कामिनी की कामुक गाथा (भाग 71)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह अपने नये भवन के निर्माण स्थल के गोदाम में, निर्माण कार्य में लगे मिस्त्रियों की हवस के आगे खुद को समर्पित कर बैठी। उन गंदे हवस के पुजारियों नें सम्मिलित रूप से बड़े ही गंदे तरीके से मेरे जिस्म को नोच खसोट कर अपनी वासना की आग को बुझाया। मैं कमीनी अपनी आदत के मुताबिक़, आरंभ में नखरे दिखाती रही, फिर वही हुआ, मेरी वासना की भूख नें उन कामुक भेड़ियों के सम्मुख खुद को परोसने को मजबूर कर दिया। अपने कामुक जिस्म की कमीनी भूख के वशीभूत बेशरमी से लुटाती रही अपने जिस्म को और खुल कर मजे लेती रही। वे खुश, तृप्त, मैं तृप्त। इस रोमांचक खेल के पश्चात बातों ही बातों में मैं जान गयी कि सभी कामगर एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। मेरे प्रति उन तीनों के मनोभाव के साथ ही साथ अन्य कामगरों के मनोभावों से अवगत हुई। वे आजतक मुझे किस दृष्टि से देखते थे, उनके मन में क्या चल रहा था, इससे अवगत हुई। सोच कर ही रोमांचित हो उठी कि मेरी कमनीय देह को देखकर उनके मन में यह सब चल रहा है। अब उनका यह नया प्रस्ताव, कि कल रविवार को छुट्टी के दिन सभी आएंगे, काम करने, “मेरा काम” करने। सर्वप्रथम मैं हिचकी, असमंजस में पड़ी कि उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार करके कहीं मैं खुद को सस्ती तो नहीं बना बैठूंगी। निश्चित तौर पर मैं बेहद सस्ती किस्म की औरतों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगी, यह मैं जानती थी। लेकिन एक नये रोमांचक अनुभव से गुजर कर अपनी कामाग्नि शांत करने का जोखिम भरा निर्णय मुझे लेना था। जोखिम तो था, किंतु इस नये रोमांच भरे कुकृत्य में आनंद प्राप्त करने की लुभावनी कल्पना के सम्मुख मैंने हथियार डाल दिया। मेरी सहमति सुनकर उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। आनन फानन सारी बातें तय हो गयीं। उस दिन मेरी देह का भोग लगा कर दूसरे दिन भी मेरी मदमस्त देह का भोग लगाने की कल्पना में डूबे, मुदित मन तीनों वहां से रुखसत हुए।

मैं जानती थी कि हरिया, करीम और रामलाल को दूसरे दिन कैसे घर से बाहर रखा जाए। उन तीनों के जाने के पश्चात जब मैंने घर के अंदर कदम रखा, संध्या का साढ़े छ: बज रहा था। अबतक रामलाल वापस नहीं आया था। उसे लेकर करीम कहीं बाहर गया हुआ था। हरिया अकेले घर में था। हालांकि मैं बाहर नल में खुद को धो धा कर साफ सुथरी कर चुकी थी फिर भी जब मैं अपने कमरे में गयी और पुनः निर्वस्त्र होकर आदमकद दर्पण में खुद को देखकर लज्जित हो उठी। बिखरे बाल, शरीर के कई हिस्सों पर सीमेंट के दाग, खासकर मेरी चूतड़ पर, मेरी गर्दन पर और बालों पर भी कई जगह। मेरे उरोज लाल हो चुके थे, कई जगह तो दांतों के लाल लाल निशान उभर आए थे। दो दो लिंगों से कूट कूट कर मेरी योनि को मालपूए की तरह फुला कर रख दिया था कमीनों नें। कुत्तों से चुदी कुतिया की तरह उभर आई थी मेरी योनि। कुल मिला कर रंडी की तरह हालत कर दी थी मेरी, उन तीनों नें मिल कर। खैर, आज तो जो हुआ सो हुआ, मगर कल का क्या? अब कल के बारे में सोचना था। आज तो सिर्फ तीन लोग थे, कल पता नहीं कितने लोग होंगे? क्या क्या होगा? सब कुछ मेरे नियंत्रण में होगा या मेरे नियंत्रण से बाहर होगा? और किस तरह उन लोगों को निपटाऊंगी? खैर जो होगा देखा जाएगा, ऊखल में सर दिया है तो मूसल से क्या डरना। मुझे खुद पर पूरा विश्वास था। मैं यही सब सोचती हुई बाथरूम में घुसी और रगड़ रगड़ कर खुद को अच्छी तरह से साफ किया। जैसे ही मैं फ्रेश हो कर अपने कमरे से बाहर निकली, रामलाल भी करीम के साथ वापस आ गया। बहुत खुश नजर आ रहे थे दोनों।

“बहुत खुश लग रहे हैं आपलोग, क्या बात है?” मैं पूछ बैठी।

“हमलोग रबिया के यहां गये थे।” करीम मुस्कुराते हुए बोला।

“ओह, तो ये बात है? तभी इतने खुश हो। मां बेटी को कूट कर आ रहे हो?”

“हां।”

“दोनों?”

“हां।”

“वाह, और सरोज को?” मैं नें यूं ही पूछ लिया।

“छोड़ दिया उसको। रबिया और शहला ही काफी थी हमलोगों के लिए।” करीम बोला।

“सरोज को पता लगेगा तो?”

“तो क्या?”

“उसको बुरा नहीं लगेगा?”

“बुरा क्यों लगेगा? वैसे भी कल फिर हम जा रहे हैं। उससे भी मिल लेंगे।” वह बोला और मैं सोचने लगी, लो, मैं झूठ मूठ का परेशान हो रही थी कि इनको कल कैसे घर से बाहर रखूंगी।

“वाह रे बुढ़ऊ, कल फिर? आपने तो आज रबिया को ही निपटाया होगा?”

“नहीं नहीं, रबिया तो रामलाल से ही उलझी हुई थी। शहला मुझ पर मरी जा रही थी।”

“वाह, उस लौंडिया को बुढ़ऊ पसंद है? आप तो बड़े खुशकिस्मत निकले। उस लौंडिया को बुड्ढा पसंद आया, वाह, आपकी तो निकल पड़ी।” मैं बोली।

“बार बार बुड्ढा बोल कर मेरी बेईज्जती न कर। अभिए पटक के चोद दूंगा हरामजादी।” ताव में आ गया करीम।

“ज्यादा ताव खाने की जरूरत नहीं है। मैं तो यूं ही मजाक कर रही थी।” मैं मुस्कुरा कर बोली।

“कल भी जाएंगे। कल शहला की भी छुट्टी है ना।दिनभर का प्रोग्राम है।” करीम बोला।

“मैं भी जाऊंगा कल इनके साथ। कल सरोज को भी नहीं छोड़ेंगे।” हमारी बातों के बीच हरिया भी कूद पड़ा। वह भी वहां पहुंच कर हमारी बातें सुन रहा था। वाह रे ऊपर वाले, कैसी कैसी योजना बना लेते हो तुम? कहाँ तो मैं इन सबको कल घर से बाहर रखने के लिए जुगत सोच रही थी और कहाँ ऊपरवाले नें इसकी व्यवस्था खुद ब खुद कर दी।

अंदर की खुशी को किसी प्रकार छुपाती हुई प्रत्यक्षतः बोली, “हरामियों, छुट्टी के दिन तुमलोगों की मस्ती चढ़ रही है? कहीं नहीं जा रहे हो तुमलोग।”

“हम तो जाएंगे जरूर।” अब हरिया बोला।

“ठीक है, जाओ तुम सब भाड़ में, मरो सालो।” मैं रोष से बोली।

“हाय हाय, गुस्सा हो गयी हमारी छम्मकछल्लो मैडम?” रामलाल जो अबतक चुप था, मुझ से लिपट कर बोला।

“चलिए हटिए, बड़े आए हैं लल्लो चप्पो करने। छोड़िए मुझे” मैं नाराज होने का ड्रामा करती हुई छिटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी।

“नहीं छोड़ता जा। क्या कर लोगी आप?” मुझे कस के दबोच कर चूमते हुए बोला वह। अब मैं उसकी बांहों में कसमसाती पिघलने लगी थी। फिर से उफान मारने लगीं मेरे अंदर की वासना की तरंगें।

“ओह, पागल, छोड़िए मुझे, उफ।” मैंने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर की उफान मारती वासना की तरंगों पर नियंत्रण पाया और पूरी शक्ति लगा कर खुद को उसके चंगुल से मुक्त किया और कहा, “बड़े कमीने हो तुमलोग। अभी मुझे छोड़कर रबिया और शहला को नोचने गये थे, जी नहीं भरा जो अब मेरे पीछे पड़ गये हरामियों।”

“अरे मैडम जी, तुम तो देती ही बड़ी मुश्किल से हो, तो जाएं कहां? चले गये जहां हमें मिलने की गुंजाइश थी। अब इसमें हम क्या करें?” बड़ी मासूमियत से रामलाल बोला।

“तो वहीं रह जाते, सरोज को भी ठोक आते।” मैं तनिक रुष्ट दिखा रही थी अपने को।

“अच्छा छोड़िए गुस्सा। तरसाती भी हो और गुस्सा भी करती हो। चलिए अभी तुम्हारा गुस्सा शांत कर देता हूं। देखिए खड़ा हो गया मेरा।” अपने पैंट के अग्रभाग की ओर इंगित करते हुए बोला रामलाल।

“खाली तुम्हारा? मादरचोद, हमारा भी खड़ा हो गया।” हरिया बोला।

“तो मैं क्या करूं?” मैं कलप कर बोली।

“करना क्या है रानी बिटिया, बस, दे दे चोदने।” साला बेटीचोद ठरकी बुढ़ऊ हरिया बोला। “ये दोनों मुझे यहां अकेले छोड़कर गये और चोद आए मां बेटी को। यहां साला मेरा लंड इतनी देर से इनकी बकवास सुन सुन कर उठक बैठक कर रहा है।” मेरे पैर ठिठक गये उसकी बात सुनकर। उस चुदक्कड़ बुड्ढे बाप पर तरस आ गया मुझे।

“और अभी रात का खाना क्या तेरा बाप बनाएगा बेटीचोद?” मैं मुड़ कर वापस आई और हरिया से लिपट कर बोली।

“पहले अपनी चूत खिला दे मां की लौड़ी, खाना तो दो मिनट में बन जाएगा। मुंह से बाद में खा लेना, पहले चूत से मेरा लौड़ा तो खा मेरी रानी बिटिया।” खुशी से मुझे अपनी बांहों में समेट कर चूमते हुए बोला। इसी तरह कभी कभी मैं अपने तन को उन बुड्ढों के आगे बिछा देती थी, आखिर मेरी कमसिन उम्र में ही औरत बनाने वाले यही लोग तो थे। मेरे दादाजी, बड़े दादाजी तथा नानाजी के साथ मेरी उतनी कम उम्र में, अल्पविकसित कली से फूल बनाने वाले, एक नादान बाला से औरत बनाने वाले, सम्मिलित रूप से साझा भोग्या बना कर मेरे तन में कामुकता की आग जगा कर उसी अल्पव्यस्क उम्र में संभोग सुख प्रदान करन वालों में से ले दे कर यही दो तो बचे थे। हरिया और करीम। दादाजी, बड़े दादाजी और नानाजी तो कब के काल कवलित हो चुके थे। अपनी जवानी इन लोगों के हवाले करके मैं कितनी निर्द्वन्द्, निश्चिंत अपने कैरियर संवारती गयी और आज इस मुकाम पर पहुंची हूं। अपनी कमसिन देह लुटाने का तनिक भी मलाल नहीं था, बल्कि खुश थी, बेहद खुश थी, बेहद संतुष्ट तथा आभारी थी उनकी। आभार स्वरूप मैं अपना तन उन्हें सौंपती थी, हालांकि मुझे घर से बाहर मर्दों की कमी कहाँ थी। फिर भी चल रहा था सब कुछ निहायत आत्मीयता तथा भावनात्मक जुड़ाव सहित।

“तो? अभिए?” मैं हरिया से लिपटी बोली।

“हां, अभिए।” वह बूढ़ा बड़ी जल्दी बाजी में खड़े खड़े मेरी देह को निर्वस्त्र करने लगा। छिलके की तरह मेरी देह का आवरण हटता गया और वहां उपस्थित तीनों मर्दों की आंखों में वही पुरानी जानी पहचानी हवस भरी चमक नृत्य करने लगी। अंतिम आवरण, ब्रा और पैंटी के हटने की देर थी, टूट पड़े मुझ पर गिद्धों की तरह। कोई चूम रहा था, कोई मेरी चूचियां और नितंब दबा रहा था और कोई सीधे मेरी योनि पर अपनी उंगलियों के जादुई स्पर्श से मेरी कामुकता की ज्वाला धधका रहा था। उफ उफ, कुछ देर पहले की उन मिस्त्रियों के नोच खसोट से हलकान मेरे शरीर में मानों नवजीवन का संचार हो गया। पगला गयी मैं।

“ओह राजा, उई मां, आह आह, अब बस ओह बहुत हो गया आह सालों चुदक्कड़ों, आह ओह, अब चोद भी डालो आह।” मेरी धौंकनी की तरह चलती सांसों के साथ मैं बोली।

“हां हां रे हमारी बिटिया रानी, बस अब तैयार हो जा।” हरिया नें समय गंवाने की जहमत नहीं उठाई। अपने पैजामे के नाड़े को खोला, और लो, कमर से नीचे हो गया नंगा। अंदर कुछ नहीं पहना था मेरा बाप। फनफनाए लंड के साथ मुझे लिए दिए सोफे पर ही लंबा हो गया। मैंने खुद को समर्पित कर दिया था, जो करना है कर लो। उसने मेरी दोनों टांगें ऊपर उठा कर अपने कंधे पर चढ़ाया और अपने तने हुए लिं का सुपाड़े को मेरी यौनगुहा के प्रवेश द्वार पर ज्यों ही रखा, उफ ओह, भूल ही गयी कि कुछ देर पहले मैं तीन तीन कमीनों से चुद चुकी थी। बेताबी से अपनी कमर उछाल कर गप्प से उसके लिंग को खा गयी अपनी चुदी चुदाई चूत में।

“आ्आ्आ्आ्ह,”

“हां ओह रंडी बिटिया हां, खा खा मेरा लौड़ा, हुं हुं हुं हुं हुं हुं,” गपागप ठोंकने लगा मुझे।

“ओह रज्जा।”

“ओह मेरी बिटिया रानी।” इधर रामलाल और करीम मेरी देह के बाकी हिस्सों पर हाथ फिरा फिरा कर और भी पागल किए दे रहे थे।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मा्ं्मां्मां्आं्आं्आं आं आं आं, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ गयी्यी्यी्ई्ई्ई्ई्ई” मैं पांच मिनट में ही खल्लास हो गयी, इतनी उत्तेजित हो चुकी थी मैं। लेकिन हरिया कहां, वह तो लगा हुआ था भका भक चोदने।

“गयी साली कुतिया, अभी कहाँ, खाती रह मेरा लौड़ा तेरी मां की चूत, मां की लौड़ी चूतमरानी रांड।”बोलते हुए चोदता रहा और मैं चुदती रही, उसकी कमर को अपनी टांगों से लपेटे।

“आह् हां हां हां हां आह्ह, नजरों के आगे नुनु नचा कर नानी को नोचते उसके भोंसड़े का भुर्ता बनाने वाले चोदू भालू, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, मेरी नानी की नाक के नीचे मेरी मां की मुनिया को मथने वाले मादरचोद मां के लौड़े, इस्स्स्स अपनी बेटी की चूत की चटनी बना चूत के चटोरे चूतिए बेटी चोद, चोद आह्ह, चोद ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बा्आ्आ्आप, चोद बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद आ्आ्आआ्ह्ह्ह्ह।” मैं मस्ती में भर कर बेगैरत वेश्या की भांति बेहद घृणित अल्फाज निकालते हुए न जाने किस किस उपाधी से विभूषित कर रही थी हरिया को और बेशर्मी की हद को पार करती सड़क छाप आवारा कुतिया की भांति आनंद विभोर अपनी कमर उछाल उछाल कर हरिया के हर ठुकाई का प्रत्युत्तर दिए जा रही थी।

“वाह्ह्ह्ह्ह्ह वाह्ह्ह्ह्ह्ह, ये हुई ना रंडी वाली बात।” करीम मेरे गालों को नोचते हुए बोला। अबतक वे दोनों भी नंगे हो चुके थे और अपने खूंखार लिंगों का प्रदर्शन करते हुए हरिया के फारिग होने का बड़ी बेकरारी से इंतजार कर रहे थे।

करीब बीस मिनट बाद, आ््आआ््आआ््हह्ह्ह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्साआ्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई् रंडी्ई्ई्ई्ई्ई आ्आ्आ्आ।” आहें भरते, हांफते कांपते, मुझे निचोड़ते हरिया स्खलित हुआ।

“ओह रज्जा, आ्आ्आ्आ्ह,” मैं आनंदित मुद्रा में आंखें बंद किए स्खलन के सुख में डूबी हुई थी, तभी हरिया का स्थान करीम नें लिया। इधर हरिया का लिंग भींगे मुरझाए चूहे की तरह फुच्च से मेरी से मेरी योनि से बाहर निकला कि पल भर में करीम का टनटनाया खतना किया हुआ लिंग भच्चाक से घुस्स्स्स्स्स्स गया, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्ह। क्या करती मैं? छोड़ दिया खुद को उस कामुक बूढ़े के रहमो करम पर। फिर शुरू हुआ सटासट चुदाई का दूसरा दौर। मुझे नोचते खसोटते, रगड़ते घसड़ते, चोदता रहा अपने खतना किये लिंग से, कूटता रहा, भोगता रहा। करीब आधे घंटे की भीषण चुदाई से मुझे बेहाल कर दिया। उसने मुझे कुतिया की तरह चौपाया बना कर पीछे से चोदा। मेरी चूचियों को आटे की तरह गूंथता हुआ चोदा। मेरी गर्दन को कुत्ते की तरह काटते हुए चोदा। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, और मैं चुदती रही चुदती रही, लंडखोर कुतिया की तरह। मैं पगली उस चुदाई में भी मगन, मजा ले रही थी। जब उसने मुझे चोद कर छोड़ा, मैं थकान के मारे खुद को संभाल भी नहीं पायी और धम्म से सोफे पर ही मुंह के बल गिर पड़ी। अभी मैं सांसें संयमित भी नहीं हो पायी थी कि अधपगला रामलाल शिकारी कुत्ते की तरह मेरी थकान से निढाल शरीर पर टूट पड़ा।

“हां अब मेरी बारी।” प्रतिरोध में अक्षम, मेरे अधमरे नंगी देह पर छाता हुआ बोला। मेरा शरीर अभी भी सोफे पर औंधे मुंह पड़ा था। रामलाल नें मेरी कमर पकड़ कर उठाया और अपने साढ़े ग्यारह इंच का भीमकाय मूसल मेरी चुद चुद कर पावरोटी सरीखी योनि में ठूंसने का उपक्रम करने लगा।

“आ्आ्आ्आ्ह, ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़।” मेरी मरी मरी आवाज थी।

“क्या नहीं नहीं, इतने दिन बाद तो ढंग से चोदने दो मैडम। रबिया, शहला और सरोज के मुकाबले हमारी परी मैडम, ले लीजिए हमारा भी लौड़ा। आपको चोदने का मजा ही और है। ले ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह ये गय्य्य्य्या्आ्आ्आ्आ्ह्ह््ह, ओह मेरी लंडरानी मैडम।” बोलता बोलता घुसाता चला गया, सर्र से। मैं इस तीसरे हमले से कलप उठी। मेरा सर अब भी सोफे पर टिका था, हाथों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हाथों के बल चौपाया भी बन पाऊं। मेरी कमर रामलाल की मजबूत पकड़ में थी, चूतड़ हवा में। उसी अवस्था में लगा भकाभक चोदने। अजब दृष्य था। ऐसा लग रहा था मानो कोई भूखा शेर एक निर्जीव हिरण के शरीर को भंभोड़ रहा हो।

“आ्आ्आ्आ्ह धीरे, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह आराम से आ्आ्आ्आ्ह।” मैं कराहती हुई बुदबुदा उठी। लेकिन अब कहाँ धीरे और आहिस्ते, भूखा शेर अपनी काम ज्वाला में धधकता, नोचने खसोटने पर उतारू हो चुका था।

“हुम्म्म्म्म्म्म, हुम्म्म्म्म्म्म, हुम्म्म्म्म्म्म, क्या धीरे, हुम्म्म्म्म्म्म, क्या आहिस्ते, हुम्म्म्म्म्म्म, ले मेरा लौड़ा हुम्म्म्म्म्म्म, अह्ह्ह्हा अह्ह्ह्हा, चुद बुरचोदी मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, कुत्ती मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, रंडी मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, हुं हुं हुं हुं।” किसी रोबोट की तरह भयानक रफ्तार से फचफच चोदने में तल्लीन, अनाप शनाप बके जा रहा था। उस अल्पबुद्धी नर को औरतों के तन का ऐसा चस्का लग चुका था कि चुदाई के वक्त औरतों का शरीर उसके लिए चुदने वाली गुड़िया से ज्यादा और कुछ नहीं थी, उस पर तुर्रा यह कि चुदाई के दौरान उपयुक्त गंदी गंदी गालियां भी सीख गया था। औरतों के मन की भावनाओं से उसे कुछ लेना देना नहीं था, औरत मतलब चूत और चूत मतलब चोदना, बस, और कुछ नहीं। अच्छा ही है, भावनात्मक जुड़ाव वाले ही दूरियां, अलगाव तथा बिछुड़न के गम में गमगीन रहते हैं। अपने में मस्त, बालसुलभ स्वभाव, किंतु औरतखोरी के वक्त भावनाशून्य पशु की तरह उसका व्यवहार। कुछ पलों तक हलकान होती रही, फिर जैसा कि आप सभी जानते हैं, शनैः शनैः मेरे शरीर में नवजीवन का संचार होने लगा और रामलाल के कामुक कृत्य से मुझ कमीनी के अंत:करण में स्थित कुत्सित कीड़े की कुलबुलाहट से कलकलाती हुई जैसे ही पूर्ण जागृत हुई, वहां का माहौल बद से बदतर कर बैठी मैं।

“चोद चूत के चटोरे चूतखोर चुदक्कड़, चोद आह लठ्ठधारी लठैत सरीखे लंड वाले लंडराज, मां के लौड़े, ठोंक आह ठीक से ठुकाई ठोंक मादरचोद, आ्आ्आ्आ्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह ससेट सटासट स्स्स्साले्ए्ए्ए सरिया ससेट, मार मार मेरी चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, चोद मेरी बू्ऊ्ऊऊ्ऊ्ऊर, बना आह्ह, बना मेरी बू्ऊ्ऊ्ऊर का भोंसड़ा, कमीने, कुलकलंक, कुच्चड़ कुत्ते, कर कचकचा कर इस कुतिया का कचरा, आ आ आ आ  चुदक्कड़ रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह।” मैं अपनी गांड़ उछाल उछाल कर चुदते हुए अपने गंदे कल्फाज से उस माहौल और भी गंदा करने लगी। करीब बीस पच्चीस मिनट की उस भीषण चुदाई के पश्चात लगा झड़ने वह चुदक्कड़ पागल।

“आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह, आ्आ्आ्आ्ह, आ्आ्आ्आ्ह।” मेरी कमर को किसी कुत्ते की तरह जकड़ कर तीव्र वेग से लगा छर्र छर्र छर्रा छोड़ने अपने वीर्य का। गरमागरम लावा मेरी कोख में भरता रहा, भरता रहा और मैं आनंद के सागर में डूबती अपनी योनि में उसके वीर्य का कतरा कतरा जज्ब करती रही, बेशकीमती धरोहर की मानिंद। पूर्ण तृप्ति का अहसास रामलाल के चेहरे पर था और मुझ बेगैरत गलीज कुतिया के चेहरे पर भी। मेरे निढाल शरीर को उसी सोफे पर धम्म से छोड़ा रामलाल नें और मैं पूर्ववत मुंह के बल पड़ गयी। मेरे निष्प्राण से शरीर को उसी तरह छोड़ कर तीनों चुदक्कड़ खिसक लिए थे। मैं वहां उसी प्रकार नंगी भुजंगी, चुदी चुदाई, थकी मांदी पड़ी रही करीब घंटे भर। करीब घंटे भर बाद हरिया की आवाज सुनी मैं।

हरिया मुझे चोद चाद कर चल दिया था कब का और अपने काम में लग चुका था। खाना तैयार होते ही मेरे पास आ कर बोला, “इस तरह गोल गोल गांड़ दिखाती हुई पड़ी मत रह बुरचोदी बिटिया, नहीं तो अब तेरी चिकनी गांड़ में भी शुरू हो जाएंगे हम। उठ बुरचोदी, खाना तैयार है। इसी तरह नंगी खाने का इरादा है क्या? ऐसा है तो अपने लंड मेेंं बैैैठा कर खिलाएंगे हम।”

“साले बेटीचोद, बेटी की बुर चोद के पेट नहीं भरा, बात करता है गांड़ चोदने की।” मैं बड़बड़ाती हुई सोफे से उठी और सीधे बाथरूम में घुस गयी। बाथरूम में मैं ने सिर्फ हाथ मुंह धोया। शरीर के किसी और हिस्से में पानी तक लगने नहीं दिया, इसलिए इन तीनों मर्दों के शरीर के पसीने से तर मेरा तन वैसा का वैसा ही था। उनका पसीना मेरे तन पर सूख चुका था। उनका वीर्य मेरी योनि के मुहाने पर, नीचे मेरी जांघों पर बहकर सूख चुका था। उनके शरीर की मिली जुली गंध से मेरा तन महक रहा था। मैं इस दुर्गंध से मुक्त होना भी नहीं चाहती थी।  करीब आधे घंटे बाद मैं खाने की मेज पर थी। तीनों हवस के भूखे भेड़िए पहले से मौजूद थे और मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।

“अब मुझे देख कर दांत मत दिखाओ तुमलोग, खाना खाओ चुपचाप।” मैं उनकी हंसी से झल्ला कर बोली। मैं वैसी ही गंदी हालत में खाना खा रही थी। हम सभी खाना खा कर अपने अपने कमरे में चले गये। मेरे मन में अगामी कल जो होने वाला था, उसकी सोच घूम रही थी। मैं एक गंदी सी चादर का बिछावन फर्श पर ही बिछा कर सोने की तैयारी करने लगी। संध्या करीब साढ़े चार बजे से लेकर करीब आठ बजे तक छ: मर्दों से मसली गयी थी किंतु फिर भी अब दूसरे दिन जो कुछ मेरे साथ घटने वाला था, उसके अनजाने रोमांच की कल्पना के साथ, इस बात से बेखबर कि कामुकता के इस दलदल में मैं कितनी अंदर धंस जाऊंगी, खुद को कितनी सस्ती बना बैठूंगी, कब निद्रा देवी के आगोश में समा गयी पता ही नहीं चला।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।