मौकों पर मैं अवसर पा कर उनके सम्मुख बिछ जाने में गुरेज भी नहीं करती हूं, यह और बात है कि उन्हें लगता है कि उन्होंने मेरे साथ जबर्दस्ती कर ली है, जो कि मुझे बेहद पसंद है। शरीफजादी बनी रह कर बुजुर्गों द्वारा मेरा बलात्कार किया जाना।

दोपहर को खाना खाने के वक्त करीम भी आ चुका था। वह भी रश्मि को देख कर ठगा सा रह गया। बूढ़ा चुदक्कड़, कैसी भूखी नजरों से देख रहा था रश्मि को।

“यह करीम चाचा हैं, हमारे ड्राईवर साहब।” मैं ने मुस्कुराते हुए रश्मि को परिचय दिया।

“ओह, नमस्ते चाचाजी।” रश्मि तनिक सकुचाई।

“अरे ये घर के ही सदस्य हैं। हम सब के बीच कोई पर्दा नहीं है। शरमाओ मत।” मैं उसे आश्वस्त करती हुई बोली। रश्मि चकित थी, कैसा घर है यह, सब एक से एक नमूने, एक ही थैले के चट्टे बट्टे। रश्मि थोड़ी असहज हो उठी थी। मैं अपना हाथ रश्मि के हाथ पर रखकर नजरों से आश्वस्त करती रही।

फिर हम सबने साथ ही खाना खाया और उसके बाद हम बैठक में ही बैठे बातें कर रहे थे।

“हां, तो अब बताओ, उस समय तू क्या बताना चाह रही थी।” मैं रश्मि से पूछ बैठी।

“कैसे बताऊँ समझ नहीं आ रहा है?” झिझक रही थी अबतक, शायद करीम की उपस्थिति का असर था।

“तू बोल पागल। यहां कोई पराया नहीं है।”

“ओके, तो सुन, दरअसल सिन्हा जी मेरे बड़े भाई जरूर हैं लेकिन हमारा संबंध भी तुम मां बेटे जैसा ही है।” धमाका सा कर दिया उसने तो। अवाक् रह गये हम। इतना बोल कर अपनी नजरें नीचे झुका ली उसने।

“ओह्ह्ह्ह् तो यह बात है।” चुप्पी मैंने तोड़ी।

“हां, यह सच है।”

“तो इसमें शरम कैसी पगली। क्या गलत है? वे मर्द, तू औरत, हो गया, बस, होता ही रहता है ऐसा। मेरे क्षितिज को ही देख लो।” मैं उत्सुक हो उठी पूरी बात जानने के लिए, इसलिए उसे उत्साहित करती हुई बोली।

“तुम लोगों के बीच जो कुछ है, उसी को जानकर यह बात बता सकी मैं।” थोड़ी आश्वस्त हुई, मेरी प्रतिक्रिया सुन कर। हम सभी उत्सुक हो उठे पूरी बात सुनने के लिए। करीम और हरिया के कान भी खड़े हो गये।

“पागल कहीं की। पूरी बात बता, यह सब शुरू कैसे हुआ?” हमारी उत्सुकता का पारावार न था। उसने पहले हम सबके चेहरे को देखा और फिर बोलना शुरू किया, (उसने जो कुछ बताया उसे रोचक ढंग से पेश करने के लिए मैं भाषा और वार्तालाप को सजा कर पेश कर रही हूं) –

“यह आज से करीब पंद्रह साल पहले शुरु हुआ था। तब मैं सोलह साल की थी। मैं यौवन की देहरी पर कदम रख चुकी थी। सुंदरता मुझे अपनी मां से विरासत में मिला था। अपने पिता और परिवार के बड़ों से मैंने सुना था, मां बेहद खूबसूरत थी। मां तो हमारी बचपन में ही गुजर गयी थी, जब मैं सिर्फ तीन साल की थी। सिर्फ पिताजी और बड़े भाई अलोक थे। भाई की शादी हो चुकी थी। भाई यहां रांची में घर बना कर यहीं रहने लगे थे। मैं मैट्रिक की परीक्षा लिख कर भाई के यहां आई हुई थी। तीन बेडरुम वाले भाई के घर में मैं मैट्रिक की परीक्षा के परिणाम निकलने तक रुकने वाली थी। एक बेडरूम पर मेरा कब्जा हो गया था। भाभी स्वभाव से बहुत अच्छी थी। मेरे साथ उनका संबंध काफी आत्मीयता भरा था। वह मेरी हर बात का बहुत ख्याल रखती थी। यहां आए हुए मुझे करीब हफ्ता भर ही हुआ था। इस दौरान मुझे पता चल गया था कि भाई, मेरी भाभी की ओर ध्यान नहीं देते थे। भाभी मेरे भाई की बेरुखी को चुपचाप सहते हुए एक सुघड़ गृहिणी की तरह घर और अपने ऑफिस की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थी।

करीब हफ्ते भर यहां रहने के बाद एक दिन भाभी के घर से खबर आया कि उनके चाचा का देहावसान हो गया है, अतः खबर मिलते ही वह अपने ननिहाल जमशेदपुर चली गयी। उस रात खाना खाने के पश्चात करीब दस बजे मैं अपने कमरे में सोने चली गयी। बिना किसी दुश्चिंता और भय के मैं अपने कमरे का दरवाजा बंद किए बिना सोती थी।

उस रात मैंने बड़ा ही अजीब सपना देखा। सपने में एक खूबसूरत उपवन में मैं अकेली विचरण कर रही थी। वह उपवन मेरे लिए बिल्कुल अनजाना था किंतु वहां की मनमोहक सुंदरता में मैं खो सी गयी थी। हरी भरी पर्वत सृंखला से घिरा वह क्षेत्र, चारों ओर हरियाली, विभिन्न प्रकार के चित्ताकर्षक पुष्पों से लदी झाड़ियां और वृक्ष, जमीन पर हरे भरे नर्म घास कालीन की तरह बिछे हुए। अकस्मात ही मेरे सम्मुख एक निहायत ही खूबसूरत युवक प्रकट हुआ। मैं चौंक उठी। उस सुनसान स्थान में एक अजनबी युवक का इस तरह मेरे सम्मुख अकस्मात आगमन से मैं तनिक घबरा गयी थी। उसकी वेशभूषा प्राचीन काल के राजकुमारों की तरह थी। छ: फुटा सुगठित शरीर। कमर से नीचे खूबसूरत चमचमाती धोती और कमर से ऊपर का हिस्सा वस्त्र विहीन था। गले में सोने का मोटा हार, बांहों पर सोने के मोटे मोटे कड़े। सर के घने बाल कंधों तक लंबे थे। चौड़ा ललाट, गोरा रंग, भूरी आंखों में अनोखा सम्मोहन था।

“कौन हो देवी?” उसकी शहद घोलती आवाज से मेरा सम्मोहन भंग हुआ।

“जी मैं, जी मैं रश्मि, रश्मि सिन्हा।” घबराहट में मेरे मुख से निकला।

“आप यहां कैसे आयी हैं?”

“पता नहीं।”

“ओह, रास्ता भटक गयी हैं?”

“हां, शायद रास्ता भटक गयी हूं।”

“कोई बात नहीं देवी, हम आपको घर पहुंचाने की व्यवस्था कर देंगे।” उसकी आवाज में पता नहीं क्या जादू था, मैं लरजती जा रही थी। वह मेरे पास आया, और पास, और पास, उसकी आंखों के सम्मोहन में मैं खो सी गयी। “बहुत सुंदर हैं आप, अनिंद्य सुंदरी।” बिल्कुल पास आकर मेरी आंखों में देखता हुआ बोला। उसके रक्तिम होठों पर मुस्कुराहट थिरक रही थीं। चमकती, धवल, उज्ज्वल दंतपंक्तियां आकर्षण में चार चांद लगा रही थीं। उसके इतने पास आने से मैं लज्जा से गड़ी जा रही थी।

“ज ज ज जी?” घबराहट मेरी बढ़ती जा रही थी।

“मैंने कहा, बहुत सुंदर हैं आप।”

“ज ज जी आप भी।”

“क्या?”

“अअअआप भी तो।” लाल हो गयी थी मैं लाज से।

. “मैं भी क्या?” मुस्कुरा रहा था वह।

“आप भी तो ख ख ख खूबसूरत हैं।” हाय राम, यह क्या बोल गयी मैं। मेरा चेहरा सुर्ख हो उठा था।

“शरमाती हुई आप और भी खूबसूरत लग रही हैं।”

“हाय राम हटिए, आप भी….”

“आप भी क्या?”

“छेड़ रहे हैं मुझे।”

“लीजिए, इसे छेड़ना कहते हैं तो इसे क्या कहेंगे?” आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया उसने।

“छोड़िए।”

“क्या छोड़ूं?”

“हाथ मेरा।”

“लीजिए छोड़ दिया।” उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। मन तो कर रहा था पकड़ा रहे। तनिक मायूसी छायी नहीं मेरे चेहरे पर कि उसने मेरी कमर पकड़ कर अपने पास खींच लिया।

“हाय राम।” उसके चौड़े चकले सीने से चिपकी पिघल उठी मैं। “हाय दैया, छोड़िए बेशरम।” बोली मैं। जी तो चाह रहा था चिपटी रहूं मैं उससे।

“नहीं।”

“प्लीज।”

“नहीं छोड़ता जाईए।” ढिठाई से बोला वह।

“कोई देख लेगा।”

“देखने दीजिए, मेरा राज्य है।” उसकी पकड़ मेरी कमर पर और सख्त हो गयी। उसके शरीर से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, जिससे मैं मदहोश होती जा रही थी। आंखें बंद हो रही थीं। नशा सा छाता जा रहा था मुझ पर। मुझे बांहों में लिए दिए वहीं नर्म घास के कालीन पर लिटा दिया मुझे।

“यह यह ककक्या कर रहे हैं?”

“कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। बस थोड़ी सी कोशिश कर रहा हूं आपकी खूबसूरती से प्यार करने की।” मेरे थरथराते अधरों पर अपने रक्तिम अधरों का उष्मा से लबरेज चुंबन अंकित कर दिया उसने। उफ्फ्फ्फ, उस प्रथम चुंबन की उष्मा से पिघल उठी मैं। पुरुष संसर्ग तो दूर, पुरुष संपर्क तक से अनजान थी मैं तबतक। मेरा पूरा शरीर मानो मेरे वश में नहीं रह गया था, पूरी तरह उस युवक के वश में हो गया।

“ओ भगवान, आह यह आप क्या कर रहे हैं?”

“प्यार कर रहा हूं देवी, आप जैसी जीती जागती सुंदरता की प्रतिमूर्ति को।” मेरे होठों पर चूमकर, बोला वह। मेरे ललाट को चूमा वह।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” मेरी आंखों की पलकों को चूमा वह। मेरे गालों को चूमा। “ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊफ्फ्फ्फ्फ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह” आनंदभरी सिसकारी निकाल बैठी। मेरी गर्दन को चूमने लगा, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” सबकुछ बड़ा ही सुखद था।

“क्या हुआ?” मेरी सिसकियों को सुन कर बोला।

“आह कुछ न्न्न्नहीं्ईं्ईं्ईं।”

“कैसा अनुभव हो रहा है?” जादूगर पूछ रहा था।

“अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह् बहू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ।” धीरे धीरे मेरे उरोजों को सहलाने लगा, “ओह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” बिजली की तरंगें मेरे तन में दौड़ने लगीं। मेरे ब्लाऊज को धीरे धीरे खोलने लगा वह। “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ, कककक्या कर रहे हैं? आह।”

“आपके इस खूबसूरत, पूरे शरीर को प्यार करूंगा देवी।” वासना से ओतप्रोत स्वर में बोला वह। मेरे ब्लाऊज को खोल कर अलग कर दिया उसने। मैं अबतक ब्रा पहनना शुरू नहीं की थी। हालांकि मेरे उरोज काफी विकसित हो चुके थे। कमर से ऊपर अब मैं नग्न थी। मेरे उन्नत उरोज सख्त थे, अबतक अछूते, चिकने, गोल गोल। अपलक देखता रह गया वह मेरी चूचियों की खूबसूरती को।

“उफ्फ्फ्फ, खूबसूरती की मिसाल हो आप देवी, कंचुकी रहित आपके उन्नत, चिकने, बड़े बड़े रसभरे सेब की भांति आकर्षक उरोजों की खूबसूरती मेरी आंखों को भा गयी हैं।” मेरी चूचियों को चूमने लगा।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” तड़प उठी मैं उत्तेजना के मारे। सब कुछ प्रथम बार हो रहा था मेरे साथ, सारा अनुभव, सारा अहसास कितना सुखद था मेरे लिए। चाटने लगा मेरी चूचियों को , चूसने लगा मेरी छोटी छोटी चुचुकों को। “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ।” धीरे धीरे उसका हाथ मेरे सपाट पेट से होते हुए नीचे की ओर सरक रहा था, और नीचे, और नीचे, और नीचे। “आह, ओह्ह्ह्ह्,” चिहुँक उठी मैं, जब उसका हाथ मेरी जंघाओं की संधी पर रुका। उफ्फ्फ्फ, क्या जादू था उन हाथों में। चींटियां रेंगने लगीं मेरे पूरे तन में। सहला रहा था मेरी योनि के ठीक ऊपर। उफ्फ्फ्फ, मैं कुछ भी विरोध क्यों नहीं कर पा रही थी, ओह भगवान, कोई प्रतिरोध नहीं, सिर्फ समर्पण की मुद्रा थी मेरे चेहरे पर। उसने मेरे स्कर्ट को भी खोल दिया। उफ्फ्फ्फ ओफ्फोह, आआआआआह्ह्ह्ह्ह, अब सिर्फ पैंटी थी मेरी योनि के ऊपर आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। वह चूमता हुआ मेरे पेट से नीचे पहुंचा, उफ्फ्फ्फ, ठीक मेरी योनि के ऊपर जा ठहरा उसका मुह। ओह मां्मां्आ्आ्आ्आ, मैं जांघों को सटा क्यों नहीं रही थी, उसके उलट और खोल बैठी अपनी जांघों को। सब कुछ कितना उत्तेजक था। कहां मैं इन सबसे अनजान नादान बालिका और कहां वह इस खेल का माहिर खिलाड़ी, उसकी हरकतों से तो ऐसा ही आभास हो रहा था। शनैः शनैः उसने मेरी पैंटी की नीचे, और नीचे, और नीचे खिसकाना आरंभ किया, तबतक, जबतक मेरे पैरों से होती हुई मेरी पैंटी मेरे शरीर को त्याग कर उसके हाथ में मुझे मुह चिढ़ाने लगी। उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ। नंगी हो गयी मैं पूर्णतया नंगी। कपड़े की कोई चिंदी मेरे तन पर नहीं रह गयी थी। उस संध्या बेला में, सूर्य की लाल रक्तिम रोशनी में नहायी मेरी नग्न देह की छटा को देख चमत्कृत वह युवक एकटक निहारता ही रह गया। ओह मेरी मां, उत्तेजना और लाज के मिश्रित भाव सहित मैं थरथराती, कंपकंपाती, समर्पण की मुद्रा में पड़ी उसके अगले कदम की बेकली से इंतजार कर रही थी। क्या करेगा आगे? क्या करना चाहता है वह अब? मैं अनाड़ी नादान बाला, अवश पड़ी रही।

“सुंदर। अति सुंदर। कल्पना से परे सुंदरता की जीती जागती प्रतिमूर्ति हैं आप देवी, साक्षात रति की अवतार, परियों की रानी, अप्सरा सी।” कहते हुए अपनी धोती उतारने लगा। पल भर में वह भी पूर्णतया नग्न हो गया। धोती के अंदर कोई अंत:वस्त्र नहीं पहना था उसने। उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ बाबा, गजब, अद्भुत, अद्वितीय, दर्शनीय पुरुष तन का दर्शन हो रहा था मुझे। हृष्ट पुष्ट जंघाओं के मध्य भीमकाय लिंग अपने पूरे जलाल के साथ जुंबिशें दे रहा था। उफ्फ्फ्फ, यह मनमोहक दृश्य था मेरे लिए, तबतक, जबतक उस भीमकाय लिंग की क्रूरता से परिचित न हुई।

“लीजिए देवी, इस खिलौने से खेलिए।” अपने करीब आठ इंच लंबे और करीब चार इंच मोटे फनफनाते लिंग को मेरे हाथ में देते हुए बोला वह।

“खिलौना?” मेरे मुह से निकला।

“हां खिलौना। अबतक आपने निर्जीव गुड्डे गुड़ियों से खेला होगा। आज इस जीवित खिलौने से खेलिए।”

“यह तो आप पुरुषों के मूत्र विसर्जन का मार्ग है।”

“पगली, यह लिंग है। लोग इसे लंड या लौड़ा कहते हैं।”

“यह हमारे पास क्यों नहीं है?”

“क्योंकि आप स्त्री हैं। इसे योनि कहते हैं। लोग इसे चूत या बुर भी कहते हैं। इन्हीं का तो खेल है पगली। सृष्टि इन्हीं पर आधारित है। आनंदभरा खेल, जिसके द्वारा हम प्रजनन की क्रिया संपन्न करते हैं। आप खेलती रहिए इससे, मेरे लिंग से, लंड से लौड़े से” मेरी चमचमाती चिकनी, नयी नकोर, कमसिन योनि को सहलाते हुए बोला। मैं गनगना उठी। विक्षिप्तता की स्थिति में कसमसा रही थी।

“कैसे?” चमत्कृत सुनती रही, देखती रही।

“प्यार से सहलाईए इसे, दुलारिए इसे।” गरम था, बेहद गरम। सख्त था, कठोर, सूखे डंडे की तरह, चिकना, बेलनाकार। घबराहट में एक बार तो छोड़ बैठी मैं।

“डरिए मत, काटेगा नहीं।” दुबारा मेरे हाथ में थमा दिया उसने। इतना मोटा था कि मेरी हथेली में भी नहीं समा रहा था। अब भय तनिक कम हुआ। सहलाने लगी।

“आह आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, हां हां ऐसे ही आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। ऊपर से नीचे तक, हां हां्हां्आं्आं्आं, ऐस्स्स्स्स्स्आआआआ ही्ई्ई्ई्ई” अब मुझे भी अच्छा लग रहा था। इधर वह मेरी योनि को सहला रहा था। मैं सिहर उठी। “लीजिए, इसे चूमिए, चूसिए, चाटिए।” मेरे हाथों से छुड़ा कर मुह की ओर बढ़ा दिया। उफ्फ्फ्फ, निकट से देखकर भयभीत हो उठी। सामने का हिस्सा गुलाबी था, चिकना, तनिक नुकीला। एक संकीर्ण छिद्र उस गुलाबी अग्रभाग के केंद्र में दृष्टिगोचर हो रहा था। झिझकते हुए मैंने उसके लिंग को मुंह में लेने का प्रयास किया, किंतु उस विशाल गोले को मुख में समाहित करने की क्षमता मुझमें नहीं थी। अत: चूमने और चाटने से ही संतोष करना उचित जान पड़ा। वही करने लगी। सुगंधित लिंग, स्वादिष्ट लिंग, मुझे चाटना भा गया। दोनों हाथों से पकड़ कर बड़े प्यार से चाटने लगी मैं। इधर वह युवक मेरी योनि को चूम रहा था चाट रहा था, “वाह, आकर्षक, अद्भुत, अद्वितीय, स्वादिष्ट,” बीच बीच में मेरी योनि के संकीर्ण छिद्र में अपनी जिह्वा प्रविष्ट भी करा रहा था।

“हाय हाय आह आह ओह ओह मां मां उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ” पागल होती जा रही थी मैं। अब आगे? आगे क्या? क्या करने वाला था वह? उत्तेजना की पराकाष्ठा थी, जिज्ञासा भी।

तभी उत्तेजना के आवेग में वह बोला, “बस बस, अब मेरे लिंग को आपकी योनि में समाहित करने का यही स्वर्णिम अवसर है। आईए अब अपनी योनि में मेरे लिंग को ग्रहण करने हेतु तैयार हो जाईए।”

“ओह नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, ऐसा कैसे?” घबरा गयी मैं।

“ऐसा ही होता है देवी।”

“लेकिन आपका लिंग इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ और मेरी योनि इतनी छोटी। फट जाएगी। न बाबा ना।” डर से मेरा बुरा हाल था।

“नहीं फटेगी। भगवान ने इसे इतना लचीला बनाया है कि पूरा का पूरा लिंग समा लेने में सक्षम है यह।” अब बेकरारी उसकी झलक रही थी।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं,”

“हां्हां्आं्आं्आं,” अब वह तनिक जोर जबर्दस्ती पर उतारू था। मेरे पैरों को जबर्दस्ती फैला कर मेरी लसलसी योनि के द्वार पर अपने भीमकाय लिंग के अग्रभाग को स्थापित कर दिया।

“उफ्फ्फ्फ नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, यह असंभव है।” भयमिश्रित स्वर में घिघियाते हुए बोली।

“सब संभव है। हिम्मत और धैर्य रखिए, यही इस आनंददायक खेल की परिणति है, यहींं आकर खेल के सबसे आनंददायक भाग में हम प्रवेश करते हैं। यह वह रतिक्रिया है, जिसके लिए स्त्री पुरूष की संरचना हुई है। इसके बिना हम मानव अधूरे हैं। लीजिए स्वीकार कीजिए मेरे भूखे लिंग को अपनी प्यासी योनि में” हिम्मत बढ़ाते हुए मेरी चूतड़ों के नीचे हाथ डालकर, “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्” अपनी कमर को जुम्बिश दे बैठा। किसी धारदार खंजर जैसे चीरता उसका विशालकाय लंड मेरी कुवांरी चूत को ककड़ी की तरह फाड़ बैठा और एक तिहाई हिस्सा अंदर पैबस्त हो गया।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र डाला ््आआ््आआ रे्ए्ए्ए्ए्ए बप्प्आ्आ्आ्आह्ह्ह्।” दर्दनाक चीख उबल पड़ी मेरे मुख से, किसी हलाल होती बकरी की तरह और इसी के साथ मेरी निद्रा भंग हुई और साथ ही सपना भी। लेकिन, लेकिन यह क्या, वह अकथनीय पीड़ा अब भी थी, मेरी चूत में अब भी पैबस्त था वह विशालकाय लंड। नींद मेरी आंखों से काफूर हो चुका था। कौन था मुझ पर सवार? कौन? कौन? भयाक्रांत हो उठी मैं। किसी भीमकाय शरीर के नीचे दबी हिलने डुलने में असमर्थ, बेबसी और पीड़ा के कारण मेरी आंखों से अश्रु की धार बह निकली। कमरे की मद्दिम रोशनी में भी मैं पहचान गयी, “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ, दादा आ्आ्आ्आप?” आश्चर्य से मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

“चुप, बिल्कुल चुप। चिल्ला मत। चुपचाप चोदने दे।” गुर्राहट निकली उनके मुख से और साथ ही मेरे नथुनों से टकराया शराब की दुर्गंध का तीखा भभका। इसी के साथ एक और जुंबिश दे बैठे अपनी कमर को मेरे जल्लाद भाई ने। कचकचा कर मेरी चूत को फाड़ता हुआ दो तिहाई लंड गाड़ दिया मेरे अंदर। इसी के साथ मेरी चूत के कौमार्य की झिल्ली क्षत विक्षत हो गयी। रक्त की धार बह निकली मेरी चूत की संकरी गुफा से।

“उफ्फ्फ्फ मां्मां्आ्आ्आ्आ, मर गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई, मर गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई बाबा रेए्ए्ए, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई, मेरी चूत फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई। ना दादा ना” दर्द से तड़प उठी मैं, कराह उठी।

“हां रानी हां।”

“मर जाऊंगी दादा।”

“मरने नहीं दूंगा रानी, मजा दूंगा, मजा लूंगा।”

“ओ दादा छोड़ो ना।”

“अभी छोड़ने में अच्छा लगेगा क्या? इतना भीतर घुस गया है, थोड़ा धीरज रख पगली, मजा तो ले ले।”

“मजा? यह कैसा मजा? दर्द से मरी जा रही हूं दादा”

“शुरू में ऐसा ही थोड़ा दर्द होता है पागल।”

“थोड़ा दर्द? यहां मेरी जान निकली जा रही है। आह आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” छटपटा भी तो नहीं पा रही थी। मेरी कमजोर आवाज में विरोध अब भी था।

“तू ऐसे नहीं मानेगी बुरचोदी, ले, पूरा का पूरा लौड़ा ले हरामजादी, हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्य।” किसी जल्लाद की तरह पूरी ताकत से झटका मारा और रोकते हुए भी मेरी दर्दनाक चीख से पूरा कमरा गूंज उठा। उनका पूरा लंड मेरी चूत में समा गया था।

“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

“चीख मां की लौड़ी। चिल्ला साली चूतमरानी।” क्रूरता की हदें पार करता हुआ गुर्रा उठा मेरा भाई। उसकी गुर्राहट से मेरी घिग्घी बंध गयी। मेरी आवाज सुनने वाला भला वहां और कौन था। कहां वे हट्ठे कट्ठे सांढ़ और कहां मैं कमसिन बछिया। बेबसी पर रोने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती थी। छटपटाने की कोशिश में मैंं खुद को और पीड़ा पहुंचा रही थी, अतः शांत रह कर चुदते रहने में ही मैंने अपनी भलाई समझ ली। कुछ पल उसी स्थिति में पूरा लंड डाले वे स्थिर रहे और धीरे धीरे रक्त रंजित लंड को मेरी चूत से बाहर निकालने लगे। मुझे लगा अब थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन लंड का एक चौथाई हिस्सा अंदर रखे रखे उन्होंने एक और करारा धक्का मारा। “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्फ्फ्फ्फ।”

“उफ्फ्फ्फ ओफ्फोह, मार ही डा्आ्आ्आलिएग्ग्ग्गा क्या्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।”

“मरने थोड़ी न दूंगा साली मां की चूत, चोदूंगा, मजे से चोदूंगा, हो गया अब, मजा ले मेरी प्यारी बहना और मुझे भी मजा दे।” अब वे धीरे धीरे धक्के लगाने लगे। हर धक्के पर मेरी सांस ऊपर नीचे हो रही थी। मेरी चूतड़ के नीचे से उन्होंने अपना हाथ हटा कर अब मेरी चूचियों को पकड़ लिया। बेदर्दी से दबाने लगे मेरी चूचियों को।

“उई्ई्ई्ई्ई्ई उई्ई्ई्ई्ई्ई मां्मां्आ्आ्आ्आ।” उनकी वहशियत बढ़ती जा रही थी। नशे में तो थे ही, शायद उन्हें पता ही नहीं चल रहा था कि किस तरह मेरी दु्र्दशा कर रहे थे। मुझे खुशी देने का खोखला आश्वासन देकर सिर्फ अपनी हवस की पूर्ति ही उनका एकमात्र लक्ष्य था। इतने पर ही नहीं रुके वे। अपने मुह से मेरी चूचियों को चूसने और दांतों से काटने लगे। “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह।” मैं चीखती रही चिल्लाती रही और वे मुझे नोचते रहे खसोटते रहे चोदते रहे। अब उनके चोदने की रफ्तार पहले से दुगुनी हो गयी थी। दनादन, धकाधक, भकाभक, भचाभच, मशीनी अंदाज में, यंत्र चालित जानवर की तरह चोदना जारी रहा, भंभोड़ना जारी रहा। उफ्फ्फ्फ वे लम्हें, प्रथमत: प्राणांतक पीड़ा को झेलती हुई चुदती रही, नुचती रही। शनैः शनैः वह पीड़ा कम होती गयी, गायब होती गयी और अंततः इस तरह गायब हुई मानो बरसों से चुदती आ रही हूं। अब जा कर मुझे राहत मिली, राहत ही नहीं, अब तो आनंद की अनुभूति होने लगी। मेरी चूत की संकीर्ण गुफा की अंदरूनी दीवारों में दादा के मोटे रक्तरंजित लंड के सर्र सर्र आवागमन से उत्पन्न घर्षण से मेरे शरीर में अदभुत रोमांचक, आनंदभरी विद्युत तरंगें बहने लगीं।

“उफ्फ्फ्फ दादा, ओह्ह्ह्ह्ह दादा, दारून, ओ््ओओह्ह्ह्ह्ह दादा केमोन भालो (कितना अच्छा) आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ गो, चोद दादा चोद, खूब आनोंदो (बहुत आनंद)।” मैं आनंदमग्न क्या बोल रही थी पता ही नहीं था।

“लागलो, एखोन लागछे भालो (लगा, अब अच्छा लग रहा है) साली हरामजादी। एई जोन्यो एतो ड्रामा (इसी के लिए इतना नाटक), साली बुरचोदी।”

“ओ दादा, ओह ओह्ह्ह्ह् रे आमार (मेरे) चोदू राजा।”

“हां रानी, ऐखोन देख आमी की रोकोम आनोंदो दीच्छी (अभी देखो मैं कैसे आनंद देता हूँ)।” कहकर मुझे हवा में उठा लिया और मैं उनकी गोद में थी। उनका दोनों हाथ मेरी चूतड़ के नीचे था। मैं खुशी खुशी, आनंद में डूबी, अपने दोनों पैरों से उनकी कमर को लपेटे, उनके लंड को अपनी चूत में समाये मगन, नीचे से भाई के धक्के झेलती हवा में हिचकोले खा रही थी। उफ्फ्फ्फ यही था वह स्वर्गीय आनंद? यही था वह सुखद अनुभव, जिसके बारे में स्वप्न वाले राजकुमार ने बताया था? मैं अपने दोनों हाथों का हार उनके गले में डाल कर आनंद के सागर में डूब गयी, हिचकोले खाती रही, चुदती रही।

“ओह्ह्ह्ह् राजा, आमार चोदू राजा, आमार चूतेर पेलू दादा, ओह्ह्ह्ह् रेएएएएएए ओह्ह्ह्ह्।” करीब तीस चालीस मिनट की घमासान चुदाई के पश्चात उन्होंने मुझे कस कर जकड़ लिया और अपने मदन रस से मेरी चूत को सराबोर कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह््ह््ह््हह्हह, ओओ्ओओ््ओओ््हह्ह्ह्ह, र्र्र्र्आ्आ्न्नी्ई्ई्ई्ई्ई स्स्स्स्स्स्आ्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई कुत्त्त्ती्ई्ई्ई्ई, तेरी्ई्ई्ई्ई चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मस्त चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह टाईट चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत।” ऐसा लगा मानो मेरी पसलियों का चूरमा बना डाला हो।

“ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्,” तभी मैं भी, “ओह्ह्ह्ह्,” मैं भी थर्रा उठी, आह वह मेरी जिंदगी का प्रथम स्खलन, “ओह दादा ओह्ह्ह्ह् रज्जाआ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” जन्नत का सुख, अनिर्वचनीय, शब्दों में बयां करना असंभव था। खुशी और तृप्ति के मारे मैं अपने भाई से चिपट गयी, बेहताशा चूमने लगी भाई के चेहरे को और मेरा शराबी, हरामी चोदू भाई, बलात्कारी भाई मुझे चोद कर निहाल हुआ जा रहा था।

“वाह, इतनी अच्छी टाईट चूत चोदना आज नसीब हुआ। उफ्फ्फ्फ, बड़ा मजा आया रे मेरी रानी, मेरी बुरचोदी बहना। हरामजादी, इसी के लिए इतना हल्ला गुल्ला मचा रही थी कुत्त्त्ती्ई्ई्ई्ई।” गदगद हो कर दनादन चूमते हुए बोला। उस प्रथम चुदाई में मैंने जो खुशी प्राप्त की, दीवानी हो गयी भाई की। मेरे भाई ने उस रात मेरी देह से जो संतुष्टि और खुशी प्राप्त की, आसक्त हो उठे मुझ पर। उस रात हमने तीन बार वासना का नंगा खेल खेला, रात भर, खुल कर, भाई बहन के पवित्र रिश्ते को शर्मसार करते हुए। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। तीन दिन बाद मेरी भाभी घर वापस आई, लेकिन तब तक भाई ने मुझे चुदाई में पूरी माहिर बना दिया था। उस सोलह साल की नादान उम्र में ही मेरे हवस के पुजारी चुदक्कड़ भाई नें ऐसा जलवा दिखाया कि मैं उनकी दिवानी बन बैठी।

एक दिन मैंने चुदते हुए भाई से पूछ लिया, “भाई?”

“हां बोल”

“भाभी के रहते आपको मुझे चोदना कैसे सूझा?”

“चुप हरामजादी।”

“क्यों चुप रहूं मैं दादा?”

“उस काली कुतिया की बात मत कर, घिन आती है।”

“काली है तो क्या हुआ, खूबसूरत तो है।”

“मैंने कहा ना उसकी बात करके मूड खराब मत कर।”

“इसमें मूड खराब करने वाली क्या बात है?”

“हट हरामजादी,” एक धक्का दिया मुझे और मुझे छोड़ कर उठ गये। मैं नंगी, उत्तेजना की आग में तपती, दौड़ कर उनसे लिपट गयी और बोली, “सॉरी दादा, गलती हो गयी। अब नहीं बोलूंगी भाभी के बारे में। मुझे इस तरह बीच चुदाई में छोड़कर मत जाईए।”

“फिर न बोलना।”

“ना दादा ना।”

“गुड गर्ल,” जहां मुझे छोड़ा था वहीं से फिर चोदने लगे मुझे। उस दिन के बाद फिर हमारे बीच कभी भाभी का जिक्र नहीं हुआ। यह थी मेरी चुदाई यात्रा की शुरुआत, जिसका उद्घाटन मेरे अपने भाई के हाथों हुआ।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।