कामिनी की कामुक गाथा (भाग 75)

पिछली कड़ी में आपलोगों नें पढ़ा कि किस तरह अपनी शारीरिक भूख मिटाने हेतु नित नये रोमांचकारी और जोखिम भरे प्रयोगात्मक तरीके इजाद करती हुई अपने यहां भवन निर्माण में कार्यरत मजदूरों से संसर्ग सुख प्राप्त करने का मन बना बैठी। पूर्वनिर्धारित योजना के तहत सारे कामगरों संग यौनक्षुधा शांत करने हेतु हमारे घर में कामुकता का सैलाब लाने की सारी व्यवस्था हो गयी थी। भगवान नें अपनी लीला दिखाई और हरिया, करीम और रामलाल को घर से रुखसत करके मुझे स्वतंत्र, स्वच्छंद कर दिया था कि मैं अपनी कुत्सित वासना के समुंदर में डूब जाऊं। यही हुआ भी। यथा समय सारे कामगर, जिनके बारे में आश्वस्त थी कि सभी कामगर कामदेव के पुजारी हैं, पुरुष या तो एक नंबर के हरामी औरतखोर, या समलैंगिक संबंधों में रुचि रखने वाले और स्त्रियां, बेशरम मर्दखोर। सर्वप्रथम मैं नें रूप परिवर्तित कर उनके समकक्ष की स्त्री बनकर खुद को प्रस्तुत किया और उनकी झिझक समाप्त की और परिवर्तित रूप में ही अपने तन को सौंप दिया। रेजा, कांता, सोमरी और समलैंगिक मुंडू के समूह में शामिल हो कर तीन मिस्त्रियों और चार कामुक कुलियों के समूह से लुटाती रही अपने जिस्म को। चूंकि मैं खुद को उनके मनमुताबिक लुटा चुकी थी, अतः मेरे असली रूप को देखकर उन्हें क्षणिक शर्मिंदगी का अहसास अवश्य हुआ किंतु इस गंदे कृत्य में मेरी पूर्ण सहभागिता को देखकर, उनकी समझ में आ गया कि मैं किस तरह की स्त्री हूं। अब कोई शरम झिझक नहीं थी हमारे बीच।

भोजन के उपरांत सुपरवाइजर मुंडू, अपने समलैंगिक होने की कहानी से हमें अवगत कराया। फिर इन कामगरों के समूह के निर्माण के बारे में बताने लगा। सर्वप्रथम उसनें बताया कि किस तरह उसनें मंगरू को अपने आकर्षण में बांधकर समूह में शामिल किया। सलीम, रफीक तो पहले से ही ठीकेदार के मिस्त्री थे। ठीकेदार दास बाबू की पसंद बन चुका मुंडू इन मिस्त्रियों को भी अपने आकर्षण के जाल में बांंध चुका था। मंगरू के साथी बोयो और हीरा भी मुंडू के चक्कर में खुद ब खुद बंधे चले आए इस समूह में।

मुंडू के द्वारा जिस ढंग से कहानी बताया जा रहा था वह इतना कामोत्तेजक था कि हम सभी खुद को रोक नहीं पाए और परिणाम स्वरूप एक और दौर कामक्रीड़ा का चला। इस बार सलीम और बोदरा मेरी देह का उपभोग करने लगे थे और बाकी लोग कांता, सोमरी और मुंडू पर टूटे थे। यह दौर भी बहुत मजेदार रहा। फिर कहानी आगे बढ़ती गयी और फिर वही हुआ। फिर तीसरा दौर। जिसे जो हाथ लगा, उसी पर हाथ साफ करने लगा। जहां मैं मंगरू, सलीम और रफीक के हाथों फिर से मसली गयी वहीं बाकी लोग कांता, सोमरी और मुंडू के साथ लिप्त हो गये अपने अपने शरीर की गरमी उतारने में। इस तीसरे दौर के समाप्त होते होते हम स्त्रियों और मुंडू का कचूमर निकल चुका था। समय भी काफी बीत चुका था। संध्या के छ: बज रहे थे। अब एकाध घंटे बाद कभी भी हरिया, करीम और रामलाल आ धमकने वाले थे। हम सब अब अपने अपने वस्त्र पहन कर पुनः शरीफों की तरह से ऐसे बैठे थे मानो वहां कुछ हुआ ही नहीं हो।

“आज का तो हो गया।” मैं बोली।

“हां और क्या खूब हुआ।” रफीक बोला।

“अब तो समय है नहीं हमारे पास। जब तक हमारे घर के बाकी लोग नहीं आ जाते तबतक बाकी कहानी क्यों न सुन लें?” मैं बोली।

“हां हां क्यों नहीं।” सलीम बोला।

“तो अब कौन बताएगा आगे?”

“और कौन? यही हीरा और कौन?” मुंडू बोला।

“तो हीरा, चल बता। हां कहां थे हम?” मैं बोल उठी।

“यही, कि हीरा सोमरी को कैसे फंसाया।” मुंडू बोला।

अब आगे की कहानी हीरा की जुबानी सुन रहे थे हम।

“यह एक साल पहले की बात है। हम जहां काम कर रहे थे, उसके पास में ही सोमरी का घर था। इसका आदमी दुबला पतला, रिक्शा चलाने वाला है। इसके घर के पास ही एक छोटा सा मिट्टी जोड़ाई वाला, बिना छत का, ईंट के दीवार से नहाने का घर बना था। हम उसी के पीछे पेशाब करने जाते थे। एक दिन दोपहर खाना खाने के बाद हम पेशाब करने इसके नहाने का घर के पीछे गये। पेशाब करते समय हमें इसके नहाने के घर के अंदर से कुछ आवाज सुनाई पड़ा। हम कान लगा कर सुनने लगे।

“आह्ह, आह, आह आह।” यह कोई औरत की आवाज थी। क्या चक्कर है? दीवार ज्यादा ऊंचा था नहीं। हम पास से एक बड़ा पत्थर उठा लाए और उस पर खड़ा होकर दीवार के ऊपर से अंदर झांकने लगे। देखकर एक बार तो हम चकरा गये। सोमरी अपना साड़ी उठा कर बैठी हुई थी। इसकी बुर एकदम साफ साफ दिख रही थी। बुर के ऊपर काला काला झांट और दोनों मोटी मोटी जांघों के बीच काला चिकना बुर चमक रहा था। लेकिन यह कर क्या रही थी? अब समझ में आया, इसके बुर में बैंगन था, जिसको यह हाथ से पकड़ कर बुर में अंदर बाहर कर रही थी। इसकी बड़ी बड़ी चूचियां ब्लाऊज के बाहर झांक रही थीं। इसका बदन हिल रहा था, साथ ही साथ बिना ब्रेजियर की चूचियां भी थल थल हिल रही थीं। इसकी आंख बंद थीं। चेहरा लाल हो गया था। इसके मुंह से ,”आह, उह, आह, उह” निकल रहा था। अरे ये तो बैंगन से चुदवाए जा रही थी। लेकिन ऐसा भी क्या? आदमी तो था इसका? फिर ऐसा क्यों? ओह, अब समझ में आया, जरूर इसका मरियल मरद इसको ठीक से ठोंक नहीं पाता होगा। इतनी भरी पूरी गदराए बदन वाली औरत भी करे तो क्या करे। पेट की भूख तो मिटता होगा, लेकिन बुर की भूख? इस मस्त कमीनी मक्खन जैसी बुर की भूख का क्या करे। इसे तो लौड़ा चाहिए, हम मरदों का दमदार ल़ौड़ा। अब मेरा लौड़ा भी बमकने लगा। हम पैंट के ऊपर से ही लंड पकड़ कर दबाने लगे। बरदाश्त ही नहीं हो रहा था। इसके नहाने के घर के दरवाजे पर सिर्फ एक कपड़ा का पर्दा लगा हुआ था। इस समय किसी के आने का डर था नहीं, शायद इसी लिए अपने बुर की खुजली से परेशान यहीं पर शुरू हो गयी थी। इसको क्या पता कि हमारे जैसे बुर के रसिया इसे इस हालत में देख लेंगे। हमसे और बर्दाश्त नहीं हुआ। वहां से हटकर सीधे दरवाजे पर पहुंच गये। इधर उधर देखा, कोई नहीं दिखा। मतलब मैदान साफ था। इस दोपहर में और कौन आता?  चुपचाप पर्दा हटाकर अंदर चले आए। सोमरी को पता ही नहीं चला। उसी तरह बैंगन से बुर चुदवाने में लगी हुई थी। हम अपने पैंट उतारकर कमर से नीचे नंगे हो गये। मेरा लौड़ा अब आजाद हो गया था। अब बस बहुत हुआ, अब और नहीं, हमनें आगे बढ़कर सोमरी को दबोच लिया।

“कककक कौन?” सोमरी घबरा गयी, भूत के समान प्रकट हुए थे हम तो उसके सामने।

“हम हैं” सोमरी वैसे तो रोज ही हमें वहां काम करते हुए देखती थी। पहचान गयी।

“छोड़ो हमको।” छटपटाते हुए सोमरी बोली।

“छोड़ने के लिए नहींं पकड़ा है।”

“छोड़ो नहीं तो चिल्लाएंगे।” उसके इतना कहते ही हमनें उसका मुंह दबा दिया। वह वहीं पर बैठे बैठे लुढ़क गयी और हम उस पर चढ़ चुके थे। उसकी चूत में अभी भी बैंगन फंसा हुआ था।

“ई का है, बैंगन? हमारे रहते हुए बैंगन?” हम उसे अपने हाथों से कस के दबाए हुए थे। वह हिल भी नहीं पा रही थी। इसकी साड़ी तो कमर तक उठी हुई थी ही, हम इसके दोनों पैरों के बीच घुस चुके थे। थोड़ा बहुत पैर हिला पा रही थी और बस इधर उधर सिर पटक रही थी। हमसे छूटने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर ऐसे ही छटपटाती रही, फिर समझ गयी कि हमसे पार पाना मुश्किल है, सो इसका छटपटाना रुक गया और आंख फाड़ कर हमें देखे जा रही थी। हम इसकी चूत के पास हाथ डालकर बैंगन निकाल लिये और बोले, “इतनी मस्त बुर में ऐसा सड़ियल बैंगन? ये देख, इस सड़ियल बैंगन से कई गुना मस्त लौड़ा।” हमने इसका हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख दिया। इसने घबरा कर अपना हाथ हटाने के लिए जोर लगाया लेकिन ऐसा कर नहीं पायी, हम इसके हाथ को पकड़ रखे थे। शायद मेरे लंड के साईज से डर गयी थी। डर के मारे इसकी आंखें और बड़ी बड़ी हो गयीं थीं।

“कैसा है मेरा लौड़ा?”

“उं उ़ उं उंग उंग।” यह बंद मुंह से बोलने की कोशिश कर रही थी। सिर हिला कर न कहना चाह रही थी शायद। हम जानते थे कि ऐसे यह मानेगी नहीं। डर जो था मेरे लंबे मोटे लंड का। वैसे हमें पता था कि इसे लंड तो चाहिए ही था। धीरे धीरे इसका छटपटाना कम हुआ, शायद हमसे छूटने की कोशिश करते करते थक गयी थी। एक तरह से इसनें हार मान ली थी। यह ढीली पड़ गयी थी। इसकी हालत देखकर हमें थोड़ा तरस आ गया। हम सोचे कि इसके मुंह से हाथ हटा ल़ेंं। हमनें इसके मुंह से हाथ हटाने से पहले पूछा, “अब चिल्लाएगी तो नहीं?” सिर हिला कर इसने बताया “नहीं”। हमने इसके मुंह से हाथ हटाया और यह लंबी लंबी सांस लेने लगी। इसके रसीले बदन से चिपके हमें बड़ा मजा आ रहा था।

“छोड़ो हमको।” यह बोली।

“नहीं। ऐसे नहीं। बिना चोदे तो बिल्कुल नहीं।” हम बोले।

“हम बरबाद हो जाएंगे।” यह रोने लगी थी।

“कैसे बरबाद हो जाएगी?”

“पराये मरद हो तुम।”

“अब ये अपना पराया क्या?”

“अपना मरद अपना होता है।”

“और लंड?”

“यह भी।”

“मगर लंड तो लंड होता है।”

“मगर हम शादी किए हैं तो मरद अपना हुआ ना।”

“तो फिर मरद के रहते बैंगन क्यों?”

“वो तो, वो तो….” आगे उसे सूझ नहीं रहा था कि क्या बोले।

“वो तो वो तो क्या? साफ साफ बोलो कि मरद की चुदाई से मन नहीं भरता।”

“तो तुझे इससे क्या?’

“हमें दुख हुआ, तुझे बैंगन से चुदवाते देख कर, तुझे तो लंड चाहिए ना, अच्छा दमदार लंड, ई बैगन वैगन अच्छा लगता है का?” हम फुसला रहे थे।

“हम कुछ भी करें, तुम्हें इससे क्या?”

“तेरी हालत से तरस खा कर बोल रहे हैं पगली।”

“हम ऐसे ही ठीक हैं।”

“नहीं, तुम ठीक नहीं हो।”

“तो तुम्हें इससे क्या।”

“बैंगन से चुदोगी तो हमें भला कैसा लगेगा? तुम औरत लोग हम मरदों के रहते हुए बैंगन से चुदोगी तो हमारे लंड का क्या होगा?” हम उसे धीरे धीरे बहला फुसला रहे थे। हमारा हाथ उसकी चूचियों तक पहुंच चुका था और धीरे धीरे उसकी चूचियों को ब्लाऊज के ऊपर से ही सहला रहे थे हम।

“यह क्या कर रहे हो?” हमारे हाथ को पकड़ कर बोली। दिखा रही थी कि हमें रोकना चाहती है लेकिन वास्तव में रोकने की इच्छा नहीं थी शायद।

“प्यार कर रहे हैं पगली।” हम सहलाते रहे इसकी किलो किलो भर चूचियों को। अब हम इसके गोल गोल गालों को चूमने लगे। यह सिर इधर उधर कर रही थी लेकिन अब मना नहीं कर रही थी।

“नहीं। यह ठीक नहीं है।” बड़ी कमजोर आवाज में बोली।

“यही ठीक है। तू हमारे रहते बैंगन से चुदवाओ, यह ठीक नहीं है।” हम इसे चूमते हुए बोले। धीरे धीरे इसका मना करना बंद हो गया।

“अब?” हमनें सवाल किया।

“अब क्या?”

“चोदें?”

“नहीं।”

“काहे?”

“बहुत बड़ा है तेरा।”

“क्या बड़ा है मेरा?” हम समझ गये अब यह रास्ते में आ रही है।

“यही।”

“क्या यही?”

“लंड।” कहकर शरमा कर हमारे सीने में मुंह छिपाने लगी।

“अय हय, ऐसे बोलोगी तो हम मर ही जाएंगे।”

“धत।”

“तो? अब चोदें ना?”

“नहीं, दर्द होगा।”

“थोड़ा होगा, लेकिन मजा आएगा।”

“मेरा फट जाएगा।”

“क्या फट जाएगा?”

“बुर,” कहकर फिर शरमा गयी।

“ओहो मेरी जान, नहीं फटेगी रे, हां थोड़ा फैल जाएगी।”

“फिर भी….” इसकी सांस बहुत जोर से चल रही थी। हम समझ गये थे कि यह गरम हो गयी है।

“अब कोई फिर विर नहीं, अब और कुछ बोलो नहीं।” अब हम बात करने के मूड में नहीं थे। मेरा लंड ठीक इसकी चूत के ऊपर टिका हुआ था। तवा गरम था। रोटी सेंकने का समय आ गया था। हम धीरे धीरे उसकी चूत पर दबाव देने लगा। इसकी चूत बैंगन खा खा कर पहले से पनियायी हुई थी। मेरा लौड़ा इसकी चूत का मुंह फैला कर घुस रहा था।

“आह्ह्ह्ह, नहीं।” दर्द हो रहा था शायद।

“हां्आं्आं्आं्आं।” हम उसकी बड़ी बड़ी गांड़ के नीचे हाथ डालकर घुसाते चले गये और मेरा लंड इसकी टाईट चूत को फैलाता हुआ घुसता चला गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, छोड़ो, फट रहा है।” यह दर्द से परेशान थी।

“आह आह, बस बस थोड़ा और, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह” कहते हुए अब हम और जोर लगाने लगे। इसकी चूचियों को अब दबाने लगे हम। चूमने लगे इसको। यह छटपटाती रही और मेरा लंड घुसता चला गया, पूरा लंड घुसता चला गया। जब पूरा घुस गया तो रुके हम।

“आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं, मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई।” यह दर्द से परेशान थी। हम रुक गये और जोर जोर से इसकी चूचियों को दबाने लगे। चूमने चाटने लगे। धीरे धीरे यह शांत हो गयी। इसका चेहरा बता रहा था कि अब इसे तकलीफ़ नहीं है। हमनें और देर करना ठीक नहीं समझा। लंड धीरे धीरे बाहर निकालने लगे। लंड का सुपाड़ा इसकी चूत में ही रहने दिया।

“आआआआआआआ,” यह आनंद से आंखें बंद किए हुए थी। हम फिर घुसाने लगे लंड। इस समय इसे कोई फर्क नहीं पड़ा। बड़े मजे से लंड लेने लगी। हमें समझ आ गया कि चिड़िया फंस गयी है। अब हम जीत गये थे। सोमरी को जीत गये थे। हम धीरे धीरे चोदते हुए स्पीड बढ़ाने लगे। सोमरी की हालत खराब। आग लग गयी थी इसके बदन में। हम चोदते हुए इसकी ब्लाऊज खोल बैठे। थल्ल से इसकी चूचियां बाहर। वाह, मजा आ गया। इतनी बड़ी बड़ी चूचियां पहले कभी नहीं देखा था। पहले दबाया, फिर चूसने लगा। बड़ा मजा आ रहा था। गचागच चोदने लगा।

“आह आह ओह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्ई्ई्ई, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मांआंआंआंआं।” यह मस्ती मे भर के अपनी चूतड़ उछालने लगी और गपागप मेरा लंड खाने लगी। यह सब कुछ भूल गयी थी। लाज शरम, सब कुछ।

“आह चोदो, ओह चोदो, आह मां, चोदो चोदो चोदो हे रामजी चोदो।” बोलने लगी।

“हां हां हां हां, मगर हम राम नहीं, हीरा हैं, हीरा। हीरा का मोटा खीरा, ले बुरचोदी, लौड़ा ले हमारा, तेरी चूत को चीरा।” हम बोलते हुए गच्च गच्च चोदने लगे। “अब आ रहा है मजा?”

“हां्आं्आं्आं्आं हां्आं्आं्आं्आं।”

“दर्द हो रहा है?”

“ना्आ्आ्आ्आ ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ।”

“फटा?”

“ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ।” यही सब आलतू फालतू बात बोलते रगड़ रगड़ के चोदते रहे। बीस मिनट में इसे तीन बार झाड़ दिया। फिर हम भी झड़ गये। यह तो इतनी खुश हो गयी कि छोड़ ही नहीं रही थी।

“जिंदगी में पहली बार ऐसा मजा मिला।”

“हमको भी।”

“फिर चोदोगे?” हमसे लिपट कर बोली।

“हां रे हां।”

“कब?” बड़ी बेकरार हो रही थी।

..       “रोज।”

“सच्च्च्चीईईईई?”

“हां बुरचोदी सच्च्च्चीईईईई।”

“लेकिन यहाँ का काम खतम होगा तो?”

“तो क्या, तू भी हमारे साथ काम कर, फिर जहां हमारा काम होगा, वहीं चोदाचोदी चलेगा।” हम इसे बांहों में भर कर बोले। इसके बाद हमने मुंडू से बात किया। मुंडू राजी हुआ और तब से सोमरी हमारे साथ काम कर रही है। हमारे साथ काम करने का फायदा इसे यह हुआ कि हम सबका लंड इसे मिलने लगा। यह खुश, हम सब खुश।”

“बहुत माहिर चुदक्कड़ है रे तू तो। औरत फंसाने में उस्ताद।” मैं बोली।

“इसमेंं उस्तादी क्या? इसको मस्त लंड वाला चुदक्कड़ मर्द चाहिए था, हम मिल गये इसे।”

“और ई कांता?”

सलीम बताने लगा, “कांता तो पहले से एक नंबर की लंडखोर लौंडिया है। यह बांग्लादेश से यहां आई थी काम करने। इसको मुर्शिदाबाद वाले ग्रुप में काम करते हुए रफीक देखा था। रफीक भी पहले उसी ग्रुप में था। जब यह हमारे ग्रुप में आया तो इसनें हमको इसके बारे में बताया। जब हम इसको देखे तो देखते ही समझ गये कि यह एक नंबर की लंडखोर है। हमें पसंद आ गयी। मुंडू से बात किया और बात बन गयी। यह भी हमारे ग्रुप में आ गयी। ऐसी लंडखोर हमने पहले कभी नहीं देखा। इसको लंड से मतलब है। छोटा लड़का से लेके बूढ़ा तक, जो मिल जाए, सब चलता है इसको। छोटा लंड, पतला लंड, मोटा लंड, लंबा लंड, सब चलता है इसको।”

“वाह, तो यह है तुमलोगों का ग्रुप। भगवान भी क्या सोचता होगा? कैसे कैसे लोग मैंने बनाए और लोग क्या से क्या बन गये।” मैं ऐसे ही बोली।

“क्या मतलब?” सलीम बोला।

“कुछ मतलब नहीं। ऐसे ही बोली। अरे जो होता है उसी की मरजी से तो होता है। ऐश करो, मस्त रहो, बिंदास जिय़, खुश रहो।” मैं बोल उठी।

“यह बोली साली चोदनी, और क्या खूब बोली साली बुरचोदी। भगवान सबको ऐसी समझदार मालकिन दे।” बोदरा बोला।

“मुझको मालकिन बोला हरामी मादरचोद।” मैं गुर्राई।

“माफी चोदनी माफी।” कान पकड़कर बोदरा बोला और सभी हंस पड़े।

इस समय सात बज रहा था और तभी गाड़ी आने की आवाज सुनाई पड़ी। हरिया एवं बाकी दो नमूने आ चुके थे।

आगे का भाग अगली कड़ी में। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।